ईराक को आजाद कराने के लिए जब भारत के सैनिकों ने खून बहाया !

ईराक को आजाद कराने के लिए जब भारत के सैनिकों ने खून बहाया !

अब बात ऐसी है कि मुंबई बंदर पर एक साथ 65 जहाजों का बेड़ा लग गया । जिसमें सशस्त्र भारतीय सैनिकी उसमें चढ़ते गए। हिरझाई , काठी , अनमोल और बलूची औलाद के हजारों घोड़े भी चढ़ाये गए। तीन दिन बाद समुद्री बनजारे जैसा काफिला ईरान के खाड़ी की ओर जाने के लिए निकल पड़ा ।

सन 1914 के साल का अक्टूबर महीना था । स्थिति ह नाजुक थी । लेकिन भारत के लिए नही पर पिछले कई दशकों से भारत पर राज चलाने वाले अंग्रेजों के लिए ! यूरोप में प्रथम विश्व विग्रह चल रहा था । यह विग्रह यूरोप की बाहर न फैले इस लिए ब्रिटेन कड़े कदम उठा रहा था। क्योंकि यूरोप से बाहर भारत जैसे कई देशों में उसके संस्थान थे । जिस पर दुश्मन अगर हमला करते है तो सब का ररक्षण करना ब्रिटन के लिए कठिन था ।

लेकिन आखिर में वही हुआ जिसका ब्रिटन को डर था । तुर्की के ऑटोमन साम्राज्य ने जर्मनी के पक्ष में रहकर लड़ना तय किया और पहला निशाना ब्रिटन के कब्जे में सुएज नहर पर ताका । इस गिनती से की भारत की ओर के जहाजी ट्रैफिक के अनिवार्य सुवेज नहर पर तुर्की के अंकुश होने के बाद ब्रिटन सिर्फ भारत ही नही , सीलोन , ब्रह्मदेश , होंग कोंग , पूर्व अफ्रीका के गुलाम देशों के साथ के निकटवर्ती संपर्क भी गवा दे । तुर्की की महेच्छा त भारत तक अपना ऑटोमन साम्राज्य फैलाने की थी । जो प्रथम विश्वयुद्ध में और अरबस्तान के पूर्व और पश्चिम के किनारे के प्रदेश में फैला हुआ था ।

ब्रिटेन की 2 योजनाएं थी :
01 तुर्की के लश्कर को सुवेज नहर तक पहुंचने के रोकना
02 ऑटोमन साम्रज्य के ताबे में रहे इराक यानी मेसोपोटामिया को आज़ाद कराना और वहां के आरबो के सरदार माने जाने वाले अमीर फैझल को राजा बनाना जिससे पूरा देश बफ़र ज़ोन जैसा बनने के बाद तुर्की के सैन्य कभी ईरान तक न पहुंच पाए ।

ईरान ( उस समय पर्शिया ) में अंग्रेजों का कौन स्वार्थ था ? पर्शिया के आबादान में अंग्रेजों के पेट्रोलियम तैल के कुएं थे । दुनिया मे तब पेट्रोलियम के भंडार हाथ नहीं लगे थे । दूसरी ओर मोटर , विमान , डीजल इंजिन वाले स्टीमर , सबमरीन के साथ ट्रोकेमिकल्स का एक नया युग खील रहा था । ब्रिटन के अर्थतंत्र के अस्तित्व के लिए आबादन के तेल के कुएं आधारशिला थे । आबादन से सिर्फ 20 किलोमीटर दूर पश्चिम में तुर्की के कब्जे में रहे अरबी समुद्र प्रदेश की सीमा रेखा थी – प्रथम विश्वयुद्ध जब तक चलता हो उस दौरान तुर्की को उसे कब्जे में लेना हो तो उस के 28,80,000 सैनिको के लिए आधे दिन का काम था । ये मुसीबत टालने के एक ही उपाय था – तुर्की को मेसोपोटामिया से बाहर खदेड़ देना चहिये । लेकिन ये काम भारत के सैनिकों को करना था – जान के जोखिम पर और कभी कभी जान देकर !

