रशिया का तांत्रिक रास्पुटिन जो जारशाही  के लिए अभिशाप बना

रशिया का तांत्रिक रास्पुटिन जो जारशाही के लिए अभिशाप बना

रशिया का तांत्रिक रास्पुटिन जो जारशाही के लिए अभिशाप बना

तो हुआ यूं कि रशिया की राजधानी सेंट पीटर्सबर्ग में जार निकोलस और जरीना अलेक्जेंड्रा का 3 साल का बेटा अलेक्सेई राजमहल के बगीचे में खेलते समय गिर गया । शरीर में छोटा घांव लगा और उसके बाद जो रक्तस्राव शुरू हुआ वह रुका ही नहीं । थोड़े घंटे बाद उसे बुखार चढ़ गया और घांव पर सूजन आ गई । चेहरा निस्तेज बन गया । लगातार हुआ खून बंद हो इसलिए डॉक्टरों ने बहुत सारे उपाय किए लेकिन उसका कोई असर नहीं हुआ । रक्तस्त्राव रुकने की संभावना वैसे भी बहुत कम थी । क्योंकि युवराज अलेक्सीई हिमोफीलिया नाम के रोग के साथ जन्मा था । यह रोग जिसको होता है उसके जख्मों में से निकलने वाला खून सामान्य व्यक्ति के खून की तरह कुदरती रूप से जम नहीं पाता । इसलिए रक्तस्त्राव अटकता नहीं । एलेक्सेई की भी यही दशा थी । समय जैसे-जैसे बीतता गया वैसे वैसे वह मृत्यु के द्वार के नजदीक जाता रहा । उसका बिगड़ता हुआ स्वास्थ्य देखकर डॉक्टर विवश होकर देखते रहे । चौथे दिन उन्होंने ‘ ईश्वर ही अब युवराज को जीवनदान दे सकते हैं । ‘ ऐसे शब्दों के साथ डॉक्टरों ने जार राजा के समक्ष अपनी लाचारी जाहिर कर दी । तब दुनिया के सबसे बड़े विशाल साम्राज्य का वह सत्ताधीश कांप उठा । निकोलस को चार बेटीया थी जबकि एलेक्सई उसका एकमात्र पुत्र था । वह एकमात्र गादीवारिस था जिसे खोने के डर से जार व्याकुल हो उठा । जरीना एलेग्जेंडर भी डॉक्टरों को अभिप्राय सुनकर उसकी सांस बैठने लगी ।


चार दिन बीतने के बाद जुलाई 16 , 1907 की देर रात सेंट पीटर्सबर्ग के वैभवशाली राज महल का वातावरण बहुत ही गंभीर और क्षुब्ध था इलेकसेई लगभग मरने ही वाला था । जार निकोलस दिन चेहरे पर उसके बगल में खड़ा था और उसकी आंखें बेहोश पड़े हुए अपने बेटे को ताक रही थी । जरीना भी बिल्कुल दुखी चेहरे से पुत्र के बिछाने के पास बैठी हुई थी । बेटे को बचाने के लिए कोई चमत्कार हो इसलिए उसके मन में प्रार्थना चल रही थी । मृत्यु निकट जाने वाला उसका उसके बेटे को बचाने के लिए कोई चमत्कार कर दिखाएं ऐसे कथित संत की खोज में निकल चुके थे । इतिहास में ‘ ध मेड मंक ऑफ रशिया ‘ नाम से कुख्यात होने वाले ग्रेगरी एफिमोविच रासपुटिन नाम के उस संत के पास चमत्कार करने की अलौकिक शक्ति हो या ना हो लेकिन सामने के व्यक्ति के दिमाग पर चमत्कारिक रूप से छा जाने कि उसमें बेशुमार शक्ति थी । अनेक लोगों को असाध्य रोग उसने अपने प्रार्थना बल से मिटाए थे ऐसा कहा जाता था । इसलिए झार के परिवार के साथ निकट संबंध रखने वाले परिवारों की उमराव महिलाओं ने युवराज के लिए रासपुटिन को बुलाने की सलाह दी। और हताशा में डूबे जार निकोलस जिस तरह मरने वाला आदमी तिनके को भी पकड़ लेता है उसी तरह निकोलस ने भी रासपुटिन को बुलाने के लिए सिपाही को भेज दिया । मध्यरात्रि के बाद का समय था । राजधानी से आठ दस किलोमीटर उत्तर नेवा नदी के किनारे ग्रीष्म ऋतु की खुशिया मना में रासपुटिन शामिल हुआ है ऐसा समाचार सिपाही का पास था । सिपाहीवहां पर पहुंचे और अग्नि के उजाले में बैठे हुए उस संत की मनोदशा में भंग पड़ गया । कोलाहल शांत हुआ और वापस सुनकर छा गया ।

‘ यहां पर ग्रेगरी एफोमोवोविच रासपुटिन कौन है ? ‘

सबसे आगे रहे सिपाही ने ऊंची आवाज में सवाल किया ।
” मैं हूं ग्रेगरी । ” एक मजबूत आदमी आगे आया ।

