जब 62 देशों को गुलाम बनाने वाले जब अंग्रेज खुद गुलाम के रूप में बिकते थे
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जब 62 देशों को गुलाम बनाने वाले जब अंग्रेज खुद गुलाम के रूप में बिकते थे

62 देशों को गुलाम बनाने वाले अंग्रेज खुद जब गुलाम के रूप में बिकते थे


     अब हुआ कुछ यू कि इंग्लैंड की दक्षिण की ओर इंग्लिश खाड़ी में चलने वाले लगभग 200 वाहनों का काफिला सागर किनारे की ओर आगे बढ़ा । सागर किनारा कॉर्नवॉल का था।  दिन 1625 जुलाई महीने का था । सुबह का मौसम धुंद वाला था । इसलिए आगंतुक जहाजो की तस्वीर कुछ भूत कैसी दिखती थी । कुछ मछुआरे की नौका तटवर्ती समुद्र में ही थी लेकिन काफिला अंग्रेजों के ध्यान में जल्दी नहीं आया । धुंध जैसे-जैसे बिखरने लगी दृश्य बिलकुल स्पष्ट होता गया । स्तंभ पर फड़फड़ाते ध्वज को देख कर सब तुरंत समज गए कि आने वाला काफिला शुभेच्छा मुलाकात पर नहीं आ रहा था । कॉर्नवॉल पर फिर से तांडव होने वाला था ।
   किनारे पर बुरी खबर आग की तरह फैल गई । पूरे तट की सुरक्षा की जिम्मेदारी जिस के सर पर थी वह नौका दल का सेनापति वाइस एडमिरल जेम्स ब्रेग गहरी चिंता में पड़ गया । आने वाली मुसीबत से कैसे निपटा जाए ? क्योंकि आने वाले जहाज बर्बेरिन कहे जाने वाले समुद्री लुटेरों के थे।  वैसे तो लंबे समय से इन समुद्री लेटेरो के आतंकी हमले होते रहते थे । लेकिन इतने बड़े पैमाने पर यह पहली बार होने वाला था ।

The British barber robbers of North Africa used to reach the English Bay to enslave British men.
The British barber robbers of North Africa used to reach the English Bay to enslave British men.


   जमाना 17 वी सदी के पूर्वार्द्ध का था इसलिए उस समय टेलीग्राफ जैसी कोई संदेशा व्यवहार की सुविधा नहीं थी । जेम्स ब्रेग ने लंदन के एडमिरल को तत्काल मदद की अरे का एक पत्र लिखना पड़ा है । जिसका अब कोई मतकब नहीं रहा था । जहाज किनारे पर आ गए थे । लुटेरे ने चुपके से अतिक्रमण शुरू कर दिया । इस तट के किनारे एक बड़ा गम बसा हुआ था । लगभग 60 जितने अंग्रेजी स्त्री पुरुष उस समय प्रार्थना के लिए चर्च में एकत्रित हुए थे । आंखों में जुनून के अंगार वाले लुटेरो ने चर्च में रहे सब लोगो को बंदी बना दिया । लोगो को जंजीरो में जकड़ लिया । बंदी बनाकर जहाजों के नीचे सब को बंद कर दिया गया । और सब जहाज ने उत्तर अफ्रीका के बार्बेरी किनारे की ओर चल पड़े ।


   अपह्यत हुए 60 गोरे स्त्री पुरुष के समाचार कभी इंग्लैंड को मिले ही नहीं । हमेंशा शायद ऐसा ही होता था । अफ्रीका के उत्तर प्रदेश के अल्जीयर्स जिसे वर्तमान राजकीय भूगोल के मुताबिक अल्जीरिया देश की राजधानी के ) के बाजार में अंग्रेजों के सौदे हो चुके थे। भरे बाजार में बोलिए लगती थी । सबसे ज्यादा पैसे चुकाने वाले को उस अंग्रेज गुलाम पर आजीवन मालिकाना हक प्राप्त होता था । वैसे अगर गुलामो के इंग्लैंड वासी आप्तजन अगर निर्धारित रकम का भुगतना कर दे तो वे आजाद हो सकते थे।  लेकिन उसके लिए बार्बेरी लुटेरों ने जो रकम तय की थी वह शायद ज्यादातर अंग्रेजो के बस के बाहर थी । और टोबोर अंग्रेज उत्तर अफ्रीका में रहे उन लुटेरों का संपर्क कैसे करे यह भी बहुत बड़ी समस्या थी ।


     इस लेख का जो शीर्षक है वही आपको जरूर शंका पैदा करने वाल लगा होगा । क्योंकि हमारे प्रत्येक अनुभव और पढ़े हुए इतिहास के मुताबिक अंग्रेज गुलाम बनाने वाले थे गुलाम बनने वाले नहीं थे । एक तरह से ग़ुलाम बनाने वाले दानव के नाम से ही वे जाने जाते है । जो सही भी है ।  दुनिया में सिर्फ 22 देश ऐसे थे कि जिन पर अंग्रेजो ने  आक्रमण नहीं किया था।  बीसवीं सदी के आरंभ में ब्रिटिश साम्राज्य की बोल बोला तब अपने चरम शिखर पर थी । सब मिलाकर 62 देशों पर अंग्रेजो ने अपनी हकूमत बनाई थी।   देशों की संख्या को अंग्रेजी अल्फाबेट के मुताबिक देखे तो कुछ ऐसी लिस्ट बनेगी। 


