जंतर मंतर नहीं पर यंत्र मंत्र : पूरा इतिहास

जंतर मंतर नहीं पर यंत्र मंत्र : पूरा इतिहास


सबसे पहले एक स्पष्टता कर ले लेकिन यहां पर जो विवरण दिया गया है वह विज्ञान पर आधारित होने के कारण जरूर नया है । विज्ञान को केंद्र में रखकर सबसे पहली बात तो हमने शीर्षक में ही बता दी है । जंतर मंतर शब्द हकीकत में अपभ्रंश हुए हुए शब्द है । जिसकाअर्थ बिल्कुल अलग होता है । एक तंतु वाद्य का नाम जंतर है । मंतर सामान्य रूप से जादू टोने या फिर किसी काली विद्या के लिए इस्तेमाल किया जाता शब्द है । जयपुर के राजा जयसिंह द्वितीय ने सन 1728 से लेकर सन 1734 के दौरान जो खगोलीय वेधशाला बनाई उसका सच्चा नाम यंत्र मंत्र है । यंत्र यानी instrument और मंत्र यानी formula । जो दोनों शब्द विज्ञान के हैं । जैसे आइन्स्टाइन की E=MC2 फार्मूला और न्यूटन के गति सिद्धांत में F=Ma फार्मूला यह मंत्र है । महाराजा जयसिंह ने सब को बेशक मंत्र अनुसार बनाया था ।

Jantar mantra at Jaipur
Jantar mantra at Jaipur


प्राचीन भारतीय पंडितों ने ग्रहों और तारों की गतिविधि का अवलोकन कर खगोलीय कोष्टक/astronomical tables तैयार किये थे । महाराजा जयसिंह द्वियीय खुद बाहोश खगोल शास्त्री थे । उन्होंने कोष्टक की बहुत ही बारीकी से जांचने के बाद उनको लगा कि कुछ अंक सटीक नही है । इन सब कोष्टक को नए सिरे से बनाना जरूरी हैं । मुगल बादशाह मुहम्मद शाह के आग्रह के पर उन्होंने सन 1725 में दिल्ली में जंतर मंतर बनाई थी । विस्तार को देखते हुए यह बहुत बड़ी नहीं थी । पृथ्वी का कर्कवृत मध्य प्रदेश के उज्जैन पर से गुजरता होने के कारण सन 1730 में दूसरी जंतर मंतर वेधशाला का काम वहां पर किया । उस समय उज्जैन पर मुहम्मद शाह की हुकूमत के नीचे था । सबसे बड़ी जंतर मंतर खगोलीय वेधशाला / astronomical observatiory जयपुर में बनी जो 18700 चोरस मीटर में फैली हुई हैं । महाराजा के मार्गदर्शन नीचे 23 खगोल विद थे । हर खगोलीय मंत्र यानी फॉर्म्युले के संदर्भ में महाराजा के द्वारा बारीक मार्गदर्शन दिया जाता था । बाद में वे सब कारीगरों को यंत्र के कद नाप की सूचना देते दब।
आज जयपुर शहर की मुलाकात लेने वाले जंतर मंतर देखने का कोई मौका चुकते नहीं । लेकिन रेती के पत्थर और आरस से बने अलग-अलग यंत्रों की अद्भुत कार्य रचना बहुत कम लोग जानते हैं । जानने की कोई इच्छा भी कोई पर्यटक लगभग नहीं दिखाता । अत्यंत महत्वपूर्ण और महिमा सूचक हकीकत ध्यान से बाहर ही रह जाती है कि ऐसी वेधशाला दुनिया में कहीं भी नहीं है ।
जयपुर में जंतर मंतर के मुख्य 17 यंत्रों में से कुछ का वैज्ञानिक परिचय यहां हम आपको देने का प्रयत्न करते हैं ।

https://www.historyofhindustan.com/one-such-murlidhar-who-spent-17-years-in-exile-to-find-an-incredible-instrument/


◆ सम्राट यंत्र ◆

पहला यंत्र है सम्राट । यह यंत्र कोई अलग नहीं लेकिन अति बड़े कद की सूर्य घड़ी है । सूर्य घड़ी हमेंशा परछाई के मुताबिक समय दिखाती है । इसलिए हर प्रकार की घड़ी में चंदे के बीचो-बीच त्रिकोण आकार का कोटकोण बना होता है । इसे अंग्रेजी में नोमेन/Gnomon कहा जाता है । जयपुर के सम्राट यंत्र का काटकोण यानी कि किलक 89 फिट ऊंचा है और उसका कर्ण ( काटकोण के आमने सामने की बाजू ) पृथ्वी की धुरी के समांतर है । जैसा कि दी गई इमेज में बताया गया हैं तिलक की दोनों ओर दो कमान आकार के बांधकाम है । जिसे वर्तुलपाद कहा जाता है । जो पृथ्वी के विषुववृत्त के समांतर है। इसलिए जब सुबह पूर्व में जब सूर्योदय होता है और शाम को पश्चिम में सूर्यास्त होता है उस दौरान ऊंचे काटकोण की परछाई दोनों वर्तुलपाद पर पड़ता है । कमान की सतह पर लिखे गए अंक परछाई के आधार पर समय बता देते है ।