वह था रासपुटिन जो अपने भ्रष्टाचार , महत्वाकांक्षा , सत्ता लोभ और महत्वाकांक्षाओं के परिणाम मानव इतिहास की पहली साम्यवादी क्रांति के लिए , प्रथम साम्यवादी राष्ट्र की स्थापना के लिए और 370 साल पहले शुरू हुई ज़ारशाही के खुनभरे अंत का कारण बनने वाला था। के लिए करने वाला था जाट साही का खून भरा अंत का कारण भी बनने वाला था । जार निकोलस के राज परिवार का वह काल था जिसे ढूंढने के लिए सामने से चलकर उन्होंने अपने सिपाहियों को भेजे थे ।

” नामदार , ज़ारेविच गंभीर बीमारी में हैं । नामदार ज़ार और नामदार ज़रीना की इच्छा है कि ईश्वर के संत के रूप में आप ज़ारेविच को ठीक कर दे । “

रासपुटिन तुरंत अपने घुटने पर बैठ गया और दो हाथ से क्रॉस बनाकर आकाश की ओर देखा और फिर नीचे मस्तक झुकाकर प्रार्थना करने लगा । 5 मिनट बाद खड़ा हुआ और फिर आत्मविश्वास के हुंकार से बोला ,

ईश्वर ने मेरी प्रार्थना सुन ली है । युवराज बच गए हैं । इसी क्षण से उनकी तबीयत में सुधार होने लगा है । चलिए मैं आपके साथ चलता हूं । “

रासपुटिन की प्रार्थना का कमाल हो या फिर संयोग का प्रताप जो भी हो लेकिन सेंट पीटर्सबर्ग के राज महल में मौत के हवाले होने वाले एलेक्सेई का बुखार धीरे-धीरे कम हो गया और बाद में उसकी तबीयत में फर्क नजर आने लगा । बचाव की थोड़ी सी भी आस नही थी एस वहां जार जरीना ने देखा कि पुत्र के चेहरे पर थोड़ी बहुत चमक आ गई है । बुखार का प्रमाण भी कुछ कम हो गया है । कोई सीधा कारण नहीं था जिसके कारण तबीयत में अचानक सुधारा हो जाए । लेकिन फिर भी उसे बहुत अच्छा लग रहा था । आधा पौना घंटा बाद एक सेवक ने ज़ार ज़रीना को रासपुटिन का राज महल में आगमन होने की जानकारी दी । इकलौते बेटे को बचाने वाला संत कैसा है ये देखने की उत्कंठा से ज़रीना एलेक्जेंड्रा ने दरवाजे की ओर नजर डाली। पुत्र के असाध्य रोग ने दोनों को अंध श्रद्धालु बना दिए थे। तभी तबीबी शास्त्र में जिस रोग का कोई इलाज नहीं था इसलिए वह संत फकीर की ओर दौड़ पड़े थे । और उनके इस रवैया के कारण राज परिवारों में उनकी हांसी भी होती रहती थी ।

ऊंचा , मजबूत और दिखने में प्रभावशाली इंसान दरवाजे में दाखिल हुआ । बदन पर लाल रंग का कपड़ा लपेटा हुआ था , सिर पर लंबे गुच्छे वाले बाल बिखरे हुए थे और माथा में ठीक बीचोबीच थोड़ा टेढ़ी मांग पूरी हुई थी । लंबी दाढ़ी छाती पर बिखरी हुई थी तो उसके धूल से सने हुए बूट पहन कर जाजम पर मककमता के साथ चले आने वाले रासपुटिन को थोड़ी देर के लिए ज़ार और जरीना देखते रहे । उस इंसान का पहनावा बिल्कुल ही ठीक-ठाक नहीं था लेकिन उसकी मुखाकृति को देखकर कोई अदृश्य शक्ति जैसे प्रकट होती थी । वह तेजस्वी लग रहा था । सम्मोहन की असस को जन्म आने वाला प्रभाव उसके चेहरे पर था और दृष्टि में वेधकता थी । नजदीक आकर उसके उसे ने गंभीर आवाज ने कहा , ” थोड़ी देर पहले मैंने युवराज के स्वास्थ्य के लिए प्रार्थना की है । उसने मेरी प्रार्थना सुन ली है । युवराज की तबीयत अब ठीक होने लगी है और वह बच जाएगा ।

यह और व्याकुल ज़ार जरीना को बहुत पसंद आए । रासपुटिन के प्रति उनके मन में आस्था की भावना जन्मी । क्योंकि एलेक्सेई 4 दिन पहले बीमार होने के बाद थोड़ी बहुत राहत हुए पाने घंटे से ज्यादा समय नही हुआ था । अंध श्रद्धा वाले ज़ार जरीना तो यही मान बैठे कि रासपुटिन की प्रार्थना के कारण ही उसके बेटे पर देवी असर हुई है ।

रासपुटिन ने युवराज की बिछाने के पास गया । घुटने पर बैठकर फिर प्रार्थना मगन हो गया । दो-तीन बार क्रॉस की संज्ञा की फिर खड़ा होकर और अपनी दाये हाथ की हथेली एलेक्सेई के माथे ओर रखी । जरीना को लगा कि रासपुटिन ने शायद सच में ही उसके बेटे में अदृश्य शक्ति का सिंचन कर रहा था । रासपुटिन ने अपने हाथ को दूर किया तब तब जरीना ने उनके उत्कंठा के साथ पूछा , ” क्या वाकई मेरे पुत्र की जिंदगी बच गई है ? “

