….तो भारत की पहली ट्रेन मुंबई में नहीं कोलकाता में दौड़ी होती !

….तो भारत की पहली ट्रेन मुंबई में नहीं कोलकाता में दौड़ी होती !

अब इस बात की बात शरू वहां से होती है जहाँ से आप सोच भी नहीं सकते । चलिये शरू करते है ! तो एक बार हुआ यूं कि अमेरिका के उप प्रमुख ज्होन केल्हाउन सरकार की कर नीति के मामले में प्रमुख एंड्रयू जंक्शन के साथ भिड़ पड़े । और फिर इस्तीफ़ा दिए बिना राजधानी वॉशिंगटन छोड़कर अपने दक्षिणी राज्य साउथ कैरोलिना चले गए । राज्य की धारा सभा में उन्होंने केंद्र सरकार के कायदा कानून का विरोध करते हुए चुनाव प्रचार किया । यह कदम सरे आम किसी डाकू का काम था । इस कार्यवाही में प्रमुख एंड्रयू जैकसन ने अमेरिकन संसद के पास साउथ कैरोलिना राज्य पर सेना व नौका दल से आक्रमण करने का अधिकार मांगा और पाया । ज्होन केल्हाउन ने उन्हें राजद्रोह के लिए मौत की सजा देने की घोषणा की । अमेरिका की लोकशाही में प्रमुख और उप प्रमुख के बीच कभी ऐसा वैमनस्य पैदा नहीं हुआ था ।

John C. Calhoun and Andrew Jackson
John C. Calhoun and Andrew Jackson

आखिर बात क्या थी ? कॉटन की खेत पर लगने वाला उत्पादन शुल्क के नाम पर अमेरिकन सरकार ने दोहरी नीति बनाने वाला कायदा बनाया था । उत्तर के राज्य के कॉटन उत्पादन करने वाले किसानों को दक्षिण के राज्य के कॉटन उत्पादन करने बाल किसानों से कम उत्पादन शुल्क भरना था । यह करनीति पूर्णतः अन्यायपूर्ण थी । इसलिए ज्होन केल्हाउन खुद अमेरिकन प्रमुख होने के बावजूद वॉशिंगटन सरकार के विरोध में खड़ा हुआ । उसने बताया कि सरकार ने ना लगान दो ना ही कॉटन दो !
वह 1832 का साल था । ब्रिटन में मैनचेस्टर की हर एक कपड़े की मुमकिन हो तब तक अमेरिकन कॉटन की आयात करती थी । भारत की तुलना में अमरीका वैसे भी भौगोलिक रूप से नजदीक था । इसलिए कॉटन के बड़े-बड़े बक्सों को लाने के लिए जहाजों का नूर भी कम चुकाना था । अब वहां उप प्रमुख ज्होन केल्हाउन ने आंदोलन शुरू कर दिया था। सब उसके बाद अमेरिका में उथल-पुथल शरू हो गई । कॉटन ने भाव जल्दी ही बढ़ गए । मुख्य रूप से अमेरिकन कॉटन पर चलने वाला ब्रिटन का कपड़ा उद्योग अचानक मुसीबत में आ पड़ा। कॉटन की सप्लाई का विकल्प तो सिर्फ भारत था । जहां ईस्ट इंडिया कंपनी सूती कपड़ो का बिजनेस चलाती थी । शुरुआत में ब्रिटेन कपड़ा नहीं भेजता था लेकिन इंडिया कंपनी कपड़ा देती थी ।
ब्रिटेन में अब भारत के कॉटन का नया बाजार खुला । भारत के पश्चिम घाट की पूर्व मराठा विस्तार और दक्षिण गुजरात में कॉटन का भरपूर उत्पादन होता था । इसलिए ईस्ट इंडिया कंपनी ने वहां के खेत से माल खरीदकर ब्रिटन भेजना शुरू किया । अब उस समय वहां की एक बड़ी समस्या रास्ते की थी । कॉटन के पार्सल से भरी बैलगाड़ी चल सके ऐसे रास्ते भी नही थे । ख़ास कर बारिश के मौसम में तो पश्चिम घाट को लांघकर मुंबई जाना शक्य ही नहीं था । उस समय मुंबई के गवर्नर के रूप में रॉबर्ट ग्रांट ने सन 1835 में पहली बार पक्के रास्ते का काम शरू किया । ग्रैंड ट्रंक रॉड के नाम से जाना जाता रास्ता बहुत छोटा व स्थानिक था । इसलिए कॉटन ट्रांसपोर्ट के लिए उपयुक्त नहीं था । उसी तरह से कोलकाता में भी बंगाल के पठारी विस्तार का कॉटन हुगली बंदर तक लाना कठिन था । बीच में अनेक नदी नाले बैलगाड़ी का रास्ता रोक लेते थे । लेकिन लेकिन ईस्ट इंडिया कंपनी ऐसे विपरीत संजोग के बीच भी 1835-36 के साल में जहाज से कॉटन की दस लाख बड़े पार्सल भेजी थी ।


