Top 12 भारतीय संगीत की ऐतिहासिक हक़ीक़त

Top 12 भारतीय संगीत की ऐतिहासिक हक़ीक़त

भारतीय संगीत अनोखा इसलिए है कि वह 34,848 राग रागिणी , आलाप , ताल और श्रुति से समृद्ध है । और तो और सटीक गणित को अनुसरता है । परिणाम संगीत की जो वैविध्य पूर्ण कृतियों की रचनाये होती है उसका दुनिया भर कोई तोड़ नही मिलता । आज हम इसी भारतीय संगीत की कुछ ऐतिहासिक हकीकत प्रस्तुत कर रहे हैं ।

01 भारत का पहला शास्त्र बध्द ग्रंथ

ब्रह्मा

प्राचीन ग्रंथों के अनुसार देखे तो भारतीय संगीत के मूल सर्जक ब्रह्मा है । ब्रह्मा ने संगीत कला शिवजी को दी , शिवजी से वीणा वादिनी सरस्वती को मिली और सरस्वती से नारदजी को संगीत का ज्ञान मिला । आखिर में नारदजी से यह कला पृथ्वी लोक तक आई । या यूं कहें कि भारत तक आई ।

रही बात भारत के पहले शास्त्र बध्ध ग्रंथ की तो ईसा पूर्व 700 से 300 के अरसे के दौरान लिख सामवेद में शास्त्रीय रूप से संगीत सिध्दांत को वर्णित किया गया । इस वेद में कुल 1,549 मंत्र है । जिनका सटीक राग से होते उच्चारण का भी सामवेद में उल्लेख किया गया है ।

02 रागो का सृजन

शंकर भगवान

भारतीय संगीत में मूलभूत रूप से 6 राग प्रचलित है । प्राचीन ग्रंथ हनुमंतमत के अनुसार मनुष्यजाति को 5 राग भगवान शंकर ने दिया । शंकर के दक्षिण वर्ती मुख से राग भैरव , दीपक राग पूर्व के मुख से प्रगट हुआ। गगन तरफ मुख से मेघ राग का जन्म हुआ तो उत्तर दिशा के मुख से हिंडोल राग प्रगट हुआ । पश्चिम मुख से श्री राग का उद्भव हुआ। जबकि छठ्ठा राग मालकौंस पार्वतीजी के मुख से बहता हुआ । रात्रि के तीसरे प्रहर के दौरान गाने और बजाने के लिए बने भैरवी ठाठ का ( ‘ र ‘ और ‘ प ‘ स्वर को वर्जित मानता ) मालकौंस राग शरणाई वादक बिस्मिल्ला खान का और प्राचीन ग्रंथो के मुताबिक लंकेश का प्रिय राग था ।

03 संगीत शास्त्र में राग की आचार संहिता

भारतीय संगीत में अनेक राग है । लेकिन उनको कभी भी कोई भी समय नही छेड़ा जा सकता । संगीतशास्त्र में राग के समय से जुड़ी आचारसंहिता होती हैं । क्योंकि रात्रि के कुछ समय पर ही कुछ राग ह्रदय को स्पर्शता है । हकीकत में संगीतविदों ने चौबीस घण्टे को मुख्य 8 प्रहर में बांट दिया है । जैसे कि गुड्डी फ़िल्म का हमको मन की शक्ति देना जैसा केदार राग का गान वादन सूर्यास्त के बाद 7 से 10 के बीच किया जाता हैं । ‘ कुदरत ‘ फ़िल्म का हमे तुम से प्यार कितना ये हम नही जानते ‘ गीत में मालकौंस का समय रात्रि के 1 और 4 के बीच का है । तो शर्मीली फ़िल्म के खिलते है गुल यहां , खिल के बिखरने को ‘ ! का भीमपलासी राग दोपहर को 1 और 4 के बीच का है।

संगीत के राग की आचार संहिता का प्रतीकात्मक तस्वीर


इन सब वर्गीकरण में संधिप्रकाश राग के लिए सुबह के 6 से 7 और शाम को 6 से 7 के बीच तय किया गया है । क्योंकि ये समय अंधकार और प्रकाश के बीच संधिकाल का है । व्याख्या के मुताबिक रे और ध कोमल हो ऐसे राग सन्धिप्रकाश वर्ग के माने जाते है । जैसे कि अनुराग फ़िल्म का सुनरी पवन , पवन पुरवैया गीत भैरव पर आधारित होने के कारण सुबह के 6 से 7 और शाम 6 से 7 के समय में अनुकूल है । हालांकि इस तरह के समय पालन को आज के संगीतकार नही मानते । जैसे कि पटदीप राग दोपहर के बाद 4 से 6 के समय का है । लेकिन उस पर बने शर्मीली फ़िल्म का मेघा छाए आधी रात के समय के अनुकूल नही लगता है ।