   इंग्लैंड के नक्शा देखे तो आश्चर्य होता है कि इतना छोटा सा देश दुनिया के 62 देशों को गुलामी की जंजीरों में बांधकर रखे यह बहुत ही हीन कक्षा का कटाक्ष लगता है । शरुआत से लेकर आखिर तक यानी सन 1601 से लेकर सन 1997 तक ब्रिटिश साम्राज्य कुल 366 वर्ष तक टीका । पृथ्वी का 25% भूमि प्रदेश और वैश्विक मानव बस्ती के 23% कुल 41. 2 करोड़ लोगों को अंग्रेजों ने अपना गुलाम बना कर रखा था । पृथ्वी के सात समुंदर पर ब्रिटेन का अधिपत्य था और दरियाई सर्वोपरिता का महिमा बताने वाला तैयार का गौरव गीत 6 छंद में लिखा गया था ।
‘ Rule , Britannia ! Rule the waves ;
  Britons never will be slaves . ‘

   इस दो पंक्ति में से दूसरी का अर्थ यह होता है कि अंग्रेज भूतकाल में गुलामी सहन कर चके थे लेकिन फिर कभी गुलाम नहीं बनने वाले । 


                ◆◆◆◆

   यह सुचितार्थ हकीकत में यथार्थ है । अंग्रेजो के लिए ग़ुलामी नई बात नहीं थी ।  अनेक साल उन्होंने ग़ुलामी में बिताए थे । ईसा पूर्व 56 में उन्होंने रोमन सम्राट जूलियस सीजर ने यूरोप के गोल/ Gaul  वर्तमान फ्रेंच प्रदेश को जीतकर वहां के कुछ जहाजों की टुकड़ी के साथ ब्रिटानिया पर यानी कि ब्रिटेन की मुलाकात ली थी । तब उसका इरादा सिर्फ उस द्विप का अवलोकन करना था। उसने देखने के बाद उसे यह द्वीप  जितने योग्य लगा । इसलिए दूसरे साल सन ईसा पूर्व 55 में उसे जंगी जहाजी बेड़ा के साथ ब्रिटानिया पर आक्रमण कर दिया  । मूलभूत रूप से एंग्लो सेक्शन जाति के सशस्त्र अंग्रेजों ने किनारे पर ही हमले को चुनौती दी ।  क्योंकि रोमन सैनिक किनारे आ तो जाते लेकिन उसके बाद उनके लिए लड़ना बहुत कठिन था । अब ये काम सीजर के लिए भी मुश्किल हुआ । विशाल कद जहाज भरकर सेना तो वह ले आया था लेकिन उसमे एक भी घुड़सवार सैनिक नही था ! समंदर में सब की आगेकुच धीमी ही रही । जब कि रथ और घुड़सवार ब्रिटानिया के अंग्रेज सैनिको ने बड़ी तेजी से सबको उनकी नानी याद दिला दी ।

The war between Britannia and Emperor Caesar in 55 BCE
The war between Britannia and Emperor Caesar in 55 BCE

     किनारे पर कमर तक डूबे पानी में चलने वाला जंग बहुत लंबा चला । रोमन सेना के लिए यह हमला बहुत ही खूनी साबित हुआ।  कुछ समय बाद समुद्री भर्ती  जब चढ़ने लगी तब सम्राट जूलियस सीजर लाचार बन गया।  उसने अपनी सेना को वापस बुला लिया । हालांकि ब्रिटानिया के अंग्रेजी सिर्फ उस साल के लिए राह चैन की सांस ले सके । दूसरे साल सम्राट सीजर ने जबरदस्त और बड़े पैमाने ओर हमला लाया । लश्करी काफ़िले में 800 जहाज 50000 पैदल चलने वाले सैनिक और दो हजार घुड़सवार सैनिक थे । इस सेना का सामना अंग्रेज नही कर पाए और शरणागति स्वीकार कर युद्ध विराम मांग लिया ।


    विजयी हुए सीजर अपनी हकूमत स्थापित कर सकता था । लेकिन  यूरोपीय भूमि पर दुश्मनों का जोर बढ़ने की खबर जैसे ही उसे मिली की थोड़े ही सप्ताह में वह लश्कर समेत वापस चला गया । ब्रिटानिया ने उसके बाद लगभग 100 साल तक स्वतंत्रता के मुक्त वातावरण में बिताए । तकदीर ने फिर अपना रुख बदला ।  तत्कालीन रोमन सम्राट क्लॉडियस ने एंग्लो सेक्सन मूल के अंग्रेजों का ब्रिटन जीत लिया और उसे प्रांत के रूप में रोमन साम्राज्य में मिला दिया । उसके लगभग 367 साल तक अंग्रेज  रोमन के ग़ुलाम रहे । अब भारत की बात करे तो भारत अंग्रेजों के गुलामी काल को सहन किया उस गुलामी काल से लगभग दो गुना ग़ुलामी काल अंग्रेजों ने रोमन साम्राज्य का सहन किया था । एक खास बात याद रखे कि अंग्रेज मूल एंग्लो सेक्शन जाति के और उनका आवास प्रदेश बिल्कुल अलग था । रोमन लोगो ने उन पर हकूमत स्थापित की थी । उत्तरी प्रदेश में सेल्ट / celt जाति के लोग बसते थे जो समय जाते स्कॉटिश के नाम से जाने जाते थे ।  प्रदेश का नाम भी उन्ही पर स्कॉटलैंड होने वाला था ।  अंग्रेजों की उनके साथ बिल्कुक जमती नही थी।  इतना ही नही दोनों पक्षों के बीच आये दिन युद्ध होते रहते थे । वह भी बहुत हिंसक पैमाने पर !