रासपुटिन ने विश्वास से कहा , ” उसमे कोई शंका नही है । ” ” और युवराज पर जहां तक मेरी दृष्टि है तब तक वह कभी मर नहीं सकता । मेरी प्रार्थना की शक्ति पर विश्वास रखे । ” आस्था छोड़ चुके जार निकोलस ने देखा कि उसके बेटे के गोरे मुख पर अब थोड़ी चेतना दिख रही थी । रक्तस्राव बंद हो गया था । सुबह होश में आया । आंखें खोली और पिता के सामने नजर करके फिर हंसा । तब निकोलस के मन से सब चिंता का बोज हट गया । अब उसका पुत्र सलामत है और रासपुटिन की प्रार्थना के बल से हमेशा सलामत रहने वाला है ऐसा ख्याल से प्रसन्न हुए निकोलस ने अपनी डायरी में लिखा , ” आज ईश्वर के दूत के साथ मेरी मुलाकात हुई । “

रासपुटिन सच में देवी शक्ति वाला यीशु का दूत जैसा संत था ? उसके चमत्कार से एलेक्सेई ठीक हो गया था ? संजीवनी जैसी कोई शक्ति उसे ईश्वर ने दी थी ? बहुत सारे सवाल थे लेकिन वह सब निरर्थक है । क्योंकि जैसे ज़रीना अंध श्रद्धालु थी वैसे वह भी बन गया था । क्योंकि उनके बेटे की बीमारी गंभीर बनने का सही कारण तो शायद यह था कि उसके खून जमने में थोड़ा बहुत वक्त बीत गया और इस दौरान रक्तस्त्राव शुरू रहा। खून का समय जमा जब रासपुटिन ने उसके लिए स्वास्थ्य के लिए प्रार्थना कर रहा था । तर्कसंगत बात को स्वीकार करने जैसे विवेक बुद्धि अब जार निकोलस में नहीं थी । गद्दी के वारिस के सिर पर लटकती हुई असाध्य रोग की तलवार के बीच ढाल बनकर सके ऐसा सिर्फ रासपुटिन तहस । ऐसा मानकर उस पाखंडी साधु को अपने राजमहल रहने के लिए एक अलग खंड दे दिया । यहां पर हमेंशा रहने के लिए अलग से ने अपनी दृष्टि में रखना था क्योंकि अब एलेक्सेई को विरासत में मिले असाध्य रोग हमेशा का था ।

रशिया के शाही परिवार तक तब यह रोग फैलाने के लिए ब्रिटन की रानी विक्टोरिया जिम्मेदार थी । विक्टोरिया जी जिनेटिक ब्ल्यूप्रिन्ट के X क्रोमोसोम में हिमोफिलिया का कारक ऐसा जिन था। अब इन रोग की खासियत यह है कि स्त्री उस्की वाहक होती है लेकिन वह रोग उसे नही होता ! भविष्य में वह जिस संतान को जन्म देती है तो उसमें लड़की उससे मुक्त रहती है जबकि पुत्र को यह रोग विरासत में मिलने का चांस 50% जितना होता है । सामान्य रूप से दो पुत्रों में एक को ये रोग होता हज तो दूसरे को नहीं होता ! रानी विक्टोरिया के कुल 9 संतान थी। एक पुत्र लियोपोल्ड 1853 में जन्मा और बहुत कम आयुष्य में सन 1884 में 31 साल की उम्र में मर गया । रानी विक्टोरिया की तीन बेटियां विक्टोरिया , एलिस और ब्रिटिश हिमोफिलिया के कारण एक्स क्रोमोसोम्स की वाहक थी । ऐलिस जर्मन राज्य के हास के साम्राज्य के राजकुमार लुइस चतुर्थ से शादी हो गई और उसे वहाँ वर्षों बाद एलेक्जेंड्रा नामक एक बेटी का जन्म हुआ समय के साथ, रूस की ज़रीना बन गई । उसकी शादी निकोलस से हुई थी। चार बेटियों के बाद एलेक्जेंड्रा ने बाद में चार बेटियों को जन्म दिया जबकि एलेक्सेई उसका एक मात्रा बेटा था। जिसे हिमोफिलिया का रोग विरासत में मिला था। जिसके कारण उसके घांव में से खून बहता रहता था , जमता नही था।

हेमोफिलिया का कोई इलाज नहीं था। जब महल में रास्पैटिन नामक चमत्कारी ओलिया का आगमन हुआ
तब जरीना एलेक्जैंडा ने पुत्र की चिंता में उसकी प्रार्थना की शक्ति में अंध विश्वास पर भरोसा करके मानसिक शांति पाई । ज़रीना को कल्पना नही थी कि रास्पैटिन का आगमन रूसी साम्राज्य के पतन के लिए ऊंट के कंधे पर
रहे आखिरी तिनके जैसा साबित होने वाला था।