Sultan of the Turkish Empire - Mahmad
Sultan of the Turkish Empire – Mahmad

थोड़े दिन बाद भारत का सैन्य हजारों घोड़े के साथ कुवैत पहुंच गया । सन 1899 से कुवैत का प्रदेश ब्रिटन के प्रभाव में था या यूं कहें कि ब्रिटन ही उसका गार्डियन था । इसलिये जंगी पैमाने पर आक्रमण शुरू करने से पहले भारतीय सैनिकों को पूर्व तैयारी के लिए वहां रुकना था । मेसोपोटामिया को स्वतंत्र कराने के लिए इस सशस्त्र अभियान में जुड़े सैनिको में से अंग्रेज तो सिर्फ 8000 थे । अग्रेजो की ओर से लड़ने वाले 50000 भारतीय सैनिक अंग्रेजो के लिए जान देने के लिए तैयार हो तब ‘ ऑपरेशन मेसोपोटामिया ‘ के ब्रिटिश जनरल सर ज्होन निक्सन को ज्यादा अंग्रेजों को काम लगाने की कोई जरूरत नहीं थी ।

इतिहास ही नही जिसके कारण भूगोल भी बदलने वाली थी ऐसे युद्ध की कूच का प्रारम्भ हुआ । पूरी सेना घुड़सवार की नही थी । इस लिए सैनिको ने घोड़े पर सवारी करने के लिए बारी बारी से सवारी करने का निर्णय लेना पड़ा था । पहला लक्ष्य यूफ्रेटिस नदी और टाइग्रिस नदी के संगम पर बसे बसरा नाम का नगर था । बाद में बगदाद पर हमला करना था । बगदाद मुक्त होने बाद उत्तर के मोसुल की बारी थी । फिर दमस्कस और बाद में जेरुसलेम की बारी आने वाली थी । ऐसा होता है तो जेरुसलेम के पास ही कही पर इराक जैसा अलग बफ़र जॉन जैसा राष्ट्र को स्थापित करना । जिससे तुर्की भविष्य में भी कभी भी ब्रिटिश मालिकी की सुवेज नहर तक पहुंच न पाए । राष्ट्र का नाम भी ब्रिटेन ने सोच रखा था – इजरायल ! ब्रिटन की इस गंदी राजरमत का सार इतना कि ब्रिटन का राजकीय और आर्थिक हित कभी भी खतरे में ना आये इसीलिए मेसोपोटामिया की प्राचीन भूमि पर स्वतंत्र इराक का और पेलेस्टाइन में इजराइल का सर्जन होना आवश्यक था । मेसोपोटामिया की प्रजा 400 सालो से गुलाम थी । ओटोमन तुर्की के सुल्तान उन पर लोखंडी शासन करते थे । इसलिए ग़ुलाम प्रजा को जनरल सर ज्होन निक्सन के हुमलाखोर सेना को ललकार ने बदले उसका स्वागत किया। क्रांतिकारी अरब के सरदार फैजल ने उन्हें शुभेच्छा संदेश भेजा और जितनी हो सके उतनी मदद करने दरखास्त की ।

नवम्बर 10 , सन 1914 के दिन भारतीय सैनिक बसरा पहुंच सके उससे पहले ही तुर्की की दो डिवीजन उनके प्रतिकार के लिए आ पहुंची । बंदूक और मशीन गन के साथ मोबाइल तोपखाने से वह सेना सज्ज थी । भारत की बात करें तो असरकारक और आधुनिक कही जा सके ऐसे शस्त्र अंग्रेज सैनिकों को दिए गए थे । जबकि ज्यादातर भारतीय सैनिकों को छोटी रेंज वाली बंदूक और बोल्ट एक्शन राइफल से काम चलाना था । उसके बाद तो सिर्फ पिस्तौल थी जो लड़ाई के मोर्चे पर पिस्तौल आत्मरक्षा के लिए बिल्कुल बेकार थी तो आक्रमण के लिए तो कैसे काम आती ? बसरा की दक्षिण में एक सप्ताह तक युद्ध चला । जोभारतीय सैनिकों के लिए ज्यादा नुकसान देह साबित हुआ । कोई भी योजना नहीं थी । इसलिए ज्यादातर सैनिकों को जख्म होने के बाद तुरंत मेडिकल इजाल भी नही मिल सका । जिस के कारण उनकी मृत्यु हो गई । फिर भी नवंबर 21 , 1914 के दिन आखरी में बसरा को जीत लिया गया । आधुनिक युद्ध के व्यूहात्मकता और आधुनिक शस्त्रों के बिना भारतीय सैनिकों ने ये सिद्धि पाई थी । लेकिन इस सिद्धि के लिए उनको बहुत कड़ी किम्मत चुकानी पड़ी थी । जीत मिलने के 8 दिन बाद तक बकरे को कब्जे करने के लिए ज्यादा जंगी पैमाने पर हमला किया गया । लेकिन उनको वापास खदेड़ दिया। जिसमे और भारतीय खून बहा । जिसकी कीमत अंग्रेजों के मन कौड़ी की भी नहीं थी ।

