Top 17 एनआरआई ( NRI ) भारतीय

Top 17 एनआरआई ( NRI ) भारतीय

भारत मे 9 जनवरी के दिन प्रवासी भारतीय दिन के रूप में मनाया जाता हैं । बाहर विदेशों में बस चुके वापिस भारत आकर बसे इस मंशा से ये दिन मनाया जाता हैं । लेकिन आज हम उन भारतीय के बारे में बात करेंगे जो बाहर जाकर भारत नाम रोशन किया हैं । उन एनआरआई भारतीय ने बड़े बड़े आविष्कार किये। चलिये जानते है कुछ ऐसे ही एनआरआई भारतीयों के बारे में !

01 intel platinum’s chips

Intel chip and vinod dham

आज के कम्प्यूटर में से 90% कम्प्यूटर जिस चिप सेट पर काम करते है वह इंटेल चिप एक भारतीय की खोज है । उस भारतीय का नाम है विनोद धाम ! जिसे फाधर ऑफ पेंटियम कहा जाता है । वैसे इंटेल अमरीकन कंपनी है । लेकिन इंटेल पेंटियम चिप भारतीय संशोधक का आविष्कार है । दिल्ही की कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग में डिग्री लेने के बाद वे अमरीका गए । वहां उन्होंने चिप के विषय मे उनकी क्षमता को देखते हुए अमरिका की इंटेल कंपनी ने उनको अपने माइक्रोप्रोसेसर डिपार्टमेंट के सर्वोच्च पद पर स्थापित कर दिए । विनोद धाम ने अपने सहयोगीयो के साथ मिलकर जो 31,000 ट्रांजिस्टर के समाकर जो पेन्टियम चिप बनाई उसकी अपडेटेड चिप से आज के 10 में से 9 कम्प्यूटर चल रहे है ।

02 मोम्बासा कंपाला की रेल्वे लाइन के मजदूरों के लिए किया गया हवाई अभियान

मोम्बासा टू कंपाला रेलवे लाइन

केन्या के मोम्बासा और कंपाला के बीच रेलवे लाइन बनाने के लिए 30,000 मजदूर लाये गए थे । जिन्हें अफ्रीका तक जहाज में लाये गए थे । जंगल , नदी , नाले और पहाड़ो को चीर कर 1050 किलोमीटर लंबा रेलवे ट्रेक बिछाने का काम लगभग नामुमकिन था । इतना विवादस्पद काम था कि उसके लिए ब्रिटिश पार्लमेंट में भी बवाल खड़ा हो गया था । सालो तक चले उस काम मे 2500 जितने मजदूर बीमारी या ज़्यादा काम करने के कारण मर गए थे। इतना ही नही 6500 मजदूर तो अकस्मात के कारण अपाहिज हो गए थे । अब 140 मजदूर ऐसे भी थे जिनको वहां के शेरो ने खा लिए थे। सावो के शेर जिनके कारण मशहूर हुए वे यही भारतीय मजदूर थे । सालो बाद ध मेन इटर्स ऑफ ध सावो नाम की फ़िल्म बनी । इस रेलवे की इंजीनियरिंग के बारे में एक बेस्ट सेलर किताब भी लिखी गई । कमनसीब से उस किताब में भारतीय मजदूरों की एक बात नही की गई थी ।

03 जब एक भारतीय ने पेट्रोलियम खाने वाले बेक्टेरिया बनाये !!!

सन 1967 में टोरी कैनियन नाम का जंगी तैलवाहक जहाज दुर्घटना ग्रस्त हुआ । अब उसमे रहा लाखों टन पेट्रोलियम के कारण समुद्री जीव सृष्टि में तबाही मच सकती थी । इस बात पर बड़ा बवाल खड़ा हो गया । अब करे क्या ? तब एक भारतीय ने इसका हल ढूंढ निकाला ! वह भी ऐसा की दिमाग चकरा जाए ।

डॉ आनंद चक्रवर्ती

अमरीका के भारतवंशी डॉ आनन्द चक्रवर्ती ने कुछ बेक्टेरिया की जिनेटिक ब्ल्यूप्रिन्ट बदलकर उनकेओ पेट्रोलियम खाते कर दिए । अब डॉ चक्रवर्ती का आविष्कार दो कारणों से चर्चित बना । एक तो उन्होंने नए जीव की उत्पति के लिए पेटेंट अधिकार मांगा ! अब पहले तो लोग यांत्रिक , रासायनिक या भौतिक विषय के लिए पेटेंट मांगते थे । अब दूसरी बात ये की तेल खाने वाले बेक्टेरिया अगर लेबोरेटरी से बाहर निकल जाए अगर पृथ्वी का सारा पेट्रोलियम खा जाए तो बस हो गया कल्याण पूरी मानव जाति का ! इसलिए डॉ आनन्द चक्रवर्ती को पेटेंट नही मिला । अमरीकन सुप्रीम कोर्ट ने उस प्रोजेक्ट पर ही प्रतिबंध लगा दिया ।

04 एक एसा विदेश का प्रदेश जहां भारतीय 20,00,000 हैं !