04 तबले का इतिहास

तबले की जोड़ी

संगीतकार शंकर के प्रिय वाद्य तबले के इतिहास की बात करे तो एक तवारीखी नोंध के मुताबिक साढ़े सातसौ साल पहले अमीर खुसरो ने दोनों ओर से बजाया जा सके ऐसा पखावज के दो हिस्से अलग करके ‘ दाया ‘ और ‘बाया ‘ इस तरह से अलग वाद्य बनाये । दोनों को एक साथ बजाया जाता था । जिसका तबला नाम दिया गया । जो शायद tabl या लेटिन शब्द tabula का अपभ्रंश था । सिंगल वाद्य माना जाता तबले के शिखर पर बकरे के चमड़े को तंग करके चढ़ाने के बाद योग्य कंपसंख्या पैदा करने के लिए चमड़े पर तबला सर्जक कारीगर श्याही के नाम से जाना जाता स्पॉट ही आखिर में तबला की गुणवत्ता तय करने में निर्णयाक साबित हुआ । इसको बनाने मे कारीगर को बड़ा कस्ब आजमाना पड़ता हैं ।

इस काले स्पॉट को बनाने के लिए मुख्य पदार्थ के रूप में लौह भस्म होता है । इसके साथ गोंद , मोरथुथु , लकड़ी का पाउडर और गेंहू के आटे की लुगदी का इस्तेमाल किया जाता हैं । इस मिश्रण को एक साथ नही लगाया जाता । पहले पतली परत लगाई जाती हैं। बाद में उसे पथ्थर से थोड़ा पोलिश किया जाता हैं । अभी वह सूखे उससे पहले दूसरी परत लगा दी जाती हैं । मोटाई में श्याही का वह स्पॉट बहुत सटीक नाप का बनना चाहिए । क्योंकि योग्य थपकार पैदा करने उसका सबसे ज़्यादा योगदान होता हैं ।

05 मजरूह सुल्तानपुरी

मजरूह सुल्तानपुरी ने अपनी फिल्मी करियर में सब गीत मिलाकर 4000 गीत लिखे । जिसमे तीसरी मंजिल , यादों की बारात एयर हम किसी से कम नही जैसी सुपरहिट फिल्में शामिल है । उनको सन 1993 में दादासाहेब फाल्के एवॉर्ड से भी सन्मानित किया गया था ।

मजरूह सुल्तानपुरी

उनकी शरुआती करियर बहुत ही मुश्किल भरी थी । उस समय उनको जेल में भी जाना पड़ा था । क्योंकि गीतकार साम्यवादी विचारसरणी के थे । नेहरू का विरोध प्रगट हो ऐसे गीत लिखवाकर छपवाते थे । असहिष्णु प्रकृति वाले नेहरू ने उनको मुंबई के तत्कालीन प्रमुख मोरारजी देसाई को सूचना देकर गिरफ्तार करवाये था । इतना ही नही बलराज साहनी जैसे दूसरे साम्यवादी कार्यकरो को जेल भिजवाया ।

जेल भिजवाकर कहा गया कि अगर वे क्षमा मांग ले तो सब गुनाह माफ कर दिए जाएंगे । लेकिन गीतकार ने मचक नही दी । मजरूह की सजा ने बहुत से लोगो को दुखी किया । मन्ना डे तो उनको मिलने बार बार जाते थे ।
राज कपूर ने आर्थिक मदद करने की तैयारी दिखाई लेकिन बिना महेनत पैसे लेने के लिए तैयार नही थे । अंत मे राज कपूर ने उनको एक गीत लिखने के लिए 1000 ₹ दिए । सालो तक वह गीत कागज पर ही रहा । आखिर में धरम करम के लिए संगीतबद्ध किया गया । गीत था – एक दिन बिक जाएगा , माटी के मोल ! ‘

06 शंकर जयकिशन की बेलड़ी

विख्यात संगीतकार शंकर जयकिशन 25 साल तक फिल्मी दुनिया पर छाए रहे । मध्य प्रदेश के कुश्तीबाज शंकरसिंह रघुवंशी तबलची थे। और घर के पास शिवमंदिर में पूजा अर्चना के दौरान तबले बजाते थे । एक बार वे हैदराबाद गए और सकड़ी गली में चलते समय संगीत जलसे की आवाज आई । जिसमे तबला शास्त्रोक्त तरह से नही बज रहे थे । शंकर का दिमाग घूम गया और जलसे वाले मकान में गए और उस गाफिल तबला बजाने वाले को तमाचा जड़ दिया । दादरा के धा ..धी…ना…तू…ना के ठेके बजाकर दिखाए ।