एक तरह से रासपुटिन दीमक ने खोखली की हुई इमारत को उखाड़ फेंकना सिर्फ एक बहाना था । क्योंकि सन 1894 के बाद सत्ता में आने के बाद वह इमारत दिन-प्रतिदिन खोखली होने लगी। रूस के प्रांतीय प्रांतों के अपने सामंती प्रभु, रईस, सेनापति और हैं पादरी का प्रभाव बढ़ रहा था। ये दमनकारी अधिकारी लोगों द्वारा अत्यधिक शोषण किया जा रहा था। कहीं विद्रोह व्याप्त था। सेंट पीटर्सबर्ग में ज़ार निकोलस अपनी ओर से सरकार चलाने वाले प्रधान स्वार्थी और लालची थे। संघर्ष, शोषणऔर अत्याचार अपनी हदे पार कर रहे थे। साम्राज्य अविश्वसनीय रूप से विशाल था, अर्थात् निकोलस दूरदराज के क्षेत्रों में प्रांतों, सामंती प्रभुओं, कुलीनों और प्रमुखों को नियंत्रित करने के लिए वह अक्षम था और उसकी निष्क्रियता को देखकर, लोग असंतोष से जल रहे थे। निकोलस न केवल निष्क्रिय था बल्कि अपने पूर्वजों की तुलना में कमजोर भी था । उस्की किस्मत भी कमजोर थी । साथ ही वह अंधविश्वासी भी था । इसका अंदेशा 1 नवंबर, 1894 के दिन उसके राज्याभिषेक के समय ही मिला गया था । ईसाई धर्म का पालन करने वाले धर्मभीरु थे । शुकन अपशकुन में मनाते थे । सिंहासनारूढ़ महारानी विक्टोरिया के दौरान आमंत्रित रूसी (पति: प्रिंस अल्बर्ट) परंपरा के साक्षी। प्रतीक के साथ निकोलस को आभूषित करने के बाद सबसे महत्वपूर्ण माना जाने वाला आप्रतीक नीचे गिर गया था । किसी ने भी सीधे तो कोई निःश्वास नहीं लीया लेकिन हर किसी के मन मे कुछ अशुभ होने वाला है इस बात पर विचार कर रहा था। दूसरी अघटित घटना कुछ घंटे बाद हुई। राज्याभिषेक समारोह के दौरान रूस में थेरियन सेरेमनी आयोजित हुई। मास्को में त्योहार एक अभूतपूर्व आपदा में बदल गया। एक बड़े से आंगन में एक बड़े भोज की व्यवस्था की गई थी। बीच में एक गहरी खाई थी, जो पक्की थी जिसे लकड़ियों से ढक दिया गया था। लेकिन आमंत्रित लोगों के वजन के कारण तख्त टूट जाने से चारो ओर गभराहट फैल गई। भागभागी होने लगी। रास्ते में सैकड़ों आदमियों को भीड़ ने कुचल दिया और मार डाला गया। मृतकों की संख्या 5,000 तक पहुंच गई । तो अंधविश्वास में विश्वास करने वाले रूसियों ने महसूस किया की नए ज़ारिस्ट साम्राज्य में कुछ अशुभ होने वाला है । निकोलस के राज्यारोहण में ऐसी ही घटना दक्षिणी शहर कीयेव में हुई । त्यौहार में तीन सौ आदमियों ने झंडों और कई दीपकों से सजाई नावों में बैठकर लोग नेपियर नदी गए लेकिन वह डूबने से अधिकांश लोग मारे गए।

इन सभी अशुभ घटनाओं वास्तव में निकोलस के अमङ्गल भाग्य का पूर्व संकेत जैसी साबित हुई । उसके बाद तो एक के बाद राजकीय आपत्तियां उसके सामने आ खड़ी हुई । पहली गंभीर आफत का सामना उसे सन 1904 में करना पड़ा । जब रूस और जापान के बीच युद्ध हुआ। दोनों देश तब प्रादेशिक थे और उनकी अपनी सीमाएँ फैलाये जा रहे थे । उनके भौगोलिक हित अंततः चिंगारियों में बदले और लड़ाई शरू हो गई । । हुआ यू कि निकोलस के पिता ज़ार अलेक्जेंडर ने सन 1891 में पूर्व मॉस्को से पश्चिम के प्लादीवोस्तोक के बंदरगाह (जापान के सागर) तक ( तथाकथित तट पर) लगभग 8500 किलोमीटर लंबी ट्रांस साइबेरियन रेलवे का निर्माण शुरू करवायाथा।

पूर्व की ओर साम्राज्य का पंक्ति को अधिक संगीन बनाने के लिए रूस ने सन 1896 में चीन के मंचूरिया प्रांत में
तटीय क्षेत्र पट्टे को भाड़े पर लिया। यहां उनके पास पोर्ट आर्थर नामक एक बंदरगाह पर स्टेशन स्थापित करना चाहता था। वर्षों से मंचूरिया का दावा जापान के प्रभाव रूस पेसारो को पसंद नहीं आया। दोनों देशों के बीच राजनीतिक असंतोष शुरू हुआ । दिन-प्रतिदिन यह उग्र बनता गया और आख़िर 9 जुलाई, 1904 को जापान ने रूस के साथ राजनीतिक संबंध तोड़ दिए । दो दिन बाद जापानी नौसेना ने पोर्ट आर्थर नेवल बेस की घेराबंदी करके युद्ध की घोषणा की।

दुनिया में सबसे बड़े और महान साम्राज्य में जापान की क्षमता हाथि तुलना में खरगोश जितनी थी । उसका आकार रूस का 59 गुना है छोटा था, इसलिए उसकी गुस्ताखी ने ज़ार निकोलस का दिमाग को गर्म कर दिया।
जापान को निकोल्स संदेश भिजवा दिया कि घेराबंदी को उठा लो अन्यथा आप बुरी तरह से हार जाएंगे। रूसी सेना इतनी बड़ी है कि उसके सैनिक मी भले ही टोपी को फड़ाएंगे तो उसकी लहर में उड़ जाएंगे !