ब्रह्मदेश यानी रंगून में 20,00,000 जितने तो भारतीय ही है । अब इसे हम क्या कहे ? सन 1885 ब्रिटिश के अधीन था । उस पर सत्ता करके उस देश को भारत के साथ जोड़ दिया था । भारत से जुड़ने के बाद गुजराती , मारवाड़ी , बंगाली और सिख लोग वहां पर जाकर बसने लगे । जो मुख्य रूप से चावल और इमारती लकड़ी का व्यापार करने के लिए बसे थे । सन 1937 में भारतीय और ब्रह्मदेश राजनीतिक रूप से अलग हो गए। लेकिन भारतीय लोग वहां बसे थे वे सब वही पर रह गए ।

05 अचार किंग पाठक

पाठक अचार

एक भारतीय ने सिर्फ पहने हुए कपड़े लेकर केन्या देश छोड़ दिया और ब्रिटन निकल पड़ा । उनके पास सिर्फ जीवनबीमा पॉलिसी और पांच पाउंड थे । ब्रिटन में नौकरी करने के लिए प्रयास करने के बाद अपनी पत्नी के सहयोग से 5×6 फिट के कमरे में समोसा बनाकर बेचने शरू किये । ये छोटा सा व्यापार आगे जाकर बड़ी कंपनी बनने वाला था । भारत के नरसिंह राव के सामने लड़कर तूफान खड़ा करने वाले इस गुजराती व्यापारी का नाम था लखुभाई पाठक !

ये गुजराती व्यापारी अचार किंग कहे जाते थे । क्योंकि लखुभाई की कंपनी उनके पुत्र किरीट पाठक के मैनेजिंग के नीचे लगभग 40 देशो में भारतीय रेसिपी के अनुसार चटनी , करी , मसाला पापड़ , अचार समोसा और सॉस बेचती है । ब्रिटन की 6000 जितनी रेस्टरां भी इन्ही के Curry past से कई ग्रेवी बनाती हैं ।

06 वतन से विमुख होने वाला भारतीय !

हरगोविंद खुराना

अविभाजित पंजाब के रायपुर गांव में जनवरी 9 , 1922 के दिन पटवारी परिवार में जन्मे हरगोविंद खुराना भारत के एक बहुत बड़े वैज्ञानिक थे । रवींद्रनाथ टैगोर और सी वी रामन के बाद हरगोविंद खुराना तीसरे भारतीय थे जिनको नोबेल पुरस्कार मिला था । सन 1945 में बहुत कम उम्र में ब्रिटन चले गए । लिवरपूल यूनिवर्सिटी में सन 1948 में पी एच डी हुए और सन 1949 में भारत आने के लिए निकल पड़े । लेकिन भारत मे उनके साथ कुछ ऐसा हुआ कि वे भारत को छोड़कर फिर से चले गए ।

स्वदेश आने के बाद हरगोविंद खुराना को सरकारी होड्डे के नौकरी दी गई और उनका एपोइन्मेंट लेटर भी लिखा गया । लेकिन उनका ऑर्डर हाथ मे आये उससे पहले ही पंजाब के किसी मंत्री साहब ने उस होद्दे के लिए अपने भतीजे की सिफारिश कराकर राजकीय दबाव डालकर खुराना पत्ता काट दिया । इस घटना से हरगोविंद खुराना के मन मे इस बात डंक रह गया । जिनेटिक ब्ल्यूप्रिन्ट के बारे में शोध करने वाले और सन 1968 का नोबेल पाने वाले हरगोविंद खुराना पर हम भले ही गर्व करते हो लेकिन हरगोविंद खुराना खुद भारत का नाम सुनते ही गुस्सा हो जाते थे ।

07 तीन वतन वाला भारतीय !