    सन 410 में रोमन साम्राज्य ने इंग्लैंड ( ब्रिटानिया ) को स्वतंत्रता दे दी । शासन तंत्र को समेटकर चले गए । रोमन तो चले गए लेकिन उनकी लेटिन भाषा  वही पर रह गई। क्योंकि तब अंग्रेजी का कोई अस्तित्व ही नहीं था । बाद में अंग्रेज 650 साल तक आजाद रहे । सन 466 में फ्रांस के नॉर्मनडी का उमराव विलियम बड़े लश्कर के साथ इंग्लैंड पर चढ़ आया और गिने-चुने इंग्लिश एक्शन उमराव को मार डालें । खुद William the Conqueror के  नाम से इंग्लैंड का राजा बन गया । बसने  फ्रेंच भाषा दाखिल की । जिसके व्याकरण और शब्दों का स्थानिक एंग्लो सेक्शन भाषा के साथ क्रमिक मिश्रण से लंबे समय के बाद जिस भाषा का गठन हुआ वह अंग्रेजी थी । हालांकि विद्याव्यासंग के और विज्ञान के क्षेत्र में लेटिन भाषा जारी रही । सालों बाद आइज़क न्यूटन ने गति और गुरुत्वाकर्षण के सिद्धांतों का जो प्रिंसिपिया पुस्तक लिखा वह लेटिन भाषा में ही था । इंग्लैंड में नॉर्मनडी के  फ्रेंचो का पड़ाव हमेंशा के लिए रहा। सदियों के बाद वहां के शासक न फ्रेंच रहे और ना ही एंग्लो सेक्शन रहे । प्रजा जन न एंग्लो सेक्सन रहे। अब सब अंग्रेज थे । उनके बीच कोई भेद रेखा नही थी ।


    
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     अंग्रेजों के लिए सरासर गुलामी का आपत्ति काल 15वीं सदी में शुरू हुआ और ढाई सौ साल तक चला । सन  1453 में ऑटोमान वंश के तुर्को ने इस्तांबुल जीत लेने के बाद पूरा तुर्की साम्राज्य उनके हक में आया । उत्तर अफ्रीका के अल्जीयर्स ट्यूनिस त्रिपोली उसमें शामिल थे और वह तो वहां के बर्बर और मूर्ख कहे जाने वाले अरबोने भूमध्य समुद्र में ख्रिस्ती धर्मी देशों के जहाज को जप्त करना और उनके नाविकों को पकड़कर गुलाम बनाने के लिए प्रोत्साहित किये। ओटोमन तुर्की के नौका दल के खूंखार मिजाज के एडमिरल हेरेद्दीन बार्बोसा ने इसकी अगवाई ली थी ।  ख्रीस्तीयों का दोष यह था कि वह विधर्मी थे । इटालियन भाषा में बार्बोसा  ब का अर्थ लाल दाढ़ी वाला होता है । इसके तीन भाइयों ने सोलवीं सदी में स्पेनिश पोर्तुगीज ग्रीक और ब्रिटिश जहाजों पर हमले  का काम शुरू कर दिया था ।

Hereddin Barbosa
Hereddin Barbosa


    अब सही बैग करें तो ख्रीस्तीयों पर आने वाला दूसरा खतरा हकीकत में Holy Emperor नाम से विभूषित रोमन सम्राट चाल्र्स पांचवा ने सन 1523 में हेरेद्दीन बार्बोसा  का सामना करने के लिए 40 जहाजों का काफिला तैयार करवाया । उसकी कमान सौंपी इटाली के बाहोश सेनापति आंद्रिया दौरिया को । इटाली के दक्षिण में खेले गए सागर संग्राम में बार्बोसा ने आधे से ज्यादा जहाजों को तोप मारे से छिन्न-भिन्न कर दिया । बड़ा धर्मगुरु पोप पॉल तीसरे ने ख्रिस्ती धर्म के नाम से भूमध्य समुद्र तट के देश को साथ देने के लिए कहा। जिसके जवाब में पोर्तुगल , स्पेन ,  इटली के वेनिस तथा स्पेन प्रजासत्ताक और दो स्वायत्त प्रदेश ने कुल मिलकर 302 जहाजों का जंगी बेडा तैयार किया । जहाजो में नाविक , तोपची  और सैनिक सब मिलाकर 60000 जितने थे । सामने बार्बोसा का काफिला सिर्फ 112 जहाजों का था और 12000 नाविक तोपची व सैनिक थे। फिर भी अद्भत युद्ध कौशल का जोहर दिखाते हुए बार्बोसा ने यूरोपीय बेडे को उसने तबाह कर दिया । सागर संग्राम Battle of Preveza नाम से तुर्की देश के इतिहास  का एक सुनहरा प्रकरण बना ।