Samrat yantra
Samrat yantra


सम्राट यंत्र इतना सटीक है कि उस में दिखाया गए समय में 2 सेकंड से ज्यादा भूल नहीं होती । प्रत्येक सेकंड की परछाईं 1 मिलीमीटर खिसकता है । मिनिट में 6 सेंटीमीटर जितना खिसकते है । सम्राट यंत्र का कर्ण भी करात में ट वाला है । मतलब उस पर भी कट लगाए गए है । रात में सूर्य की गैरहाजिर के कारण साधारण सूर्य घड़ी काम नहीं देती लेकिन सम्राट यंत्र से सितारो के आधार पर भी हम समय जान सकते हैं । हर तारा 23 घण्टे , 56 मिनट और 4.09 सेकंड के बाद फिर अपनी जगह पर वापस आते है । सम्राट यंत्र के साथ बनता तारे का कोण नाप कर समय की गिनती की जा सकती है । सम्राट यंत्र का इस्तेमाल करने वाले पंचांग पंडित जुलाई या फिर अगस्त के दौरान आने वाली गुणों गुरु पूर्णिमा के दिन उसका निरीक्षण करके बारिश का अनुमान करते हैं ।

◆ जयप्रकाश यंत्र ◆

Jayprakash yantra
Jayprakash yantra

सवाई जयसिंह के नाम से ही जाना जाता प्रकाश यंत्र मूल रूप से ग्रहों और तारों का प्रकाश देखने के लिए है । प्रकश से अवकाश के पदार्थो का स्थान जाना जा सकता है । इसकी मदद से कोई भी व्यक्ति उन्हें ढूंढ सकते हैं । नीचे गई इमेज में जयप्रकाश यंत्र को देखे । दिल्ली में बने दो खोखले और बाउल जैसे बांधकाम जमीन के अंदर बनाए गए हैं । गोलो का व्यास 17.5 फिट जितना बड़ा है । रात्रि के अलग-अलग घंटे में बारी-बारी से दोनों जयप्रकाश यंत्र से आकाश दर्शन किया जा सकता है । कोई व्यक्ति जब बाउल में प्रवेश करता है तो उसके सिर पर पूर्व पश्चिम और उत्तर दक्षिण दिशा में दो तार बंधे हुए दिखते हैं । जो एक दूसरे को क्रॉस करते हैं । मिलन के स्थान पर हम उसे क्रॉसिंग पॉइंट कह सकते है । अब अंतरिक्ष में जिस तारे या फिर ग्रह का स्थान जान ना हो उसे इस क्रॉसिंग पॉइंट की बराबर सीध में आए इस तरह से बाउल में आपको सेट होना पड़ेगा । कल्पित रेखा को पीछे खींचो तो बाउल पर बने खास मार्किंग पर वह रेखा मिलती है । यह मार्किंग ही ग्रह या तारे का स्थान दिखता है । दिन में सूर्य भी पृथ्वी केकिस अक्षांश रेखांश में है , किस राशि में है इसकी सरल गिनती भी हम कर सकते हैं ।


◆ राम मंत्र ◆

Ram yantra Jaipur
Ram yantra Jaipur

सवाई जयसिंह के पूर्वज रामसिंह की याद में जाना जाने वाला यह राम यंत्र अवकाशी गोलों का स्थान देखने के लिए ही इस्तेमाल किया जाता है । साइड बाय साइड दो गोलाकार इमारतों का बना हुआ है । इमारत में खिड़कियां है । उसका दिखावा कुछ ऐसा है जैसे बहुमंजिला इमारत का काम शरू करके आधा ही छोड़ दिया हो । लेकिन हकीकत में दोनों सम्पूर्ण इमारत है । और सटीक भी है । हर गोलकार इमारत की बीचोबीच एक स्तम्भ है । ऊंचाई में यह स्तम्भ आंतरिक त्रिज्या जितना है और उसके शिखर पर एक डोर बांधी गई है । डोर आकाश दर्शन का मुख्य साधन है । किसी तारे या ग्रह के स्थान को जाने के लिए आप को उस डोर का सिरा जरा कस के पकड़ना पड़ता है । अंदर की दीवाल पर बने बनी सीढ़ियों चढ़कर या उतरकर खिड़की से देखकर उस तारे या ग्रह को डोर की सीध में लाया जाता है । जैसे ही सीध मिल जाती है एक कल्पित एक रेखा उस ग्रह या तारे के साथ बनती है । अब उस रेखा को पीछे की ओर ले जाए तो दीवाल पर ग्रह या तारा का स्थान बताने वाला मार्किंग देखने को मिलते हैं ।


दिन में ईसकी मदद से ग्रह या तारे का स्थान नहीं जान सकते । क्योंकि सीध निकालने के लिए सामने देखना पड़ता है जो शक्य ही नही बन सकता । ईस कारण से राम यंत्र में सूर्य के लिए एक अलग पद्धति है । ऊंचे स्तम्भ की परछाई फर्स पर जहां पड़ता है उस पर मार्किंग किया जाता है । उससे सूर्य के अंश पढ़े जा सकते हैं । यहां पर भी परछाई समय नहीं बताती । अंतरिक्ष मे उस समय का सूर्य में का स्थान कहा जा सकता है ।


जयपुर में बने जंतर मंतर में इन यंत्र के अलावा ध्रुव यंत्र , दिगंत यंत्र , राशिवलय यंत्र , चक्र यंत्र , लघु यंत्र , नाड़ी वलय यंत्र , राज यंत्र जैसे दूसरे 14 यंत्र है । सब 290 साल पहले बने हैं । लेकिन उसकी संरचना आज भी आधुनिक खगोल विदों को अभुभित करती है ।

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