दरमियान अमेरिका के प्रमुख एंड्रयू जैक्सन ने कॉटन उगाने वाले सब राज्य के लिए उत्पादन शुल्क का सामान धोरण लागू किया था । उसके बाद भारत के कपास का कोई भाव नहीं पूछा जाता लेकिन नसीब को कुछ और ही मंजूर था । तो हुआ यूं कि 1836 में टैक्सास का प्रदेश के लिए अमरीका और मेक्सिको का युद्ध शरू हो गया । जिसका सन 1846 तक अंत नहीं आने वाला था । ब्रिटन की मिलो का काम सिर्फ भारत के कॉटन से ही कार्यरत रह सकता था । कॉटन के लिए ब्रिटेन की मांग भी बढ़ गई थी । भारत का कॉटन उस मांग को पहुंच सकता था लेकिन सवाल यह था कि मुंबई और कोलकाता के पठारी और दूरदराज के क्षेत्रों में उगने वाले कॉटन को बंदरों तक कैसे पहुंचाया जाए ? पक्के रास्ता बना कर !??
इंजीनियरिंग की दृष्टि से देखते हुए बैलगाड़ी के लिए रास्ता बनाने का कार्य बेशक सरल था । इसके अलावा मजदूरों की मजदूरी के अलावा मालसामान का कोई ज्यादा खर्च नहीं होने वाला था । पश्चिम घाट और बंगाल में जब बारिश का मौसम हो तब वह रास्ता अचूक टूट जाता था । बैलगाड़ी की प्रवास मर्यादा 80 किलोमीटर मानी जाती थी । इससे ज्यादा दूर माल पहुंचाना हो तो बैल गाड़ी उसका लिए रात में रुकने के लिए , किसान के खाने का और बैल की खाने का खर्च भी आए तो ऐसा ट्रांसपोर्ट कैसे किया जा सकता है । उसमें इतना खर्च आ जाये कि इतनी लंबी दूरी तय ना करे वही बेहतरीन काम था ! उस समय मुंबई के चीफ इंजीनियर रोबोट क्लार्क ने ऐसे कई पहलुओं को देखने के बाद सन 1843 में गवर्नर ज्योर्ज आर्थर के समक्ष प्रस्ताव रखा : रास्ता के बदले रेलवे बांध लेते है ।


प्रस्ताव योग्य था लेकिन उसका योग्य अमल कर दिखाए इस मुद्दे पर बात अटक गई । ईस्ट इंडिया कंपनी सिर्फ व्यापरी संस्था थी । कॉटन , मसाले , रेशमी कपड़ा व दूसरी चीजों का व्यापार उसका काम था । वो भला कपड़े का व्यापार चलाने के लिए भारत मे रेलवे जैसे स्थावर मिलकत में अपना पैसा क्यो बर्बाद करें ? दूसरी ओर ब्रिटिश सरकार मैनचेस्टर की कपड़ों की मिलों को भारत के कच्चे माल से सक्रिय रखने की इच्छा रखती थी । जिससे अंग्रेज कामदार बेरोजगार न बने । इसके लिए ईस्ट इंडिया कंपनी को मददगार होने का इरादा किया । लेकिन मदद के बहाने त्राहित देश में परमैनेंट पैसो का इन्वेस्टमेंट करने के लिए वह बिल्कुल तैयार नहीं थी । ब्रिटन में उस समय बनने लगी रेलवे कंपनियों को पैसे देने वाले अंग्रेज शाहूकार तो मिनिमम रिटर्न की गारंटी लिए बिना किसी विदेशी प्रोजेक्ट में पैसे का इन्वेस्टमेंट कभी न करे ।