Battle of Preveza of 1538, after which the entire Mediterranean sea came under the occupation of Barberio
Battle of Preveza of 1538, after which the entire Mediterranean sea came under the occupation of Barberio


  भूमध्य समुद्र के बार्बेरी लुटेरो के एकाधिकार के नीचे आया । जहां पर यूरोपीय जहाजों की सलामती उसके बाद उनके खुद के दम ही  निर्भर रहने वाली थी ।
    अब तो समुद्री  लुटेरे को खुला दौर मिल गया था । उस समय के लुटेरे के जहाज पतवार से चलते थे ।  लेकिन कुछ समय बाद अंग्रेज और डच के कुछ विश्वासघाती नाविकों की बातमी से उन्होंने विविध तरह के कई सारे जहाज बनाए थे । जहाजो के बहुत सारे पारिभाषिक शब्दों को भी ये लुटेरे नही जानते थे । यहां तक की सढ़ वाले खास आकार प्रकार के पुर्जे वाले जहाज होते है ये भी उनको मालूम नही था । ये काम कारीगरों का था । बार्बेरी लुटेरो की खुशकिस्मत थी कि इस हुन्नर में प्रवीण कुछ डच और अंग्रेज नाखुदा उनको मिल गए । जो पैसो के लिए कुछ भी कर सकते थे।  पैसा देकर उनको मालामाल कर देने के लिए लुटेरे भी तैयार थे । बस उनको उन खास पुर्जो वाले जहाजो की जरूरत थी ।

Barbario built modern 17th century ships with the help of European sailors. After that, Briton and Ireland also came in their reach.
Barbario built modern 17th century ships with the help of European sailors. After that, Briton and Ireland also came in their reach.


        अब छोटे पतवार से चलने वाली नौका के बदले लुटेरो ने पवन से चलने वाले बड़े बड़े जहाज बने । अब तो पश्चिम में इंग्लिश खाड़ी तक का समंदर बार्बेरियो के हाथ में आया । इटाली , स्पेन और पोर्तुगल के जहाज नाविक उनके हत्थे चढ़ जाते थे। लेकिन सन 1620 से जब बड़े बड़े जहाज उन्हें मिल गए तओ उन्होंने इंग्लैंड पर छापामार हमले शुरू कर दिए । भूमध्य समंदर का किनारे वाले स्पेन और पोर्तुगल जैसे देशों को इन लुटेरो से लड़ने का अनुभव था। बहुत कम जहाजो के बने ब्रिटन का शाही नौकादल बार्बेरीयो का सामना करने में सक्षम नही था ।


    ब्रिटन में हाहाकार मचाने वाला दूसरा हमला बार्बेरी काफिला ने जून 20 , 1631 के दिन किया । लक्ष्य ब्रिटन के पश्चिम में आयरलैंड देश का किनारे बसा बाल्टीमोर गांव था ।  वैसे देखते हुए यह हमला बेटन पर ही हुआ था ऐसा हम कह सकते हैं क्योंकि ज्यादातर रहने वाले अंग्रेज वसाहती ही थे । व्यवसाय चलाने वाले बाल्टीमोर में स्थाई हुए थे । आइरिशो में से कुछ लोगों को उनकी हाजरी से तकलीफ थी जबकि बाकी के लोग अंग्रेजों रोजगारी मिलने से संतुष्ट थे ।
   एक विरोधी आइरिश ज्होन हेकेट को अंग्रेजों के प्रति बहुत ही ज्यादा द्वेष था। वह भी मछुआरा ही था । इसलिए अंग्रेज उसके मन आइलैंड के समुद्री मछली भंडार में से बहुत ज्यादा भाग लेने वाले धंधा किए प्रतिस्पर्धी थे ।  सन 1623 में हुआ यूं के समुद्री लुटेरे ने उसे नौका समेत उसे पकड़ लिया और ग़ुलाम बनाया । ज्होन हेकेट ने तड़जोड करके अपनी मुक्ति के बदले में बार्बेरी काफिले को बाल्टीमोर के किनारे तक ले आया । काफिला तुर्की के हुकूमत नीचे रहे अल्जीरिया का था ।