दुसरो की धरती पर दुसरो का युद्ध : तुर्को का सामना कर रहे भारतीय सैनिक
दुसरो की धरती पर दुसरो का युद्ध : तुर्को का सामना कर रहे भारतीय सैनिक


लड़ाई की गतिविधि देखने के लिए ब्रिटिश हिंद के वायसरॉय लॉर्ड हार्डिज ने मेसोपोटामिया की एक छोटी सी मुलाकात ली । भारत से ख़ास आया था तो अपना घमंड तो दिखाता ही। सिर्फ नक्शे को देखकर ब्रिटिश कमांडर ने उसे सलाह दी कि यूफ्रेटिस नदी के समांतर बने कच्चे रास्ते से तुर्की का सैन्य वाया मसूरिया होता हुआ और टाइग्रिस नदी के समांतर बने रास्ते से अमरा होते बसरा तरफ की ओर आ सकता था । इसलिए दोनों नगर को जीत लो ।

खेत मे से बैगन तोड़कर लाना हो ऐसे बिना सोचे हार्डिज सलाह देकर चला गया । लेकिन यह बहुत बड़ी भूल थी । और अक्षम्य इसलिए थी कि ब्रिटिश सेनापति ने उसकी सलाह मानकर उसका अमल भी किया । आगे चलते हुए पहले तो उसने सेना को दो भागों में बांट दिया । उसने एक डिवीजन को उसने नसिरिया की ओर भेजी तो दूसरी डिवीजन को मेजर चार्ल्स टाउन्सहेंड की सरदारी में अमरा की ओर रवाना की । या यूं कहें कि ये करके मौत को न्योता दिया ।


शरुआत में तो सब अच्छा हुआ । चार्ल्स टाउन्सहेमंड की भरतीय डिवीजनल टाइग्रेस नदी के किनारे पर अमरा जीत लिया था । शस्त्रो की कमी , रात्रि का बहुत ठंडा हवामान , ज्यादा बीमार सैनिक , खाने की कमी को देखते हुए अमरा में रुकना आवश्यक था । मेजर भी वही मानता था लेकिन कुम्हार से गधे ज्यादा होशियार होते है ना ? अमरा जीतने की खुश खबर भारत में पहुंची तो वायसरॉय हार्डिज को मिली तो उसे लगा कि ये सब उसकी सलाह के कारण ही हुआ है । युध्ध मोर्चे पर तुर्की के सामने ब्रिटन का डंका बज गया है ऐसा उसने सोच लिया । इसलिए उसने अमरा के बाद ज्यादा उत्तर के कुत-अल-अमरा पर तत्काल हमला करने की सूचना भेजी। वायसरॉय को हकीकत में तो लश्करी मुद्दों में कोई सलाह देनी नही चाहिए लेकिन हार्डिज अपनी टांग अड़ाता रहा ।

ब्रिटिश सरकार ने कुत-अल-अमरा पर आक्रमण करने का प्रस्ताव को अलग प्रस्ताव को कारण सर समर्थन दिया । विश्वयुद्ध में पहले तुर्की साम्रज्य के उत्तर किनारे 18 जहाज , 12 क्रूजर , 29 विनाशिका , 8 सबमरीन और छोटी मनवार से हमला करके ब्रिटिश नौकादल को पराजय सहन करना पड़ा । लेकिन भारतीय सैनिक के जरिए पराजय का कलंक मिटाना अगर मिटाया जा सकते है तो ऐसा मौका छोड़ना चाहिए ।

अगस्त , 1915 में मेजर चार्ल्स टाउन्सहेंड सैन्य कुत-अल-अमरा को जीत ने के निकल पड़ा । टाइग्रिस नदी के किनारे उत्तर पश्चिम की ओर अंधा प्रवास के लिए निकल पड़े । यूरोप से और एक भारतीय डिवीजन वहां का मोर्चा छोड़कर टाउन्सहेंड की सेना में जुड़ने के लिए आ रही थी । लेकिन बसरा पहुंचने में उसे पंद्रह दिन लग जाने वाले थे । उस दौरान सप्लाय बेज से 290 किलोमीटर दूर निकल जाने वाले टाउन्सहेंड को ये विचार भी नहीं आया कि उसके हजारो घोड़े , सैनिको के खाना पानी , दवाइयां , गिने चुने वाहन के ईंधन और शस्त्र व कारतूसों की इतनी लंबी सप्लाय लाइन किस तरह से कार्यरत रहेगी ? और आखरी 10 महीने से लड़ रहे , लागातर कष्ट सहन करने वाले सैनिक भी अभी कितना लड़ेंगे ?