दीपक पटेल

न्यूजीलैंड के पहला भारत वंशी टेस्ट क्रिकेटर सूरत में जन्म नरोत्तम पुनाभाई था । जिसने सन 1965-66 में देश के लिए लगातार तीन टेस्ट मैच खेली थी । नरोत्तम के माता पिता देशांतर करके सीधे न्यूजीलैंड गए थे। तो सालो बाद दूसरे जाने माने क्रिकेटर दीपक पटेल ने दो देशों के बदले न्यूजीलैंड को तीसरे वतन के रूप में अपनाया ।

दीपक पटेल का जन्म सन 1958 में केन्या में हुआ था। जिंदगी के शरुआती दस साल उसने वहां बिताए ! बाद में वह माता पिता के साथ ब्रिटन में रहा । और वहां काउंटी मैच भी खेला । थोड़े साल बाद पर्सनल कारणों से उसने ब्रिटन को छोड़कर न्यूजीलैंड में रहा । कोई स्पिनर ने वन डे इंटरनेशनल क्रिकेट में ओपनर बॉलर का रोल किया हो तो दीपक पटेल पहला था ।

08 भारतीयों के न्याय लिए लड़ने वाला ‘ भारतीय ‘ अंग्रेज

चार्ल्स एंड्रूज

एक ब्रिटिश पादरी ने दक्षिण अफ्रीका में सत्याग्रह चलने वाले गाँधीजी को सहयोग देने के बाद फिजी , जांज़ीबर , श्रीलंका , मोरिशियस और वेस्टइंडीज में भी अंग्रेजो से पीड़ित भारतीय लोगों को न्याय दिलाने के लिए आंदोलन करने वाला और भारत मे ख्रिस्ती धर्म का प्रचार करने का कार्य एक रखकर आंदोलन चलाने वाला पादरी का नाम चाल्र्स एंड्रूज था । जिसने लगातार 36 सालों तक विश्व भर में भारतीय लोगों के अधिकारों के लिए अहिंसक लढत चलाई , इतना ही नहीं भारत की स्वतंत्रता की लढत में हिस्सा भी लिया । अप्रेल 5 , 1940 के दिन कलकत्ता में 69 साल की उम्र के समय एंड्रूज ने गाँधीजी का हाथ पकड़ कर कहा था , ‘ Mohan , I see Swaraj coming . ‘

09 श्रीलंका में तमिल

LTTE

दक्षिण भारत के तमिल लगभग 150 साल पहले कॉफी के बगीचों में काम करने के लिए श्रीलंका यानी सीलोन गए थे । हालांकि वे वहां रुकते नही थे । क्योंकि कॉफी की सीजन पूरी होते ही वे सब वापिस आ जाते थे। जो नाव में बैठकर मन्नार की खाड़ी पार करके भारत वापिस आ जाते थे। और जब कॉफी की सीजन शरू होती तो फिर से श्रीलंका जाते थे । लगभग 50 साल तक ये सिलसिला शरु रहा । लेकिन सन 1918 की एक घटना ने तमिलों को वहां ही रहने पर मजबूर किया और जातिवाद के नाम पर उस देश को खूनी अन्तर्विगरह में धकेल दिया ।

श्रीलंका में कॉफी के बगीचों में फंगस का व्यापक इंफेक्शन लगने से कॉफी की सारी फल्स बिगड़ गई । विद्वानों ने बहुत प्रयास किये लेकिन कोई दवाई नही निकल पाई । इसलिए कॉफी के बदले चाय की खेती शरू की गई । चाय की पत्तियां तोड़ने के काम बारह महीने शरू रहता था । और ये काम पुरुषों के बदले स्त्रियां अच्छी तरह से कर सकती थी । परिणाम श्रीलंका में भारतीय तमिल सहकुटुम्ब और स्थायी रूप से बसने लगे । समय जाते उनके वंशज अपने अधिकारों के लिए LTTE ( LIBERATION TIGERS OF TAMIL EELAM ) के बेनर में नीचे सशस्त्र आंदोलन पर चढ़ने वाले थे । इसलिये ये कह सकते है कि फंगस के इंफेक्शन ने श्रीलंका में अनियतकालीन हिंसक युद्ध के बीच बो दिए ।

10 अंतिम विधि के लिए भी सुरक्षा !