   समुद्री लुटेरों ने 237 गांव वासियों को पकड़ लियौ । बेड़ियों से बांधे और जीवन भर के गुलामी सहन करने के लिए जहाजों में धकेल दिए । बंदी वालों में सबसे ज्यादा संख्या अंग्रेजों की थी । ओटोमन सुल्तान के इस जहाज को पतवार से चलाया जाता था। जो बाल्टीमोर के ग्रामवासी जैसे गुलाम ही पतवार चलाने का काम करते थे । परिश्रम के बदले में खाने के लिए उनको हर रोज रोटी जैसे तुर्की ब्रेड और पानी उपरांत तीसरी चीज अगर कोई मिलती थी तो वह थी पीठ  पेट पर लगने वाले चाबुक के कोड़े । इन गुलामों का शेष जीवन जहाज के नीचे बने पतवार चलाने में ही बीत जाता था ।  मृत्यु पर्यंत वो कभी समुंदर का किनारा तक देख नहीं पाते थे ।
    अपहर्ता के सकंजे में फंसे बाल्टिमोर गांव वालों में से एक आदमी ने उसके परिवारजनों कीमती दंड के बदले में छुड़ा लिया । दूसरे दो लोगो को 15 साल बाद छुड़ाया गया । बाकी बचे लोगो का क्या हुआ ये कभी किसी को मालूम ही नही हुआ । समुद्री लुटेरो को बाल्टिमोर लाने वाले ज्होन हेकेट को उसके किये की सजा भुगतनी पड़ी । गांव वालों ने उसे पहाड़ी पर गले फांसी देकर लटका दिया।  समुद्री लुटेरे को हमले के बाद जो लोग बच गए थे उन्होंने सागर किनारे का बाल्टीमोरा छोड़ दिया ।  थोड़ी दूर पठारी विस्तार में स्क्रिबेरिन नाम का गांव में वे चले गए । इस घटना का वर्णन करने वाले  The stolen Village और  Pirates of Baltimore को पढ़े तो आपको महसूस होगा कि सच मे बहुत बड़ा हाहाकार मचा होना चाहिए ।

Pirates of Baltimore and The stolen village
Pirates of Baltimore and The stolen village


    दूसरी ऐसी घटनाओं का विवरण प्रकाश में नहीं आया ।  लेकिन अंक के जरिए समुद्री लुटेरों की व्यापकता का ख्याल मिलता है ।  ब्रिटेन से अमेरिका के वर्जीनिया बंदर और कैनेडियन न्यूफाउंडलैंड की ओर जाते हुए और वहां से वापस आते हुए जहाजों को बार-बार लुटेरो का खतरा रहता था । और कैसा ? तो ब्रिटन के pool  बंदरनगर के मेयर ने 1621 में प्रिवी काउंसिल को पत्र लिखा : पिछले 10 दिन में ऑटोमन तुर्की के समुद्री लुटेरों ने हमारे 27 जहाज और 200 से भी ज्यादा नाविकों को पकड़ कर ले गए है । जहाजो के लिए संरक्षण की तुरंत आवश्यकता है । ‘ अब इस पत्र का कोई मतलब नही था। क्योंकि ब्रिटेन का शाही नौका दल सिर्फ नाम का ही था ।  नाखून और दांत बिना शेर जैसा ।


    अब तो बार्बेरी काफिला की  पहुंच इतनी लंबी तक थी कि जुलाई 1927 के दिन ब्रिटेन के उत्तर में आइसलैंड द्वीप पर भी हल्ला किया। 800 जितने स्त्री पुरुषों का अपहरण किया । आइसलैंड की बस्ती उस समय सिर्फ 60000 जितनी ही थी । इसी तरह से दूसरे यूरोपियनो को भी गुलाम पकड़ते थे । उन गुलामों के बदलें  में मुक्तिदंड की वसूली के लिए कितने लोगों को ग़ुलाम बनाया उसका कोई सत्तावर आंकड़ा तो कभी बाहर आया हु नही । बस अनुमान करना था। ऐतिहासिक नोट्स के आधार पर उसे आखिर में 1250000 के आसपास माना गया ।


    बंदी बनने वालों में ज्यादातर अंग्रेज थे ।  दो कारण से ऐसी स्थिति पैदा हुई थी । ब्रिटेन प्रभावी नौका दल के पास कोई प्रभावी नौका दल नहीं था ।  दूसरा ब्रिटेन का राजा चालर्स पहला लुटेरो को ग़ुलाम अंग्रेज के बदले में कोई रकम चुकाने के लिये तिजोरी में से एक भी पैसा देने के लिए तैयार नहीं था ।  गुलाम स्त्री पुरुषों के परिवार दंड के पैसा का बंदोबस्त करना था । लेकिन परिवार के पास उतने पैसे नही थे वे भी बिल्कुल लाचार होते थे । और तो और हजारों किलोमीटर दूर उत्तर अफ्रीका जाना और गुलामों में से अपने परिवार जनों का पता लगाना है उनके लिए नामुमकीन काम था  । इतिहास के पन्ने में जो  लिखी हेन्री हेमोम की आपबीती उसके बारे में सब कुछ कहती हैं ज् अटलांटिक महासागर और भूमध्य समुद्र के बीच जहाँ मिलन होता है वह जिब्राल्टर के पास सन 1616 में बार्बेरी लुटेरो के हाथे पकड़े जाने के बाद गुलामों के सौदागरों ने उसे छोड़ने के लिए 80 पाउंड का भाव तय किया था।  यह रकम इतनी बड़ी थी कि हेन्री हेमोम  के पास नहीं थी और ना ही उसके परिवारजनों के पास । हेन्री का शेष जीवन वतन से दूर अल्जीयर्स में या फिर हवाई जहाज में पतवार चलाने वाले की अवस्था में ही बिता था ।