सैनिकों को ने जो कि आखरी जोर लगाया और कुत-अल-अमरा के युद्ध मोर्चे पर भी ऑटोमन तुर्की की सेना को पराजय दिया । विजयकुच का वह आखरी मुकाम था । क्योंकि मेसोपोटामिया के नंबर वन नगर बगदाद मुक्त कराने के लिए चार्ल्स डाउन्सहेंड की सेना आगे बढ़ी और बगदाद की सीमा से सिर्फ 28 किलोमीटर दूर रहकर दोनों पक्षों के बीच खूंखार और निर्णायक युद्ध खेला गया । सफलता बिल्कुल हाथ में थी कि उसे समय दुश्मनों का एक तूफान अचानक आ धमका । चार्ल्स टाउन्सहेंड को तो उसकी कल्पना भी नहीं थी । तब ब्रिटन में तो बगदाद के पतन के बाद घोषणा का एक अहवाल भी बना दिया था । वर्तमान पत्रों ने एडवांस में तंत्री लेख और विश्लेषण तैयार कर रखे थे । जो कि अंत में तो मायूसी की खबर आई कि नवंबर 22 , 1915 के दिन मेजर जनरल टाउन्सहेंड की सेना को पराजय मिला है । लगभग 4000 भारतीय सैनिक और 350 ब्रिटिश सैनिक मारे गए हैं । बाकी के सैन्य जो पीछे हटना पड़ा है । वापस अमरा का रास्ता लेना पड़ा था । खबर बुरी थी , लेकिन अधरी थी । पूरी खबर ब्रिटिश सरकार तक नहीं पहुंची था । वायसरॉय हार्डिज को भी वह खबर नहीं मिली थी । सैनिको ने घायल सैनिको को लकड़ी की गाड़ी पर लहूलुहान हालत में ही सुलाकर कुत – अल – अमरा की दिशा में वापस जा रहे थे । डॉक्टरों की व्यवस्था करने का कोई विचार सेनापति को नही आया । आखिर पहली मेडिकल टुकड़ी अप्रैल 1916 पहले नही आने वाली नहीं थी । पानी खत्म हो गया इसलिए सैनिक मार्ग में प्यासछिपाने के लिए दिन गन्दे नालो का पानी पीना पड़ा । घोड़े और इंसान में उस समय कोई फर्क नहीं रह गया था ।

Charles Townshend - Head of Second Division departed towards Amra (Capdari in the photo)
Charles Townshend – Head of Second Division departed towards Amra (Capdari in the photo)

आखिरकार पैर घसीटते हुए सब ग्यारह दिन बाद दिसंबर 3 दिसंबर , 1915 के दिन सुबह कुत – अल – अमरा नगर में पहुंचे । वहां थोड़ा आराम करने के बाद थोड़ा खाने के बाद नए पुरवठा के साथ जनरल डाउन्सहेंड ने पीछे कदम की यात्रा शरू की होती तो शायद बहुत बड़ी ट्रेजेडी नहीं होती । ज्यादातर भारतीय सैनिकों को सही सलामत वापस जाने का अवसर भी मिलता । लेकिन उसने कुत – अल – अमरा में रुकने का निर्णय लिया । यूरोप से सैनिकों की दो भारतीय डिवीजन आज काल में ही आने वाले थी । ज्यादा तो 3 से 4 दिन लगेंगे । इसलिए बसरा की ओर जाने का कोई अर्थ नही । दो डिवीजन का आगमन हुआ लेकिन कमभाग्य से वह ब्रिटिश भारतीय सैनिकों की नहीं थी ऑटोमन तुर्की के हजारों घुड़सवार और ऊंट सवार सैनिक चारों ओर से क्षितिज पर दिखाए दिए । पूर्व योजना के मुताबिक नगर को घेर लिया। उन्होंने अमरा पर हमला करने के बदले बगर में खाना व डिस्रा सामान कब खत्म होता है इसका इंतजार करते हुए बैठे ।