शंकर जयकिशन

जब कि जयकिशन पंचाल गुजरात के वलसाड जिले के वांसदा में 4 नवम्बर , 1932 के दिन जन्मे थे । पिता लकड़ी की छोटी बड़ी चीजे बनाते थे । परिवार गरीब था । जयकिशन के बड़े भाई डांग की भजन मंडली में गाने बजाने का काम करके परिवार चलाते थे । थोड़े समय के बाद जयकिशन भी उस मंडली में मिल गए और हारमोनियम बजाने लगे । रोटी की तलाश में मुंबई गए । ग्रांट रॉड पर कपड़ा बनाती पावरलूम में काम मिल गया । फुरसद के समय वे ओपेरा हाउस के पास विनायक राव तांबे संगीत क्लास में हारमोनियम बजाने जाते थे । एक व्यायाम शाला उसी एरिया में थी । जहां संजोग से शंकर भी आते थे। कसरत के बाद तबले की प्रैक्टिस करने के लिए तांबे के क्लास में जाते थे । यहां पर दोनों मिले और जोड़ी कायमी बनी ।

07 नौशाद का रिकॉर्ड

सालो पहले संगीतकार नौशाद ने आन फ़िल्म में बहुत कर्णप्रिय बैकग्राउंड म्यूजिक दिया था । स्वरलहरी का वैविध्य को देखते हुए फिल्मी रील पर रेकॉर्डिंग करते समय उसे पूरा न्याय दे सके ऐसे ध्वनिमुद्रण के हाई फाई साधन तब भारत मे थे ही नही । अंत मे नौशाद , प्रोड्यूसर महबूब खान , हीरो दिलीप कुमार ,प्रेमनाथ समेत का पूरा ग्रुप ब्रिटन के बी बी सी स्टूडियो पहुंचे । इस स्टूडियो में ब्रिटिश ऑर्केस्ट्रा ने जो बैकग्राउंड म्यूजिक बजाया उसका रिकॉर्डिंग किया गया । इसी के साथ भारतीय फिल्मी तवारीख में नया कीर्तिमान बना ।

नौशाद बीबीसी स्टूडियो में

नौशाद ने सब बैकग्राउंड म्यूजिक को पश्चिमी स्वरलिपि में यानी staff naration में लिखा था । जो भारत के संगीत क्षेत्र में पहली बार था । ब्रिटिश ऑर्केस्ट्रा को सिर्फ उसे फॉलो करना था । नौशाद का वह संगीत अमरीका के संगीतकारों के लिये छापा गया । नौशाद के लिए ये नया कीर्तिमान था ।

08 एक गीत के लिए 125 साजिंदे !

कल्याणजी आनंद जी

फिल्मी गीत के रिकॉडिंग के समय 100 वादको के ऑर्केस्ट्रा को काम पर लगाने वाले प्रथम संगीतकार नौशाद थे । साथ ही पहली बार 1,00,000 ₹ चार्ज लेने वाले संगीतकार भी वही थे । लेकिन उनके बाद सन 1967 में संगीतकार कल्याणजी आनंदजी ने 125 वादकों का ऑर्केस्ट्रा इकठ्ठा किया । गीत था मनोजकुमार की उपकार फ़िल्म का मेरे देश की धरती ! जिसका रिकॉर्डिंग दोपहर 3 तीन बजे शरू हुआ और रात 2 बजे खत्म हुआ ।

09 किशोर कुमार पर प्रतिबंध

सालो पहले मजरूह सुल्तानपुरी पर जिस तरह नेहरू का क्रोध उतरा था उसी तरह उनके वारिसों का क्रोध किशोर कुमार पर भी उतरा था । 19 महीने तक किशोर कुमार के गानो पर प्रतिबंध लगा दिया गया था । इमर्जन्सी के दौरान विविध भारती , दिल्ही दूरदर्शन और आकाशवाणी पर किशोर कुमार के गीतों का प्रसारण बंद कर दिया गया था । सजा बहुत बड़ी थी । क्योंकि उस समय गायकों के गीत श्रोता तक पहुंचाने के यही जरिया था । उस समय दूसरे कोई माध्यम नही थे । लेकिन किशोर कुमार पर प्रतिबंध लगा इस लिए की संजय गांधी के हाथ नीचे दिल्ही में आयोजित संगीत कार्यक्रम में फिल्मी गायकों को अपने गीतों के पुरुस्कार की अपेक्षा किये बैगर पेश करने थे। किशोर कुमार मुफ्त में गाने के लिए तैयार नही थे ।