     यह  दुखांत किस्सा दूसरे कितने ही किस्सों पर रोशनी डालता है। गिरफ्तारी या ग़ुलामी से बचने के लिए कुछ ब्रिटिश नाविक परदेसी जहाजों में नौकरी पाने के लिए काम करने लगे । तब राजा चार्ल्स पहला ने उन्हें वापस लाने के लिए फरमान जाहिर किया । लिखित संदर्भ के अभाव में यह जानना मुश्किल है कि राजा केस फरमान किस हद तक असरकारक रहा । परिस्थिति उसके बाद तो और ज्यादा बिगड़ गई और दिसंबर 1640 में कमेटी ऑफ अल्जीयर्स नाम के आयोग का गठन किया गया । सन 1645 में कॉर्नवॉल के किनारे बार्बेरियो ने बड़े पैमाने पर हमला किया।  240 से स्त्री पुरुषों का अपहरण किया गया । तब ब्रिटिश पारलामेंट ने एडमंड कैसेन नाम के प्रतिनिधि को समुद्री लुटेरों के पास बातचीत करने के लिए अल्जीयर्स भेजा । बान के पैसे भी दिए । केसेन ने वहां के गुलाम अंग्रेज पुरुष के लिए 30 पाउंड और स्त्री ग़ुलाम के लिए 45 से 80 पाउंड चुकाये। लगभग ढाई सौ लोगों को छोड़ने के बाद जब पैसे खत्म हो गए । ग़ुलामों की संख्या लाखों में थी । केसेन भारी ह्रदय के साथ   स्वदेश वापस आया ।  8 साल उसने यहां वहां से डोनेशन लेकर दूसरे 150 लोगों को आजाद करवाया । कुछ रोमन कैथोलिक पादरियों ने भी उनके पास जमा होती रकम को ग़ुलामों की बंधन मुक्ति के लिए इस्तेमाल करते थे ।  फिर भी बहुत कम अंग्रेज के नसीब में ऐसी आजादी लिखी हुई थी । लूंट कितनी बड़े पैमाने पर चलती थी इस बात का अंदाजा हम शायद नहीं लगा सकते ।

17th century portrait  Roman Catholic clergy To barberio Christian slave in return Sonamhor is paying.
17th century portrait  Roman Catholic clergy To barberio Christian slave in return Sonamhor is paying.


    बाद में कुछ सँजोग ऐसे बने की लुटेरों का उपद्रव और भी बढ़ गया । शासन तंत्र के सामने आंदोलन होने के कारण सुल्तानों की कोई रोक नहीं रही । बार्बेरी के ट्यूंनिश , अल्जीरिया और त्रिपोली राज्य मनमानी करने के लिए आजाद हो गए । उन्होंने बेधड़क समुद्री लुट का क्षेत्र बढ़ा दिया और ज्यादा हिम्मत से उन्होंने लूट की जो लंबे समय के बाद बैक फायर होने वाली थी ।
       अक्टूबर 11 ,  1784 के दिन भूमध्य समंदर में चलने वाला Besty नाम का अमरीकन जहाज को लुटेरो ने जप्त किया। अब अमरीका को भूमध्य समुद्र से बहुत दूरी पड़ जाती थी । इसलिये अमरिका के स्पेन देश ने अमरीका के प्रतिनिधि बनकर लुटेरो से बातचीत की । स्पेन ने जहाज और उनके नाविकों को छोड़ने के लिए कहा।  लुटेरे उत्तर अफ्रीका के मोरोक्को के थे । ट्रीपोली , अल्जीयर्स और ट्यूनीश के साथ मोरोक्को भी लुटेरो का देश था । ऑटोमान तुर्की के सुल्तान तब सिर्फ शो पीश बने हुए थे । अब ये चारों अपने राजा के रोल में थे ।  गुलामों की व्यापार में उनके बीच में धंधाकिय स्पर्धा का आरंभ हो चुका था ।


  
      स्पेन के राजा ने अमेरिकी सरकार को सलाह दी कि समुद्री लुटेरों के साथ काम निकालने का सही रास्ता ये है कि उनको कुछ पैसे देकर अमरीकी जहाज और नाविकों की सुरक्षा की लिखित गारंटी ली जाए । अमरीका को सच मे मान भंग को भुलाकर ऐसा कदम उठाना पड़ा । क्योंकि  ब्रिटेन की तरह उसका भी नौका दल तब किनारे पर ही चल रहा था । उस दौरान  अल्जीरिया के शिकारी काफिले ने जुलाई 1785 ने अमेरिका के  Maria और Dauphin नाम के दो जहाज और उनके कुल 115 नाविकों को नागरिकों को पकड़ लिया । नाविकों को 10 साल तक कैद में रखा ।  अमेरिका की अमरीका के सरकार ने आखिर में मांग के मुताबिक  $ 10,00,000 चुकाए तब उन सब का छुटकारा हुआ। स्वदेश आकर उन्होंने जब अपनी वितक कथा सुनाई उसे सुनकर अमरीकी समाज में क्रोध का ज्वालामुखी फट गया ।

Sketches of the persecution of Barbario made according to the description of the Christian slaves who came home from the slavery
Sketches of the persecution of Barbario made according to the description of the Christian slaves who came home from the slavery