यह चेतावनी दुश्मनों के पैरों को ढीला कर सकती थी । लेकिन रूसी भी सेना की ताकत के बारे में निकोलस जितना ज्ञान था उससे अधिक ज्ञान जापानियों के पास था। चेतावनी का जवाब देने की जहमत भी नहीं उठाई।पोर्ट आर्थर की घेराबंदी भी नहीं की गई थी। निकोलस अपमान से जल गया aur सेना और नौसेना को भेजे के आदेश दिए । जापानी बंदरो को दया किये बिना उन्हें मसल दो ! ये काम उसे बाये हाथ का लग रहा था ।जबकि युद्ध के मैदान की वास्तविकता बहुत ही अलग थी । उस समय जापानी सेना की शक्ति और जुनून के चरम पर था। उत्तरी चीन में मंचूरिया के पास केवल 2,00,000 सैनिक थे, तो पूर्वोत्तर क्षेत्रों में रूसी सैनिकों की संख्या सिर्फ 80,000 थी। ट्रांस-साइबेरियन रेलवे का निर्माण अभी भी अधूरा था । हथियारों को 2,500 किमी की दूरी पर नियमित रूप से उन्हें पहुंचाना भी मुश्किल था। सैनिक खुद लड़ने के लिए उत्सुक नहीं थे और गरीबी में रहने वाले उपेक्षित लोग महंगे युद्ध के पक्ष में नहीं थे ।

इन परिस्थितियों को देखते हुए, ज़ार के कुछ बुद्धिमान सलाहकारों ने युद्ध के बदले बातचीत के रास्ते को अपनाने के लिए राजी किया, लेकिन ज़ार राजा तो लड़ने के मूड में था। और तो और जर्मन सम्राट विल्हेम कैसर ने उसे ऐसा पत्र लिखा कि वह लड़ने के लिए तैयार हो गया । उसने ज़ार को जापानी बौद्ध सैनिक ईसाई धर्म को गिराना चाहते है ये कहकर उसे भड़काया। रूस में अगर सबसे ज्यादा ईसाई रशिया में है तो सबसे ज़्यादा सैन्य शक्ति भी रशिया में है । तो यह रूस के लिए भी ईसाई धर्म की रक्षा के लिए जिम्मेदारी निभानी होगी। अगर रूस पानी में बैठता है तो यूरोप के छोटे ईसाई राष्ट्र किसकी आशा करेंगे ? विल्हेम कैजर के पत्र को पढ़ने के बाद निकोलस का साहस बढ़ गया।

जर्मनी के सम्राट उसके सामने झुके ये कोई सामान्य सम्मान नहीं था। ईसाई धर्म को बचाने के लिए सेंट पीटर्सबर्ग चर्च में ज़ार ने व्रत लिया। रूसी सैनिक भी ईसाई धर्म के कारण लड़ने में उनका महत्वपूर्ण योगदान था पादरी और साथ ही प्रतीकों की छवियां लड़ने के लिए सामने भेजने की व्यवस्था की । शुरुआत के कुछ महीने बाद स्थिति यह थी कि दुश्मनों से लड़ना था । वहाँ तोपखाने थे, जबकि रूसी सैनिको के पास छवि के अलावा कुछ नहीं बचा था। पोर्ट आर्थर को बचाने गए 38 में से 35 युद्ध जहाजो को जापानी नौका दल ने डुबो दिया । युद्ध के मैदान में अधिक सैनिक को भेजा जाता रहा वैसे उनका संहार होता रहा। एक समय पर इन सैनिको की संख्या 2,00,000 तक पहुंच गई । निकोलस ने हार को स्वीकार करते हुए पोर्ट आर्थर को जापान को सौंपना पड़ा। साथ ही रुसने मंचूरिया पर भी नियंत्रण खो दिया। रूस की आर्थिक रीढ़ को तोड़ने वाला युद्ध उन्नीस महीने तक चल । इस बीच, सेंट पीटर्सबर्ग में, ज़ार निकोलस के साथ एक घटना हुई । उनका युद्धवाद युद्ध के मैदान की तबाही से कई गुना अधिक गंभीर था।

रविवार, 4 जनवरी, 1908 को, हजारों गरीब किसान, मजदूर और बेरोजगार राजधानी की जमी हुई नई नदी पर इकठ्ठा हुए और ज़ार के राजमहल की ओर बढ़ने लगे। जुलूस महल की ओर बढ़ा। मोर्चा शांत था। समाज के उच्च वर्ग द्वारा शोषण और सरकारी नौकरशाहों का उत्पीड़न के प्रति ज़ार का ध्यान आकर्षित करने लिए एक आवेदन प्रस्तुत करने के लिए ही उन्होंने ये मोर्चा निकाला था । देश में मजदूर लोगों के लिए औद्योगिक सुधार , नागरिकों को व्यक्तिगत स्वतंत्रता और जापान के खिलाफ महंगा युद्ध बंद करने की उनकी मुख्य मांग थी। लोगों के इरादों ने ज़ार पर दबाव डालने के लिए नही बल्कि अनुरोध करना था । कुछ के हाथों में तो ज़ार के बड़े आकार के चित्र भी थे, जो उनकी आशा के साथ ज़ार के प्रति निष्ठा की भी सूचक थी ।