George Stephenson and Robert Stephenson
George Stephenson and Robert Stephenson


अब जरा अनुमान कीजिए कि भारत में रेलवे युग लाने के लिए कौन आगे आया ? कोई दूसरा नही बल्कि पहले रेलवे इंजन का शोधक जॉर्ज स्टीफन खुद ! सन 1844 में प्रोत्साहन और भरोसे से ब्रिटिश उद्योगपति जॉन चेपमेन ने द ग्रेट इंडियन पेनिंस्यूलर रेलवे कंपनी की स्थापना की और ज्योर्ज स्टीफंस में उस कंपनी का प्रथम डिटेकटर बना । मुंबई से पश्चिम घाट की ओर जाती रेलवे लाइन बनाने के लिए उसने दरखास्त कि । आज बहुत कम लोग जानते होंगे कि रेलवे इंजीनियर से जुड़ी हर हर पार्ट में कंपनी का मुख्य सलाहकार उसका पुत्र रॉबर्ट स्टीफन्सन था । जिसने सन 1826 में ब्रिटेन में ब्रिटन के वेल्स टापू को उत्तरी द्वीप ऐन्जेलिस से जोड़ने वाला 580 फीट लंबा सस्पेंशन ब्रिज मेनाई की खाड़ी पर बांधा था । मुंबई के रेलवे इंजीनियरिंग काम भी उसके प्लान के अनुसार होने वाला था । मुंबई और ठाणे के बीच 33 किलोमीटर लंबी पटरी डाल दी जाए तो उसके पिता ज्योर्ज स्टीफनसन के रेलवे इंजन वाली गाड़ी उस ट्रैक पर दौड़ने वाली थी । ब्रिटेन की पारलामेंट ने जब GIP कंपनी को सत्तावार मान्यता देनेवाला अधिनियम 4 साल बाद सन 1849 में पास किया । तब ज्योर्ज स्टीफन्सन जिंदा नहीं था । अगले ही साल उसकी मौत हो गई थी ।

द ग्रेट इंडियन पेनिन्यूस्लर कंपनी को भारत के पश्चिम किनारे रेलवे तंत्र स्थापित करने का हक मिला तो पूर्व में कोलकाता और रानीगंज के बीच 61 किलोमीटर लंबी रेलवे लाइन का 2 गुना का काम का कॉन्ट्रैक्ट ब्रिटिश ईस्ट इंडिया रेलवे कंपनी को मिला । इन दोनों कंपनी के बीच बिजनेस स्पर्धा थी । जिसका प्रोजेक्ट पहले पूरा होता उसे मुम्बई , कोलकाता , मेरठ , अलाहाबाद और मद्रास के प्रादेशिक विस्तार में दूसरी रेलवे लाइन का काम मिल सकता था । एक बहुत ही अच्छी बात यह थी कि ईस्ट इंडियन रेलवे का अंग्रेज मालिक का नाम भी स्टीफन्सन था । पूरा नाम था – रोनाल्ड मैकडोनाल्ड स्टीफन्सन !