     अमरीका के राष्ट्रपति जॉन ऐडम्स , थॉमस जेफरसन ने ट्रीपोली के राजदूत के साथ मंत्रणा करने के लिए लंदन गए । समुद्री लुटेरो का सीधा संपर्क करना शक्य ही नहीं था ।  और सीधा उनके पास जाने में कोई सलामती नहीं थी ।  दोनों ने राजदूत के पास जवाब मांगा कि दूसरे देशों के जहाज जप्त करना , नाविकों को पकड़ना और निर्दोष स्त्री पुरुषों को गुलामी में जकड़ना ये बार्बेरी  का कौन सा अधिकार है ?  राजदूत ने जवाब दिया कि उनके धर्म ग्रंथ में ऐसा लिखा है । बार्बेरी गोरी चमड़ी के गुलामों पर जो शारीरिक सितम गुजारने की जो पद्धति अपनाते थे उसमे उनकी जंगलियत के दर्शन होते है । गुलाम  नागरिक के बोली लगाने में सहुलियत रहे इसलिए उसकी मजबूती की झलक दिखाने के लिए उसे एक ही जगह पर कूदने के लिए मजबूर किया जाता था । कभी आराम करता तो उसके पैर में चाबुक मारा जाता था । गुलाम की उम्र भी खरीददार ध्यान में लेते थे ।
   धन के लोभी  कुछ कुशल यूरोपियन जहाजी भी लुटेरो की छावनी में मिल गए थे । अमरीका , ब्रिटन , पोर्तुगल और स्पेन जैसे देशों की ये बड़ी कमनसीबी थी । इन मतलबियो ने  धर्म परिवर्तन किया था । लुटेरो के काफिले में उन्हें महत्व के स्थान दिए गए थे । एक नेधरलैंड का नाखुदा था जिसका नाम जान जाँझुन था । उसमे धर्मांतर के बाद मुरात रेईस नाम अपनाया था । आयरलैंड के तटवर्ती बाल्टीमोर पर और आइसलैंड पर जो हमले हुए उस की अगवाई इसी से आदमी ने ली थी । कुछ अंग्रेज नाविक भी  बार्बेरियो के साथी बने थे । पोर्तुगल और स्पेन पर होने वाले आक्रमणों में वे शामिल होते थे । स्पेनिश नवलकथाकार और डॉन केहोट के लेखक मिग्युल द सर्वांतिस अल्जीयर्स में सन 1575 से सन 1580 तक  गुलामी की अवस्था में सितम सहता रहा रहा था । रोमन पादरियों ने  बान की रकम चुका कर उसे छुड़ाया था।

Noted Spanish novelist Miguel the Servantis was caught in the clutches of Barberio. He was freed after five years.
Noted Spanish novelist Miguel the Servantis was caught in the clutches of Barberio. He was freed after five years.


   यह ह्रदय द्रावक अनर्थ  ढाई सौ साल तक चला ।  ज्यादातर ग़ुलाम बने अंग्रेज दुर्भाग्य से फिर से अपना वतन देख नहीं पाए । ट्रीपोली अल्जीयर्स या फिर मोरक्को में ही उनका जीवन बीत गया । ब्रिटन अमेरिका जैसे देशो के पास प्रभावी नौका दल नही था बस यही कारण उनकी मजबूरी थी । तोपों से लैस जहाज बनाने में उनके उन्होंने समय सर कोशिश भी शुरू नहीं की थी ।  समुद्री लुटेरो ने उनका जहाजी बेड़ा नाश कर दिया तब जाकर वे जागे ।
    ब्रिटन ने प्रतिकार का सर्वप्रथम कदम सन  1621 में उठाया । अल्जीयर्स पर उसके शाही नौकादल ने तोपमारा किया लेकिन वह इतना असरकारक नही था। और 50 साल तक समुद्री लुटेरे ने अपनी मनमानी करते रहे। सन 1665 में ब्रिटिश काफिला ने ट्यूनिश में रहे बार्बेरी जहाजों का प्रचंड गोलंदाजी से नाश कर दिया और अल्जीयर्स पर इसी तरह से प्रहार चलाकर वहां के हजारों गुलामों को छुड़ा लिया गया । सन 1671 में अल्जीरिया के बोगी/Bougie  नाम के बार्बेरी बेड़े को ब्रिटेन के शाही नौका दल ने जला दिया । लकड़ी से बने जहाज में से ज्यादातर आग की लपेट में भस्म हो गए । सन 1676 में ट्रीपोली के बंदरगाह में एक काफिला पर भी ऐसा ही आक्रमण किया गया ।
   लुटेरो को ये बहुत गंभीर फटका लगा था ।  जबकि ब्रिटेन ने 1770 में स्पेन के सामने युद्ध खेल कर उसके जिब्राल्टर खड़क को जीत लिया । जबल अल तारिक यानी तारिक का खड़क ऐसा नाम वाले जिब्राल्टर के पास अटलांटिक महासागर और भूमध्य समुद्र का मिलन होता हैं। यूरोप और अफ्रीका को अलग करने वाले वहां के समुद्र की चौड़ाई 14.3 किलोमीटर से ज्यादा नहीं थे । ईसलिए ब्रिटेन की ओर क प्रवेश मार्ग की नाकाबंदी होने के बाद समुद्री लुटेरे ब्रिटन तक नहीं पहुंच सकते थे ।
    इतने फटके पड़ने के बाद भी बार्बेरी सुल्तान अभी भी आसमान पर थे।   दिसंबर 1800 में ट्रीपोली के शासक युसूफ करमअली ने भूमध्य समुद्र में अमरीकी जहाजों पर हमला न करने के बदले मे बसूल की जाती क़ीमत बढा कर 2,50,000 डॉलर कर दी । अमेरिका अगर इस मांग को स्वीकार नही करता तो परिणाम भुगतने के लिए अल्टीमेटम दे दिया । थॉमस जेफरसन अमेरिका के प्रमुख पद पर आ चुके थे । कमांडर रिचार्ज डेली के सरदारी के नीचे 20 जहाजों का बेड़ा ट्रीपोली भेजा गया । तोपो से लुटेरो के अंदाजन 812 बार्बेरियो की मौत हो गई और कुछ जहाजों को भी खत्म कर दिया गया । कुछ जहाजों को कमांडर जप्त भी कर सकता था लेकिन राष्ट्रपति थॉमस जेफरसन ने अमेरिका के बंधारण के अनुसार युद्ध की घोषणा नही की थी ।  इसलिए कमांडर ऐसा कदम नहीं उठा सका । कमांडो ने समुद्री लुटेरों के जहाजों को समुंदर में डुबो दिया।


