Top 10 भारतीय आविष्कार

Top 10 भारतीय आविष्कार

भारतीय सभ्यता पृथ्वी की सबसे प्राचीन सभ्यता हैं जो आज भी अपना अस्तित्व बनाये हुए हैं। हालांकि आज गलत शिक्षा व पश्चिम के अंधे अनुकरण से कुछ भारतीय ही उसे खत्म करने पर उतारू है । लेकिन वह एक अलग विषय व मुद्दा है । आज हम भारत के 10 आविष्कार के बारे में बात करेंगे जिसके कारण आज कई आधुनिक मशीन काम कर रही हैं। हा , आपको शायद यकीन ना हो पर आज तक जो भी पश्चिम जगत के आविष्कार माने जाते है वे सब आखिर में तो भारतीय संदर्भ का इस्तेमाल करके ही हुए हैं। तो चलिये जानते है ।

01 शून्य

आज हम कम्प्यूटर , प्रोजेक्टर , प्रिंटर , स्कैनर , ई मेल , इंटरनेट , सीडी , डीवीडी हाई डेफिनेशन टीवी , एम पी 3 प्लेयर , मोबाइल , डिजिटल फोटो केमेरा , वीडियो कैमेरा , स्वयमसंचालित रोबोट्स , वीडियो गेम्स एयर डेबिट कार्ड व क्रेडिट कार्ड जिसके कारण काम कर रहे हैं वह भारतीय आविष्कार है ‘ शून्य ‘ !

शून्य का चित्र

हा , ये सब आविष्कार आज भारत के दिये हुए शून्य के कारण ही काम कर रहे है । अगर इनमें से शून्य निकाल दे तो ये सब किसी काम के नही ।

प्राचीन भारत के गणित शास्त्री आर्यभट्ट ने सन 510 में अपने ग्रंथ ‘ आर्यभट्टीय ‘ से दुनिया को पहली बार शून्य का परिचय करवाया । आगे हमने जो आधुनिक दुनिया के साधन बताये वे सब शून्य के ऊपर ही काम कर रहे है । आप को विश्वास नही हो रहा होगा तो जान लीजिए कि सन 1945 में बने पहले कम्प्यूटर एनियाक में 18,000 वाल्व थे । 50 टन वजन के इस पहले कम्प्यूटर को जब कोई गिनती करने का काम सौंपा जाता था तो ये वाल्व ऑन ऑफ होकर गिनती होती थी । इस तरह से 1 से 10 के अंक वोल्टेज के आधार पर तय होते थे । हालांकि वोल्टेज में ही कोई हल्का सा उतार चढ़ाव आ जाये तो गिनती में भूल होने की संभावना रहती थी।

इस समस्या का तोड़ निकालने के लिए सन 1946 में अमरीका के ज्होन न्यूमान नाम के संशोधक ने binary/द्विअंकी पद्धति विकसित की । जिसमे कम्प्यूटर विद्युत प्रवाह बहे तब 0 और बंध रहे तब 1 गिनता था । इस क्रांतिकारी शोध के कारण ही वर्तमान कम्प्यूटर के पूर्वज का जन्म हुआ । और बाद में ये सब विद्युत साधन उसी के ऊपर काम करने लगे । इस तरह आज की डिजिटल टेक्नोलॉजी का अंकुर भारतीय शून्य के कारण ही मुमकिन हो पाया ।

02 indian ink

एक समय था जब लिखते वक्त या चित्र बनना के काम आने वाली काले रंग की श्याही का इस्तेमाल किया जाता था । उत्पादक कोई भी हो लेकिन इस काली श्याही के बोतल पर india ink लिखा ही जाता था । इसका कारण ये था कि स्याही का आविष्कार ईसापूर्व चौथी सदी में भारत मे हुआ था ।