यह घटना रूस के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ बन गई । महल में ज़ार के अंगरक्षकों का प्रमुख ने लाखों आवेदकों ने विद्रोहियों को समझ लिए । कुछ देर बाद महल के पीछे के दरवाजे खोले गए और कई बदुकधरी घुड़सवार निकल पड़े। ज़ार को अपना एकमात्र रक्षक मानते हुए राहत की मांग करने के लिए आने वाले लोगो को कोई चेतावनी बिना ही गोली चलाने के आदेश दे दिए । निर्दोष लोग लगे और बर्फ से ढका महल का प्रांगण खून से सनकर लाल हो गया । एक घंटे के बाद गोलियों और लोगो की चीखें थम गईं । करीब 500 शव वहां पड़े हुए थे , खून में सराबोर होकर !

इतिहास में खूनी रविवार के नाम से जाना जाता वह दिन 22 जनवरी , 1905 का था । निकोलस रक्त के प्यासे ज़ार के रूप में कलंकित हुए । ईस दुखद घटना ने पूरे रूस में खलबली मचा दी। ज़ार को खुद के शोषितों और पीड़ितों लोगो का ज़ार पर से भरोसा उठ गया। इसलिए सब आशा पर पानी फिर जाने से लोग आंदोलन की राह पर चल पड़े। कर्मचारी हड़ताल पर चले गए। किसान अपने दमनकारी जमींदारों के खिलाफ खड़े हो गए । रूसी नौसेना ने काला सागर के तट पर ओडेसा के बंदरगाह में लंगर डाले बड़े युद्धपोतों के नाविकों ने ज़ार के झंडे को उतारकर साम्यवादी लाल झंडे को लहराया। अन्य मनवारो ने उसका अनुसरण किया । रूस में आने वाले बर्शेविक क्रांति की वह शुरुआत थी।

परिवर्तनशील समय को निकोलस समझ नहीं सका और उसने फांसी, गोली मारना, बरामदगी, कारावास।और निर्वासन जैसे अमानवीय दंड से आंदोलन को कुचलने का प्रयास किया। अंत में 30 अक्टूबर, 1905 के दिन वह जनमत के सामने झुका । लोगों को भाषण, मताधिकार और निर्वाचन की स्वतंत्रता दी इतना ही नहीं देशनिकाल किये और राजकीय नेताओं को बिना शर्त माफी दी । राजनीतिक नायक कम्युनिस्ट पार्टी के नेता प्लादिमीर लेनिन था। नवंबर में उन्होंने स्विट्जरलैंड से रूस लौटा आया । अगले महीने ज़ारवादी कम्युनिस्ट पार्टी के नेता प्लादिमीर लेनिन ने रूसियों का आह्वान किया कि वे उनके खिलाफ एक राष्ट्रव्यापी विद्रोह शुरू करें । जिसका प्रतिसाद इतना व्यापक था कि ज़ार की सेना में विद्रोह को कम करने के लिए सेना ने 15,000 लोगो को मार डाला । लगभग 30,000 लोगों को गिरफ्तार किया गया था। लेनिन और उनके साथियों ने गिरफ्तारी से बचने के लिए फिर से देश छोड़ दिया। साम्यवादी क्रांति इसलिए उन्हें एक और मौका मिलने तक विदेश में रहना था — और रासापतिन के पाप में वह अवसर बहुत जल्द आने वाला था।

निकोलस विद्रोह डेढ़ साल बाद उस पर नियंत्रण ले लिया । 16 जुलाई, 1907 को पहली बार महल में रासापतिन का प्रवेश हुआ तब असंतुष्ट माहौल अभी भी तनावपूर्ण था और देश के राजनीतिक मंच पर खून का रंग था । निराशा का अंधेरा था, जिसमें कभी यहां क्रांति की ज्वाला दिख रहा था। राजनीति के अलावा निकोलस परिवारिक रूप से भी चिंतित था । क्योंकि एकलौते बेटे को हीमोफिलिया का रोग है ये जानने को मिला था। बीमारी घातक थी उसकी आँखों के सामने उसने वह तांडव देखा था। महारानी विक्टोरिया की पोती इरीन के दो बेटे रक्तस्राव के कारण 11 साल और 4 साल उम्र में मर गए थे ।

विक्टोरिया के सबसे छोटे बेटा लियोपोल्ड की मौत भी 31 साल की उम्र में मामूली चोटों से हो गई थी। विक्टोरिया के समय हीमोफिलिक दोहित्रा फ्रेडरिक तीन साल से ज्यादा नहीं जिया था । इस उदाहरण को देखते हुए अपने बेट एलेक्सई की लंबी उम्र के लिए उसे बहुत उम्मीद नहीं थी । वैसे भी वह उस वास्तविकता को भी बदल नहीं सकता था या। दूसरी ओर जरीना अपने बेटे की बीमारी के लिए एलेक्जेंड्रा खुद को दोषी मानती थी , लेकिन बीमारी की वास्तविकता को भी स्वीकार करना असंभव था। उसका मन तैयार नहीं था। धार्मिक आस्था और कोई भी बीमारी दैवीय चमत्कार से ठीक हो सकती है ऐसा मानती एलेक्जेंड्रा राहत पाने के लिए नजूमियों और संतो से दिलासा चाहती थी। इस तरह की मानसिक निराधार अवस्था मे जब मौत और जिंदगी के बीच अपने बेटे को लड़ता देखा तब से उसने अपने बेटे को रासापतिन की देवताई छत्रछाया में अलेक्सई को बड़ा करने का फैसला किया।