किशोर कुमार


कहा जाता है कि संजय गांधी ने खुद प्रसारण माहिती और प्रसारण डिपार्टमेंट के प्रधान विद्याचरण शुक्ल को मौखिक सूचना देकर किशोर कुमार के गीतों का ब्लैकआउट करवाया । संजय गांधी का रोल इसमे क्या हो ये तो भगवान जाने लेकिन किशोर कुमार ने हार नही मानी । अंत मे सनगीतकार कल्याणजी आनन्दजी दिल्ही गए और किशोर के कारण संगीतप्रेमी श्रोता को सजा होने की बात कहकर उस प्रकरण का अंत किया ।

10 जुमरीतलैया का आरोप

विविध भारती

एक जमाने मे विविध भारती के मनोरंजन , बेला के फूल और मन चाहे गीत के फरमाइशी रेडियो कार्यक्रम कोई गीत बजाने का अनुरोध करने वाले अनेक श्रोताओ में राजन्द गांव के और जुमरी तलैया के थे । अब ये गांव तो भारत के नक्शे पर ढूंढने जाए तो मील भी नही सकते । फिर भी बार बार इनका नाम आता था । तब विविध भारती पर आरोप लगाया गया कि पत्र फर्जी है । तब विविध भारती ने पत्रों को बचाकर रखना शरू किया ।

11 हारमोनियम की कमी

औरंगजेब संगीत का दुश्मन था । मुगल साम्राज्य में संगीत प्रतिबंधित किया गया था । एक बार महल के पास से श्मशान यात्रा निकाली । औरंगजेब ने पूछा तब जवाब मिला कि जनाजा संगीत के मृतदेह का है । औरंगजेब ने कटाक्ष को समजे बैगर कहा कि गहराई तक उसे गाड़ दो । जिससे संगीत का आवाज मेरे कान तक ना पहुंचे !

हार्मोनियम

दूसरी ओर भारतीय संगीत को शुद्ध रखने के लिए कवि रविन्द्र नाथ टैगोर की सलाह के मुताबिक ऑल इंडिया रेडियो ने हार्मोनियम को दफ़न कर दिया था । मगर क्यो ?

सितार जैसे भारतीय वाद्य 32 ” लंबे तार से 22 तरह के सुर निकल सकते थे । जिसे श्रुति कहा जाता हैं । श्रुति संगीत का नाजुक आवरण होता हैं । या यूं कहें कि आभूषण है । कोई भी पश्चिमी वाद्य उसे न्याय नही दे सकता । मूलभूत फ्रेंच डिजाइन का हार्मोनियम भी नही !

12 एक गीत की दो महान गायिका

शंकर जयकिशन ने उनका सर्वोत्तम संगीत बसंत बहार फ़िल्म में दिया । फ़िल्म के सब गाने शास्त्रीय राग पर आधारित थे । आज तक उसके जैसे गाने नही बने । यहां तक HMV यानी सारे गम इंडिया लिमिटेड के लगभग 1,75,000 गीतों के संग्रह में भी उसके जैसे कोई गीत नही ।

लता मंगेशकर और पन्नालाल घोष

एक गीत लता मंगेशकर के कंठ से गाया गया राग भैरवी पर आधारित मैं पिया तेरी , तू माने या न माने था । इस सुपरहिट गीत के लिए ऐसा कहा जाता है कि उसमे दो गायिका थी । एक लता मंगेश्कर और दूसरी बांसुरी !

जिसका सुर शंकर जयकिशन ने भारत के सर्वोत्तम बाँसुरीवादक के पास से लिया था । उनकी बेजोड़ कला का लाभ मिल सके इएलिये गीत का रेकॉर्डिंग भी कुछ दिन लेट किया था । अंत मे जो कलाकर हाजिर हुए उस बांसुरी के महारथी ने शंकर जयकिशन के उस गीत में जान डाल दी ।

गीत में बांसुरी का सूर पन्नालाल घोष ने बहाया था । आज की पीढ़ी तो शायद उनका नाम तक नही जानती है । फिर भी जान ले कि कुछ मर्यादा वाली 30 सेंटीमीटर लंबी बांसुरी की खामी दूर करने के लिए उन्होंने अपनी आधी जिंदगी बिता दी थी । आज हरिप्रसाद चौरसिया के होठो पर लगी 75 सेंटीमीटर लंबी पूर्ण बांसुरी को आप देखते है उस बांसुरी के जनक पन्नालाल घोष थे ।

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