श्याही का चित्र

हड्डियां और वनस्पति के चिक का दहन होने पर जो काले रंग का पाउडर मिलता था उसे संस्कृत में मषी कहा जाता था । इस पावडर में पानी और दूसरे तत्व मिलाकर श्याही बनाई जाती थी । श्याही बनाने की पद्धति आखिर में चीन
और मध्य एशिया से होते हुए पूरी दुनिया मे फैल गई और प्रचलित भी बनी । समय जाते उत्पादकों ने उसमें अपनी तरह से कुछ फेरबदल किये । लेकिन मूलभूत काली श्याही ब्रांड की पहचान india ink शब्द को उन्होंने अपनाए ही रखा । इसलिये श्याही का उत्पादन किसी भी कंपनी ने किया हो india ink शब्द तो रहेगा ही क्योंकि ये आविष्कार भारत की देन हैं ।

03 युद्ध में रॉकेट का पहला इस्तेमाल

रॉकेट का दर्शय

दुनिया मे युद्ध मे रॉकेट का इस्तेमाल करनेवाला देश भारत है । सन 1780 में मैसूर के सुलताप टीपू सुल्तान और उसके पिता हैदर अली ने ईस्ट इंडिया कंपनी के सामने युध्द में रॉकेट इस्तेमाल करने की नोट्स मिलती हैं । जिसमे बांस की टहनी की एक छोर पर बारूद से भरा हुआ लोहे का नलाकार फिट किया जाता था । जिसकी लंबाई 20 सेंटीमीटर और व्यास 8 मीटर होती थी । नलाकार में रखे हुए खुले पलीते में आग लगाते ही वह बारूद वाला हिस्सा एक किलोमीटर दूर जाकर पड़ता था । जहाँ पर बाकी का बारूद फटता था । सन 1792 में टीपू सुल्तान श्रीरंगनम के युद्ध मे अंग्रेजो से हार गया । बाद में उसके पास बचे हुए इस तरह से रॉकेट को अंग्रेजो ने अपने कब्जे में ले लिया । जिसे इंग्लैंड भेजा गया । वहाँ पर अंग्रेज इस अजीब से साधन को देखकर दंग रह गए । रॉकेट की इस भारतीय टेक्नोलॉजी से यूरोप के कई देश चौक गए । आखिर में इसी से प्रेरित होकर जर्मनी के हिटलर ने V1 और V2 जैसे आधुनिक रॉकेट को बनाया ।

04 4000 साल पहले बटन का आविष्कार

वैसे तो आज के शर्ट में लगाये जाने वाले बटन आज कल का आविष्कार लगता है लेकिन आप को आश्चर्य होगा कि ये बटन आज कल के नही ।

शर्ट और बटन

भारत मे लगभग 4000 साल पहले भारत मे ईसा पूर्व 2400 से 2000 के आसपास मोहें जो डारो के समय मे लोग समुद्री छिप में से विविध आकार के बटन बनाते थे । सिंधु नदी के किनारे बसे नगर में भी इस तरह के बटन मिले है । कपड़ो को जोड़ने के लिए इनका इस्तेमाल होता था । इन बटन में बीच मे छिद्र तक बने है ।

05 जगलिंग का आविष्कार

आजकल जिसे हम जगलिंग कहते है उसके उस्ताद जिस चीज पर अपना हाथ बिठाते है उसका नाम है indian club ! जिसे हम आम भाषा मे मगदल कहते हैं । हाथ कसरत करने के लिए इसका आविष्कार कब हुआ ये तो कौन जाने लेकिन अठाहरवी सदी के दौरान भारतीय अखाड़े में मगदल का इस्तेमाल होता था ऐसा इतिहास में लिखा गया है ।

मगदल को हमेंशा पीछे के छोर से पकड़कर जोड़ी में पकड़कर फिराया जाता हैं । वह भी नियम से ! इसे अखाड़े में दाव कहा जाता हैं । ज़ोले , कलाई , बगल लपेट , शीरी और फेंकन जैसे 27 दाव होते है ।