इस व्यूहात्मक रचना का ख्याल आने के बाद चार्ल्स टाउन्सहेंड के लिए द्विधाभरी समस्या जागी । कुत – अल – अमरा में लगभग 6000 आरबो की बस्ती थी। खाने में अगर वे सब हर दिन हिस्सा लेते रहे तो दो डिवीजन के सैनिक जब तक आये तब तक भारतीय और ब्रिटिश सैनिकों के लिए खाना बचेगा या नही यह भी सवाल था। इस जोखिम को टालने के लिए सब आरबो को नगर के बाहर निकाल देना चाहिए । लेकिन ऐसा कदम उसे अमानवीय लगा । मानवता दिखाने में आखिर में कुछ भारतीय और ब्रिटिश सैनिकों की जान के भोग देना पड़ेगा ये बात वह नहीं समझा और शायद झूठी आशा में रह गया । चारोंओर लगे घेरे के बीच 3 सप्ताह बीतने के बाद खाने का स्टॉक खत्म होने वाला था । तुर्की फौज को परिस्थिति का अंदाजा गया था । इसलिए उसके कमांडर ने मौखिक संदेशा भेजकर बताया कि भूख सहन करने के बदले शरणागति स्वीकार कर लो । टाउन्सहेंड मक्कम रहा । सैनीक भी शरणागति स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं थे । क्योंकि उन्हें भी भारतीय डिवीजन के आगमन के बाद बाजी पलटने की आशा थी ।

लेकिन वास्तविकता क्या है ये सेनापति जनरल निक्सन जानता था । यूरोप से आने वाली डिवीजन अमरा तक का सफर करें और वहां दुश्मन के नेतृत्व में लड़े और पराजय दे बहुत लंबे समय की बात थी। इसलिए निक्सन ने समाधान का मार्ग अपनाया । तुर्की अगर मेजर जनरल टाउन्सहेंड के सैनिकों को तत्काल छोड़ दे तो बदले में उसे 20,00,000 पाउंड की रकम देने की तैयारी दिखाई । लेकिन तुर्की फौज के मुख्य सेनापति ने उसे तुरंत ठुकरा दिया ।

अमरा में हजारों लोगों की मौत अब निश्चित थी। सीरी सामग्री खत्म होने के बाद सैनिकों ने घोड़े को मार कर उसका मांस खाने की बारी आई । ब्रिटिश सैनिक शरू में थोड़े संकुचित हुए । फिर जान की खैरियत के लिए वैकल्पिक खाने के रूप में उसे स्वीकार कर लिया । लेकिन भारतीय उस अखाद्य खुराक को अपनाने के लिए हरगिज तैयार नहीं थे । उत्तर भारत के राम भक्त , बिहारी , राजपूत और मराठा तो अपनी धार्मिक मान्यता में फिसलने को बिल्कुल तैयार नहीं थे । सेना में जो थोड़े मुसलमान थे उनको भी घोड़े पर जिंदा रहना मंजूर नही था ।

थोड़ा समय में भुखमरी में कितने ही सैनिकों को बीमार कर दिया । विटामिन के अभाव में स्कर्वी का रोग लागू हुआ । बाद में कसौटी का तीसरा अध्याय भी जैसे बाकी रह गया हो ऐसे कॉलेरे का रोग बढ़ता गया । दिसंबर , 1915 और जनवरी-फरवरी तथा मार्च 1916 बीत गया । फिर मेजर जनरल टाउन्सहेंड ने जब सिर गिने तो मालूम हुआ कि हर दिन लगभग 6 ब्रिटिश और 21 भारतीय सैनिक मरे थे । दूसरा एक महीना सहन कर लिया लेकिन उस दौरान लगभग 1000 सैनिको ने दम तोड़ दिया ।

आखिर अप्रेल 29, 1916 के दिન यानी के तुर्की के घेरे के बीच लगातार 146 दिन तक मानसिक और शारीरिक मुश्किलो और सैनिकों की मौत सहन करने के बाद मेजर जनरल चार्ल्स टाउन्सहेंड ने पराजय कबूल कर ली । तुर्की के कमांडर को शरणागति का पत्र लिख दिया । सब शस्त्र भी दे दिए। मरने के लिए जिंदा रहे भारतीय और ब्रिटिश सैनिकों को अब मेडिकल इलाज देने के लिए विजेता कमांडर को विनंती की । सारवार तो शायद मिली लेकिन अब उनको ढाई साल तक तुर्की की जेल में रहना पड़ेगा यह बात तय थी ।