बुखारा में हिंदु अंतिम विधि

एक जमाने मे भारतीय सौदागर मध्य एशिया के जिस मार्ग से जाते और जहां अग्रगण्य नगरों में कुछ सौदागर व्यापार के लिए बस भी गए थे उस सिल्क रुट को आज भी भुलाया नही जा सकता । 19 वी सदी के दौरान वहां बुखारा नगर में भारतवंशी के अग्नि संस्कार के समय चिता के आसपास स्थानिक डाघु के लीबाश में होने के बावजूद सब हिन्दू थे । इस तरह से अग्नि संस्कार करने का प्रसंग भारतीय लोगों के परेशानियां खड़ी करता था । जिसका कारण ये की बुखारा , समरकंद , काशगर जैसे मध्य एशियाई नगरों में मुस्लिम प्रथा के मुताबिक अग्नि संस्कार पर प्रतिबंध था । हिन्दू सौदागरों की विधि के लिए सरकार से खास मंजूरी लेनी पड़ती थी । लेकिन कोमवाद ना हो इसलिए विधि के दौरान सैनिको की सुरक्षा भी जरूरी है।

11 अफ्रीका में गाँधीजी का सत्याग्रह

गाँधीजी ब्रिटिश की एम्ब्ल्यून्स यूनिट में फौजी के रूप में !

आज लगभग 12 लाख भारतीय वंशी लोग दक्षिण अफ्रीका में है । लेकिन उन सब मे गाँधीजी सबसे फेमस है। सन 1893 में जब वे मूल गुजरात के व्यापारी का अदालती केस लड़ने के लिए अफ्रीका गए थे । दक्षिण अफ्रीका में वे ज्यादा समय रहना नही चाहते थे। लेकिन स्थानिक भारतीयों के साथ हो रही रंगभेद की नीति के कारण उन्होंने अपना विचार बदला और गोरी सरकार के सामने आंदोलन शरू किया । लेकिन अजीब बात ये की उस 21 साल के दौरान गोरी सरकार की सेना में भी सेवा दी ! जिसके सामने आंदोलन कर रहे थे उन्ही की सेना में सेवा कर रहे है थे गांधी !

किस लिए तो दक्षिण अफ्रीका में भारतीयों को जल्द से जल्द न्याय मिल सके उस आशा में गांधी जी ने सन 1899 से लेकर 1902 के दौरान बूर वॉर कहे जाने युद्ध मे एम्ब्युलेंस यूनिट फौजी के रूप में सेवा दी थी । इस सेवा के लिये गोरी सरकार ने उनको कैज़र के हिन्द का खिताब दिया था । लेकिन गोरी सरकार अपनी रंगभेद की नीति पर मक्कम थी । इसलिए ये सत्याग्रह 21 साल चला । इक्कीस साल बाद सन 1915 , 9 जनवरी के दिन वे भारत वापिस आये ।

12 भारत ने गवाई लेकिन अमरीका ने पाई हुई भारतीय प्रतिभा

हमारे अब्दुल कलाम ने मिसाइल प्रोगाम शरू करने के बाद त्रिशूल , नाग और आकाश नाम के तीन मिसाइल संरक्षण दलों को दिलाये । लेकिन दूसरी ओर अमरीका के भारत वंशी साइंटिस्ट ने वहां सेना के लिए अत्याधुनिक मिसाइल की डिफेंस सिस्टम विकसित करने के लिए अमरीकन सरकार ने उनको ‘ साइंटिस्ट ऑफ द ईयर ‘ का एवॉर्ड दिया ।

अभिजीत महालनोबिस

ये बौद्धिक प्रतिभा का नाम है अभिजीत महालनोबिस ! जो अमरीका की लॉकहीड कंपनी में मिसाइल डिवीजन के सूत्रधार थे। सन 2006 में लेटेस्ट मॉडल के मिसाइल बनाये । जिसकी बराबरी कर सके ऐसे मिसाइल रशिया के पास भी नही थे । लॉकहीड का मुख्य कर्ताहता माइक ड्डज़िक कहता है कि , ‘मैन अपनी रिसर्च और डेवलपमेंट की 25 साल लंबी करियर में अभिजीत जैसा जीनियस नही देखा ! ‘

13 वह राज्य जिस की हर साल की आय में 1/4 जितना हिस्सा एनआरआई देते हैं

केरल

भारत में एक ऐसा राज्य है जिसकी चौथे भाग जिसनी सालाना आय काम करने के लिए विदेश गए या वहां पर ही बस गए उसके एनआरआई भारतीय भेजते हैं ।

ये राज्य केरल है । जिसके विदेश निवासी मूल निवासी हर साल लगभग 300 अरब डॉलर जितनी धनराशि अपने करेल वासी परिवार जनों को भेज देते है या केरल में इन्वेस्टमेंट करते हैं । अलग शब्द में कहे तो ये धन राशि केरल के हर नागरिक को मिलती हैं । केरल के लगभग 100 परिवार में से 40 परिवार का कमसे कम 1 सभ्य विदेश रहता है ।

14 ब्रिटन के भारत वंशी कुबेरपति

ब्रिटन में बसने वाले भारतीय उद्योगपति ने इस्पात इंटरनेशनल नाम की कंपनी बनाई थी । पोलाद के कारखाने वाली ये इस्पात कंपनी के सन 2005 में इंटरनेशनल स्टील ग्रुप नाम की कंपनी के साथ मर्ज हुआ । उसके बाद दुनिया मे नम्बर 1 बने और ब्रिटन के धनिक नंबर वन बने उस बिजनेश मेन का नाम है लक्ष्मी नारायण मित्तल !