ज़ार निकोलस भी अपने अंधविश्वास में सहयोगी बने। दोनों एसे किसान अलगरी की अदृश्य पकड़ आ गए जो
विचार, भाषण और व्यवहार में बदतमीज होने के अलावा, पूरी तरह से अनपढ़ होने के बावजूद अभी तक दुनिया के सबसे बड़े साम्राज्य के प्रशासन को हाइजेक करने वाला था ।

10 जनवरी, 1869 के दिन साइबेरिया के प्रकोवस्कये नाम के सामान्य किसान परिवार में पैदा हुए रासपुटिन उर्फ ​​ग्रेगरी येफिमोविच में शासन भोगने की क्षमता सभी तरस से शून्य से कम के स्तर पर थी । अपनी युवावस्था के साल उसने भटकना और चोरी करने में बिताए थे। जीवन मे कोई ध्येय ही नही था। क्योंकि आगे बढ़ने के लिए उसे कोई संस्कार ही नहीं मीले थे। एक बार भटकने के दौरान उसने उत्तर रूस में वर्खोतूरे गांव में रहस्यमय
तीन महीने तक मठ में रहा । ईसाई धर्म का पलायनवादी संप्रदाय को मानते मठ के सब अनुयायी जादूटोना , शाप और चमत्कार जैसे दैवी शक्ति ग्रहण करने के साधनों में, अयोग्यता पर विश्वास करते थे । अंधविश्वास के अलावा कुछ नहीं था । रासयूटिन पर उसका रंग चढ़ गया और वह धार्मिक चमत्कारों का उपासक बना । साथ ही वह उस धर्म का प्रचारक बन गया। तीस साल की उम्र के बाद उसने ईसाई समुदाय के पवित्र तीर्थ स्थल यरुशलम का दौरा किया । रूस वापिस आंव के बाद उसने सार्वजनिक मार्गों पर, सार्वजनिक उद्यानों में और कभी-कभी चर्चों में व्याख्यान देने लगा । मानसिक पीड़ा में और निराशा में आराम चाहने वाले विचार शून्य लोग भी उसे मिलने लगे । साथ ही बड़ी बात यह थी कि चर्च के पादरी इससे प्रभावित थे, क्योंकि कई बार उनकी सिफारिश के कारण ही वह सेंट पीटर्सबर्ग के महल तक पहुंच पाया । भिक्षु बनने के बाद भी उसका आपराधिक दिमाग नहीं बदला । लेकिन उसके तथाकथित अलौकिक चमत्कारों और व्यक्तित्व से सुन होने वाले लोगो की मंजर उसके मांस तक नहीं पहुँच सकती थी ।

एक बात इतिहास के आधार पर लिखनी ही पड़ेगी की रासपुटिन के आने के बाद युवराज एलेक्सी कई बार गिरे और उनके घुटनों और कोहनियों से खून बहता रहा । हालाँकि हर बार उसने केस्साती से प्रार्थना की और खून बहना बंद हो गया। जब आंतरिक रक्तस्राव के समय रास्पैटिन की प्रार्थना ने अलेक्सिन को दर्द से राहत दी । सोच कर देखे तो जो वह कर रहा था उसमें रतिभर चमत्कार का अंश नही था । केवल चमड़ी के छीलने से हो रहा अस्पष्टीकृत रक्तस्राव उस परिस्थितियों में थम जाता था। जब कोई गहरा घांव लगने से रक्तस्राव रुकता नहीं है। अलेक्सई को परेशान करने वाली बड़ी समस्या आंतरिक रक्तस्राव थी। शरीर के जोड़ जैसे हिस्से पर मार लगने से आंतरिक रक्त वाहिकाओं के साथ-साथ बारीक नसों का टूट जाती थी। जोड़ों में रक्त का निरंतर प्रवाह होता था जिससे मांसपेशियों पर दबाव होने से असहनीय दर्द होता था । कुछ चिकित्सकों का तर्क यह था कि बीमारी से छुटकारा पाने के समय एलेक्सेई की उथली हुई बीमारी में उसके साथ घण्टे बिताने वाले रासपुतिन चमत्कार से नही बल्कि सम्मोहन से उसके दर्द से छुटकारा दिला रहा था। वैज्ञानिक रूप से सिद्ध क्या होता है कि सम्मोहन के प्रभाव में व्यक्ति अपने शारीरिक दर्द को भूल जाता है या दर्द उसके लिए सहनीय हो जाता है।