आंख

ब्रिटिश राज के दौफन अंग्रेजो ने इसे अखाड़े में देखा और उसे अपनाया । उन्नीसवीं सदी के दौरान कुछ अंग्रेज उसे इंग्लैंड साथ ले गए और वहाँ indian club नाम दिया । सन 1861 में सिम केहो नाम के कसरतबाज ने अमरीका में इसका फैलाव किया । ब्रिटन के जिमखाने में उसने मगदल को देखा और उससे वह इतना प्रभावित हुआ कि उसने वापिस आकर उसने इस indian club का व्यापारी उत्पादन शरू कर दिया । और तो और उसने indain club exercise के नाम से एक किताब भी निकाली । समय जाते अमरीका और भारत की सेना में सैनिको के लिए भी ये कसरत कम्पलसरी कर दी गई । आज अफसोस होता है की indian club के नाम से प्रसिध्द ये मगदल भारत ने विश्व को दिया लेकिन आज हाईटेक जिम्नेशियम के जमाने मे आजकल देशी अखाड़ो का मान सन्मान पहले जैसा नही रह गया । आज कल में तो ये मगदल और अखाड़ा शायद विलुप्त होने के कगार पर है ।

06 दुनिया का पहला बंदर ( Port )

बंदर यानी पेड़ पर चढ़ने वाल पूंछ वाला बंदर नही । बल्कि व्यापार करने के लिए बनाया गया पोर्ट यानी बंदर सबसे पहले भारत मे बना था ।

पोर्ट का दर्शय

पोर्ट के बिना जहाज में माल सामना चढ़ाना या उतारना मुमकिन नही । ईसा पूर्व 2400 में साबरमती के किनारे हड़प्पा कहि जाने वाली भरतीय सभ्यता में भारतीय इंजीनियरों ने दुनिया का सबसे पहला पोर्ट यानी बंदर बांधा था । और ये है गुजरात के अहमदाबाद से 70 किलोमीटर दूर आज का लोथल !

जी हाँ लोथल दुनिया का सबसे पहला पोर्ट था और आज भी उसके अवशेष अस्तित्व में है । उस समय नगर और समुद्र के बीच 5 किलोमीटर का अंतर था । लेकिन आंतरिक जलमार्ग की मदद से जहाज की आवन जावन हो पाती थी । विदेशी चीन वस्तुओं के लिए पोर्ट के पास ही 1930 वर्ग मीटर का एक गोदाम भी बनाया गया था ।
गोदाम की जगह को देखते हुए और समुद्र में आने वाली भर्ती को भी धयन में ले तो ये गोदाम 4 मीटर ऊंचे प्लेटफार्म पर बनाया गया था।

07 शतरंज का खेल ( चेस की गेम )

चेस आज कल बुध्दिशाली लोगो की गेम मानी जाती हैं । जिसमे दो खिलाड़ी एक काले सफेद चेक्स बने बोर्ड पर अपने अपने मोहरे उतारते है ।

शतरंज

वास्तव में ये गेम शतरंज नाम से भारत मे प्रसिद्ध थी । जिसका अविष्कार गुप्त वंश के समय मे तीसरी से छठ्ठी सदी के दौरान हुई थी । जिसका उद्देश्य युध्ध के दावपेच सीखना था । युध्द में उतरते योद्धा जैसे प्यादे और मोहरे उतारे जाते थे ।

शतरंज में भी कुछ संशय है । वास्तव में ये शब्द चतुरंग था । जिसमे चार अंग थे । और ये अंग थे : गज , रथ , अश्व और पादाति यानी थलदल ! पर्शिया यानी इराक के सुल्तानो ने जब पहली बार भारत पर आक्रमण किया तब पर्शिया के शासकों ने चतुरंग यानी शतरंज के बारे में पहली बार जाना और जाते समय अपने साथ ले गए ।

इस खेल में जब मोहरे के लिए कोई चाल बाकी न रहे तब उसे चेकमेट कहा जाता है । पर्शिया में इसे शाह मात कहा जाता था । समय जाते ये खेल यूरोप पहुंचा तब शाह मात के लिए फ्रेंच में echec / एशेक का नाम दिया । समय जाते अंग्रेजो ने भी इसे अपनाया । आखिर में इसके नाम मे अपभ्रंश होते होते आखिर में इंग्लिश में chess कहा जाने लगा ।

08 मोतियाबिंद का पहला ऑपरेशन

प्राचीन भारत में मोतियाबिंद के ऑपरेशन के वर्णन आता है । प्राचीन आयुर्वेदाचार्य श्रुसुत के ग्रंथ श्रुसत्संहिता में इसका वर्णन है । आयुर्वेद के इस प्राचीन ग्रंथ में मानव शरीर की 1120 बीमारियां और उसके उपचारों का 184 प्रकरणों में वर्णन किया गया है । जिसमे मोतिबिंद की बीमारी का भी वर्णन है । ना सिर्फ बीमारी का बल्कि उसके उपचार व ओपरेशन का भी !