     यह हमला बहुत भयानक नहीं था । सन  1815 में दूसरा मिशन जरूरी लगा । निशान अल्जीयर्स था । अमरीकी काफिले में अब 10 लड़ाकू जहाज थे । ये सब नई पीढ़ी के थे ,  इसलिए उनका स्ट्रक्चर भी अद्यतन था ।  और तो और भी सब और ज्यादा मजबूत और शक्तिशाली थे ।  विग्रह सिर्फ 3 दिन चला और विरोधाभास यह हुआ कि यूरोप अमेरिका के नाविकों की गिरफ्तारी होने के बदले 486 समुद्री लुटेरे को कैदी बनाये गए ।

War against pirates in 1801!
War against pirates in 1801!


    यह संघर्ष उठा उस समय में ब्रिटन भी नये जमाने के और ज्यादा प्रहार शक्ति वाले जहाज बांध चुका था । लंबी दूरी तक फेकने वाली तोप वाले जहाज भी सेंकडो की संख्या में थे । जिब्राल्टर की समुद्री फाटक बंद करने के बाद  ब्रिटन का शाही नौका दल ने चारों बार्बेरी देशो की खबर लेना शुरू कर दिया । ब्रिटन ने तेज गति से चलने वाले फतेहमार जहाज बनाए थे । जो शत्रुओ के काफिले पर गेरिला पद्धति से गोलन्दाजी चलाने के बाद तुरंत सरके जाते थे ।
   लुटेरे जो कि सालों तक टक्कर देते रहे ।  दरियाई मुठभेड़ में नुकसान दोनों पक्षों को होता था । लेकिन अमरीकी हमले के समय अच्छी खासी लड़ाई शक्ति खो कर समुद्री लुटेरों को अपना जहाज गवाना बड़ा ही मुश्किल पैदा करने वाला वाकया था । ब्रिटन और फ्रांस नके सन  1833 में अल्जीयर्स पर सीधा हमला किया । ट्रीपोलि और ट्यूनीश के लिए यह हमले सिख थे । आतंकी प्रवृत्ति उन्होंने बंद कर दी । कब्जे में रहे गुलामों को मुक्त कर दिया । भूमध्य समुद्र उसके बाद ब्रिटिश नौका दल के मालिक का समंदर बना । यह सुखद पूर्णाहुति को कवि ने जब थॉमसन ने गीत में कहा तो यू कहा :
‘ Rule , Britannia ! Rule tha waves ,
Britons never be slaves . ‘

   सन  1530 तक के 1830 तक के 300 साल में कितने अंग्रेज स्त्री पुरुषों ने ऑटोमन तुर्की के चार बार्बेरी राज्य में और तुर्कि के  सुल्तानों के वहां गुलामी की उसका आंकड़ा तो हमेंशा  के लिए अनुमान का ही विषय रहने वाला था ।  अंग्रेजों के साथ स्पेनिश , पोर्तुगीज वैगरह सब को गिनती में लेते है तो बहुमान्य  आंकड़ा 8,00,000 का हो जाता है ।  लेकिन अमेरिकन इतिहासकार प्रो . रॉबर्ट  डेविस ने पुराने दस्तावेज , उस समय के प्रकाशन और दूसरे संदर्भ के आधार पर 12,50,000 का अंक ज्यादा सटीक बताया । इस अंक वजूद साबित करने के लिए उसने 2004 में उन्होंने Christian Slaves , Muslim Masters : White Slavery in the Mediterranean , the Barbary Coast  नाम की किताब लिखी । प्रो . रॉबर्ट डेविस ने तार्किक बात यह की थी की बार्बेरी काफ़िले जो बाल्टिमोर और कॉर्नवॉल जैसे हमले ही सरकार के ध्यान पर आते थे । बहुत छोटेगांव में रातों-रात उठाये जाने वाले आवसियों का कोई भी समाचार राजधानी लंदन तक पहुंचता ही नहीं था ।

chriatian slaves, muslim masyers. Document of the well-known tales of 12,50,000 British and European slaves
chriatian slaves, muslim masyers. Document of the well-known tales of 12,50,000 British and European slaves

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