इस करुण पराजय को 7 महीने बाद बसरा में भारत की दो डिवीजन सैनिकों ने दिसंबर 16 , 1916 के दिन बगदाद की ओर प्रयाण किया । साथ मे 2000 ब्रिटिश अफसर भी थे । इस दूसरे मिशन का नेतृत्व जनरल फ्रेडरिक मोड़ नाम के सेनापति ने लिया था । डाउन्सहेंड की तरह वह सीधा मंजिल की ओर नही बढा । पर एक के बाद एक जीते हुए मथक पर भारत सैनिक व ब्रिटिश अफसरों की पलटन तैनात करके ही आगे बढ़ा । इस बार सदनसीब से तुर्की के ज्यादा प्रतिकार नही होने वाला था । क्योंकि इस बार तुर्की को दो मोर्चे संभाल ने थे। इजिप्त से फील्ड मार्शल एडमण्ड एलनबी की सरदारी में 12,000 भारतीय सैनिक , 4000 ब्रिटिश सैनिक ,और 2000 अरब सैनिकों की फौज पेलेस्टाइन की ओर आ रही थी । फील्ड मार्शल एलनबी लश्करी के साथ राजकीय दांवपेच भी खलने निकल पड़ा था । ब्रिटिश मलिकी की सुवेज नहर और तुर्की के ऑटोमन साम्राज्य के बीच एक बफर राष्ट्र स्थापित करने की पूर्व तैयारियों उसे करनी थी । पेलेस्टाइन का मोर्चा उसने खोला । इसलिए तुर्की के सुल्तान महमूद ने लाखों सैनिको को उस ओर भेजना पड़ा । इसके कारण मेसोपोटामिया ( इराक ) में जनरल फ्रेडरिक का काम आसान हो गया । ठीक तीन महीने बाद उसने बगदाद जीत लिया । मार्च 11 , 1975 दिन उसने विजेता के रूप में सेना के साथ बगदाद में दाखिल हुआ । इतिहास की मजा तो जरा देखिये सौराष्ट्र काठी घोड़े बगदाद की भूमि पर पड़े। पश्चिम के मोर्चे पर फील्ड मार्शल एलनबी दिसंबर 9 , 1917 के दिन विजेता के रूप में जेरुसलेम में भी दाखिल हुआ । यह पवित्र नगर समेत पूरा पेलेस्टाइन ब्रिटन के कब्जे में आ गया था । लेकिन भारत के 4300 सैनिकों के बलिदान पर ! पेलेस्टाइन की धरती पर इजरायल नाम के राष्ट्र की स्थापना हुई इसके लिए यहूदी प्रजा को भारत का आभार मानना चाहिए ।

ब्रिटिश फील्ड मार्शल : एडमण्ड एलनबी
ब्रिटिश फील्ड मार्शल : एडमण्ड एलनबी

चार सौ साल से तुर्की के ऑटोमन साम्रज्य की एड़ी के नीचे रहे मेसोपोटामिया के अरब कैसे खुशकिस्मत की वे इराक नाम का स्वतंत्र राष्ट्र को पा सके । स्वतंत्र इराक के सृजन गुलाम भारत के 29,500 सैनिको ने दिए बलिदान को आभारी था । अमीर फैझल इसी लिये इराक के राजा बन सके और 60 साल बाद सदाम हुसैन भी जिस के राज्यकर्ता बने वह इराक स्वतंत्र था ।

किसी का एहसान याद रखना राजकर्ताओ की आदत नही होती । फिर भी सद्दाम हुसैन भारतीय सैनिकों के बलिदान को भूले नही । भारत के पूर्व वडा प्रधान खुद स्व. इंदिरा गांधी के कहे मुताबिक बड़े बेटे का नाम उदय रखा ये ठीक सन 1971 में भारत पाकिस्तान के युद्ध के समय लीबिया के सरमुख्यतार कर्नल गद्दाफी ने सब अरब देशों को भारत का पेट्रोलियम सप्लाय रोक देने की हाकल की तब स्व. इंदिरा गांधी का फोन कॉल मिलते ही सद्दाम हुसैन ने बीच समंदर चल रहे अपने एक तैलवाहक जहाज को को तात्कालिक मुंबई की ओर रवाना कर दिया था ।

बोलो , कैसा लगता है ये जान कर की इराक को आजाद कराने के लिए भारत के सैनिक कैसे लड़े होंगे ? दूसरो के लिए दूसरों की जमीन पर खून बहाना वैसे भी आसान काम नही !

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