आँख

आयुर्वेद के मुताबिक मोतिबिंद की बीमारी नेत्रमणि में कफ़ के जमाव के कारण होती हैं। कफ के कारण नेत्रमणि की पारदर्शकता में कमी आती हैं । जिसके कारण दर्दी ठीक से देख नही पाता । ईसापूर्व छठ्ठी सदी में श्रुसुत खास तरह की शलिका से आंख की नेत्रमणि को भेद कर उसमे से कफ को निकाल देते थे । अलग तरह से कहे तो ऑपरेशन कर देते थे ।

इस सर्जरी का कसब आगे जाकर सालो बाद चीन और अरब देशों में फैला । वहां से पूरी दुनिया मे ! मोतिबिंद का ऑपरेशन भारत की देन है । एक और बात प्लास्टिक सर्जरी भी श्रुसुत की ही देन है ।

09 चिंटज़ डिजाइन के कपड़े का आविष्कार

कपड़ो से लेकर गद्दी , तकिए , चदर , टेबल क्लॉथ और दूसरे कपड़ो पर फूल पत्तियों की डिजाइन बनाई जाती है । जिसे अंग्रेजी में chintz कहा जाता हैं । अब इस पेटर्न का आविष्कार भारत मे हुआ था । सन 1600 के आसपास इसका आविष्कार हुआ । हमारे कसबी लकड़ी के ब्लॉक्स को वेजितबल्स रंगों में भिगो कर कपड़ो पर सुंदर प्रिंटिंग कर देते थे । अब इस कपड़े की बात करे तो ये कपड़ा सामान्य नही था ।

Chintz design

कपड़े का नाम केलिको था । केलिको का आविष्कार व शरुआत भारत मे शरु हुआ । सिर्फ कपड़ा ही नही बल्कि केलिको का कपड़ा जिस कॉटन से बनता था उसे उगाने की अलग पध्दति तक खोजी गई । और ये हमको सिंधु सभ्यता तक ले जाती है । सिंधु सभ्यता के समय से इसका प्रचलन रहा है । उन्नीसवीं सदी में फ्रांस और ब्रिटन में इस चिंटज़ की मांग बढ़ने लगी तब दोनों देशों की स्थानिक मिलो को मंदी लग गई । इस लिये उन्होंने इस पर प्रतिबंध लगा दिया । स्थानिक लोगो ने इसके आविष्कार करने में बहुत महेनत की लेकिन सफलता नही मिली । आखिर में सन 1742 में एक फ्रेंच पादरी ने इस कला को भारत मे जाकर प्रवास के दौरान जान लिया और वापिस आकर स्थानिक कलाकारों को सिखाया । थोड़े साल बाद कारीगर ठीक भारत जैसी चिंटज़ बनाने लगे । बाद में सन 1759 में उन्होंने प्रतिबंध उठा लिया । इस तरह से आज की ये फूल पत्ती वाली डिजाइन भी भारत की ही देन है । वैसे chintz शब्द हिंदी के चित्र शब्द पर से बना है ।

10 कन्तान

कन्तान के थैले

आखिर में जिस थैले में चीनी व अनाज भरा जाता है वह थैले कन्तान में से बनते है । ये कन्तान भी भारत की ही देन है । और पश्चिमी देशों को ये व्यापार के जरिये मिली है । गन्ने को पीसकर उसके रस में से गुड़ बनाने की पद्धति भी भारत की है। जो गुप्त साम्रज्य के दौरन विकसित की गई थी । सन 647 में जब बौद्ध भिक्षु भारत की मुलाकात पर आए तब उन्होंने पहली बार गन्ने में से गुड़ बनने तक कि टेक्निक अपनी आखों से देखी । और इस टेक्नोलॉजी वे अपने साथ चीन ले गए ।

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