GIP के रेलवे ट्रेक के लिए भूमि का सर्वे करने के लिए उसका चीफ इंजीनियर जे. बी. बर्कली फरवरी , 1850 में मुंबई आया । आज महानगर बना मुंबई उस समय लगभग जंगल था । पाँच लाख लोगों की बस्ती के लिए परिवहन के साधनों में मुख्य रूप से घोड़ा गाड़ी और बैलगाड़ी थी , जिनके चालक पूरे साल के दौरान ₹600 और 70 से ₹90 तक कमाते थे । पूरे मुम्बई में लगभग 145 किलोमीटर लंबे रास्ते थे । जबकि कोलाबा , माहिम और सालसेट जैसे द्वीपो के बीच आने-जाने के लिए लोग नाव का उपयोग करते थे । इजनेरी सर्वे का अभी तो प्राथमिक लेवल ही पूरा हुआ था कि जे . बी . बर्कली समझ गया कि मुंबई टू थाने के बीच रेलवे लाइन प्रोजेक्ट उसे मानसिक और शारीरिक रूप से थका देने वाला साबित होगा । बोरी बंदर से भायखला के बीच का मैदानी प्रदेश और उसके बाद बाघ ,, तेंदुए , भालू , जहरीले सांप और अजगर की बस्ती वाले जंगल में थाने तक फैले हुए थे । सायन का कीचड़ वाला झील का प्रदेश तो रेलवे ट्रेक के लिए बिल्कुल कारगर नही था । ध ग्रेट इंडियन पेनिंस्यूलर रेलवे के प्रोजेक्ट में लगभग 2500 मजदूरों से काम चल जाएगा ऐसा जे. बी . ब्रकेली को 10,000 मजदूरों को काम पर लगाना पड़ा ।
दूसरी ओर भारत में ईस्ट इंडियन रेलवे कंपनी ने अपना काम बहुत ही तेजी से आगे बढ़ाया । पथ्थर तोड़कर कपची बनाना , जमीन को समतल करना और कच्चा माल पहुंचाने जैसे की जिम्मेदारी स्थानिक प्रायवेट कंपनियों को दे दिए थे । ब्रिटन को लोकोमोटिव कंपनी को रेलवे इंजिन और कोच के ऑर्डर भी दे दिए थे । EIR का मालिक रोनाल्ड स्टीफन्सन को भारत की प्रथम पैसेंजर ट्रेन दौड़ाने का यश मिलने वाला था । ईस्ट इंडिया कंपनी के गवर्नर जनरल लॉर्ड डलहौजी की इच्छा थी कि पहली ट्रेन सर्विस कलकत्ता में शुरू हो क्योंकि गोरी सरकार की राजधानी वहां थी ।

शरूआत में काम बहुत तेजी से आगे चला लेकिन बाद में स्टिंफँसन का नसीब उल्टा पड़ा । कलकाता से रानीगंज के बीच में चंदन नगर नाम की फ्रेंच वसाहत आती थी । फ्रेंच ईस्ट इंडिया कंपनी वहां अपने व्यापारी केंद्र स्थापित किये थे। अंग्रेजो के साथ उनकी अनबन थी । इसलिये रेलवे ट्रेक बिछाने की मंजूरी चंदननगर ने नही दी । न चाहते हुए भी ईस्ट इंडिया कंपनी के इजनेरो को डायवर्जन जैसा वैकल्पिक रास्ता पसंद करना पड़ा । कुछ बजट बढ़ गया । माइल के हिसाब से 5000 पाउंड का खर्च उसमें हो रहा होता था । फिर भी GIP कंपनी मुंबई और ठाणे के बीच रेलवे ट्रेक जोड़े उससे पहले इस कंपनी ने अपना कार्य पूरा कर दिया । भारत की प्रथम ट्रेन दौड़ाने में इस्तेमाल होने वाले रेलवे इंजन और कोच की ही कमी रह गई थी ।

The trail tren of J B Berkeley in Mumbai
The trail tren of J B Berkeley in Mumbai