लक्ष्मी मित्तल

जो आज भी अरबो डॉलर की सम्पति के साथ दुनिया के धनिक लोगो की लिस्ट में शामिल है । मूल राजस्थान के चुरू जिले के सादलपुर गांव के लक्ष्मी मित्तल सन 1976 के अरसे में उनके पिता के साथ स्टील बिजनेश में जुड़े थे । थोड़े साल उन्होंने इंडोनेशिया में एक नुकशान करने वाली स्टील कंपनी को खरीद कर व्यापार को बढ़ाया । आर्थिक रूप से नुकशान करती उस कंपनी को नए मैनेजमेंट से मुनाफा करती बना दी । आज उसी रणनीति के कारण वे दुनिया के नंबर वन स्टील उत्पादक तक बने !

15 भारत का हवाई मुसफरी में रिकॉर्ड

इराक ने सन 1990 में कुवैत पर हमला करके कब्जा कर लिया । तब कुवैत में नौकरी धन्धे कर रहे भारतीय लोगों के लिए भारत सरकार ने जो बचावकार्य किया उसमे हवाई मुसाफरी क्षेत्र में नया कीर्तिमान बनाया !

भारत की एर इंडिया ने भारतीय को बचाने के लिए अपनी दूसरी अनेक फ्लाइट रद की और अगस्त 13 , 1990 के दिन कुवैत की फ्लाइट शरू करके लगातार दो महीने तक कुल मिलाकर 466 उड़ान का आयोजन किया और विमान से सब मिलाकर 1,11,711 लोगों को वापिस अपने वतन पहुंचाया ! विमानी प्रवास का ये नया कीर्तिमान है !

16 सिंगापुर में तमिल भाषा बनी सत्तावार भाषा !

सिंगापुर मे तमिल

ईस्ट इंडिया कंपनी के सर थॉमस स्टैमफोर्ड रैफल्स ने सन 1909 में जिस छोटे से देश सिंगापुर की स्थापना की उसने अपने बंधारण के मुताबिक भारत वंशी लोगों की तमिल भाषा को वहां की सत्तावार भाषा घोषित की !

सिंगापुर में मलय , चीनी और तमिल को सत्तावार मान्यता दी गई है । सिंगापुर की कुल बस्ती में भारतीयों की संख्या लगभग 3 लाख से ज्यादा है । और उसमे भी तमिल लोग ज़्यादा हैं । एक समय सिंगापुर के राष्ट्रपति बने एस आर नाथन भी मूल तमिल ही थे ।

17 भारत और अफ्रीका का संबंध

अफ्रीका भारत सबंध

बिन रहीश भारतीय अफ़ग़ानिस्तान जैसे देशों में फैले उसके लिए सिल्क रूट जैसे रास्ते जिम्मेदार थे । दूसरी ओर मुख्य रूप से गुजराती व्यापारी कनिया , युगांडा और टागानिका और ज़ाज़ीबार जैसे पूर्व अफ्रीका में फैले उसका भौगोलिक कारण था ।

18 वी और 19 वी सदी में मुख्य रूप से व्यापारी मौसमी हवा के सहारे बहुत आसानी से अफ्रीका का सफर कर सकते थे । नवम्बर से मार्च के दौरान हवा के जोर से ही वे सब सफर करते थे । और उसके बाद अप्रेल से सितम्बर तक जब मौसमी हवा भारत की ओर रुख करती तो उसके ही सहारे हाथीदांत , कीमती रत्नों , खनिजो के साथ व्यापारी वापिस आ जाते थे । पोर्तुगल का वास्को डी गामा सन 1497 में अफ्रीका का राउंड लगाकर जब मोम्बासा पहुंचा तब उस नगर में भारतीयों को देखकर हैरत हो गया था । हक़ीकत में मोम्बासा से भारत का समुद्री रास्ता मोम्बासा के ही एक गुजराती व्यापारी ने बताया था । अगर इस गुज्जुभाई ने व्यापारी गामा को रास्ता दिखाने का पुण्य नही कमाया होता तो शायद भारत का इतिहास अलग होता !

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