भारत के इतिहास में कोलकाता के बदले मुंबई का नाम चमकने वाला था । EIR का कमनसीब श्राद्ध में एक छोटी सी तीली के कारण काम अटका पड़ा था । रेलवे लाइन के पीछे सवा लाख पाउंड से भी ज़्यादा खर्च करने के बाद अब मालिक रोनाल्ड स्टीफन्सन और उसके इंजीनियर भारत की पहली ट्रेन को दौड़ती हुई देखने को उत्सुक थे । सब की आशा पर पानी फेरनी वाली घटना तब बनी ।
ब्रिटन से दो जहाज GIP और EIR के रेलवे इंजिन के साथ लगभग एक साथ रवाना हुए थे । मुम्बई आने वाला जहाज तो समय पर आ गया लेकिन EIR का इंजिन लेकर चलने वाला गुडविन नाम का जहाज ने रहस्यमय कारण से ऑस्ट्रेलिया की दिशा पकड़ ली । रास्ते मे समुद्री तूफान के कारण उसे पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया के बंदरगाह का आसरा लेना पड़ा या नही ये तो कौन जाने लेकिन वह कोलकाता के हुगली बंदर पर बहुत देर से पहुंचा । इंग्लैंड से EIR के लिए पैसेंजर कोच के साथ रवाना हुआ दूसरा जहाज तो पहुंचा ही नहीं । रास्ते मे ही डूब गया । इस बुरी खबर ने सबको बहुत निराश कर दिया । लेकिन चीफ इंजीनियर ज्होन होगसन ने दो स्थानिक कंपनी सेटन एन्ड कंपनी और स्टुअर्ट एन्ड कंपनी के सहयोग में इमर्जन्सी रेलवे कोच बनाने का काम शरू करवाया ।

The first Passenger train of India ( Between Mumbai and Thane , November 18, 1852 at 3:30 PM
The first Passenger train of India ( Between Mumbai and Thane , November 18, 1852 at 3:30 PM


लेकिन बाजी अब हाथ में से निकल चुकी थी । मुंबई में GIP का मुख्य इंजीनियर जे . बी . बर्कली और उसके 10000 मजदूरों ने 1852 साल पूरा हो इससे पहले थाने तक की 33 किलोमीटर लंबी रेलवे लाइन तैयार कर डाली थी । नवंबर 1852 के दिन बर्कली कंपनी के बड़े साहब ट्रायल रन के लिए रवाना हुए । पोलाद का बना प्राणी अबुध और अशिक्षित लोगों के लिए तो बिल्कुल नया था । उन्होंने तो इसकी कल्पना तक नहीं थी । कुछ उसे देखकर डर के मारे वहां से भाग खड़े हुए , कुछ लोगों ने उसे दैत्य नही बल्कि शक्ति समझकर उसे नारियल भी चढ़ाए । कुछ लोग अंग्रेजो को इसके लिए धन्यवाद भी कर रहे थे ।
मुम्बई के इतिहास में नवम्बर 18 , सन 1852 का दिन 45 मिनट चली यात्रा सर्वप्रथम मानी जाती लेकिन GIP के नियामकों ने उसे ट्रायल रन ही कहा । पैसेंजरों के लिए प्रथम ट्रेन की बारी बहुत समय के बाद आई। 5 महीने बीत गए । ईस्ट इंडियन रेलवे को अनजानी मुसीबत नहीं आई होती तो कलकत्ता टू रानीगंज ट्रेन सेवा उन्होंने कब की शुरू कर दी होती लेकिन नसीब उन से दो कदम पीछे चल रहा था ।
प्रथम पैसेंजर ट्रेन आखिर में अप्रैल 16, 1853 के दिन दोपहर 3:30 पर 31 तोपों की सलामी के साथ 400 पैसेंजर लवकर थाने जाने के लिए निकल पड़ी । भारत उस प्रवास के कारण रेलवे युग में प्रवेश कर गया । ब्रिटिश उद्योगपति जॉन चेपमेन की द ग्रेट पेनिंयूसलर उसके लिए निमित्त बनी थी । कोलकाता और रानीगंज का रेल व्यवहार फरवरी 3 , 1855 के दिन शुरू हुआ । देर होने में सब दोष शायद नसीब का था ।
उसी नसीब की बलिहारी देखिये । जब भारत मे रेलवे की 150 वी जयंती आई तब उसके उत्सव में भी मुम्बई केंद्र में था कलकत्ता नही !

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