रास्पैटिन का चमत्कार जो भी हो लेकिन ज़ार और जरीना ने बेटे के प्यार के कारण उसके आदि बन गए। इस स्थिति को देखते हुए रास्पैटिन में महत्वाकांक्षा के पंख फूटी और भविष्य को अपने स्वयं के ‘दिव्य दृष्टि’ और राज्य प्रशासन के अनुसार राजनीतिक मामले में सलाह देने लगा । एक अनपढ़ अबुध गांव वाला चौबीस घंटे शाही दंपति के साथ रहता है ये लोग समझ नही सकते थे। क्योंकि उनको एलेक्सेई की बीमारी के बारे में कोई जानकारी ही नही थी । फिर भी लोगों के चिल्लाने की आवाज़ कभी-कभी ज़ार के कानों में पड़ सकती है इस बात से उन्हें संतुष्टि थी । लेकिन शाही परिवार में असंतोष जाग गया। ज़ार निकोल्स के नेफ्यू, चचेरे भाई, भतीजी, भतीजे और रईस पद वाले दूसरे उमराव ज़ार की शक्ति में छोटे और बड़े हिस्से वाले थे।

जब रासापतिन ने राज्य के प्रशासन में हस्तक्षेप करना शुरू किया तो उनका लगा कि उनका सिंहासन जैसे उनके हाथों से सरकता हुआ दिखाइ देने लगा । रास्पैटिन के आगमन के बाद ज़ार तो मानो कठपुतलि जैसा बन गया। उसने यह अफवाह फैला दी । अंडरकवर पुलिस ने उन्हें इस अफवाह के बारे में सूचित किया कि जल्द ही रासापतिन ने उन्हें सेंट पीटर्सबर्ग से बाहर भेजने का फैसला किया। ज़ार के फैसले का विरोध किये बिना ही रासपुटिन वहां से निकल भी गया, लेकिन सप्ताह नहीं गुजरा की एलेक्सेई को फिर से रक्तस्त्राव होने के कारण उसे वापस बुलाना पडा । इसबार उसने फिर से युवराज को ठीक कर दिया। तब बेटे को ठीक हुआ देखने के बाद जरीना एलेक्जैंडा ने जिद पकड़ी की लोगों के बीच जो भी अफवाहें फैलाये रासापतिन अब अलेक्सई के साथ महल में ही होना चाहिए। जिद को माना गया और रास्पैटिन का ज़ार निकोलस पर प्रभाव पहले से अधिक हो गया ।

राज्य व्यवसाय में उनका दखल भी बढ़ना था । कुछ ही समय बाद प्रथम विश्व युद्ध यूरोप में छिड़ गया। उस यु द्धमें रूस का कोई लेना देना नहीं था और भाग लेने का कोई कारण नहीं था। लेकिन 1904 में, ब्रिटेन और रूस ने एक लिखित संधि, या दोनों पर हस्ताक्षर किए । यदि एक देश पर हमला हो जाता है, तो दूसरा उसकी सहायता के लिए आएगा । इसलिए जर्मनी ने जब इंग्लैंड के सामने युद्ध घोषित किया तो ज़ार निकोलस 1अगस्त 1914 के दिन उसकी सहायता के लिये गया । रशिया के पास उस समय युद्ध करने की कोई ताकत ही नही थी । सैनिकों के लिए पर्याप्त हथियार नहीं थे, कारतूस के साथ-साथ गोला-बारूद की भी कमी थी और सामने की ओर भोजन और अन्य उपकरण पहुंचाने के लिए पर्याप्त वाहन नहीं थे। बाहोश सेनापति (और ज़ार का चचेरा भाई) ड्यूक निकोलायेविच के नेतृत्व में रूसी सेना ने मामूली शस्त्रों के साथ भी लड़ाई लड़ी । लेकिन छह महीने बाद वह कई मोर्चों पर पीछे हटने लगा। रासपुटिन ने तब निकोलाइयेविच को एक संदेश भेजा, “यदि आप चाहें, तो मैं अग्रिम पंक्ति में रहूंगा । मैं सैनिकों की जीत के प्रार्थना करके उन्हें आशीर्वाद देने के लिए तैयार हूं। ‘ घृणा निकोलाई जवाब भेजा दिया : “आने की अनुमति है। मैं फांसी की रस्सी के साथ मैं आपका स्वागत करूंगा। ”

रास्पतिन के प्रति ऐसी घृणा सरकार में उच्च पद रखने वाले सभी के मन मे थी । क्योंकि वह सभी के प्रशासनिक कार्यक्षेत्र में हस्तक्षेप करता था। रूस इतने बड़े देश के राज्य मंत्री विद्या की आड़ में गूढ़ विद्या की आड़ में ज़ार ज़रीना की अंध श्रद्धा को बेच खाने वाले अगम्यवादी साधु के इशारे पर चले ऐसी हास्यास्पद स्थिति बुद्धिमान प्रशासको को बहुत खलती थी लेकिन शाही जोड़े पर रासापतिन की असर को देखते हुए उनसे विवेक की उम्मीद रखना बेकार था। उल्टा ज़ार उसी के कहने अनुसार वर्तन कर के अपने राजनीतिक जीवन की सबसे बड़ी भूल कर बैठा। बात धूल जैसी थी । जनरल निकोलायेविच तिरस्कृत जवाब पढ़कर नाराज होकर रासपुतिन क्रोध से उसे सेनापति पड़ से निकाल देने के लिए अपनी तथाकथित त्रिकाल दृष्टि से भविष्यवाणी की किरूस के सम्राट खुद युद्ध के मैदान में मौजूद रहकर स्वयम सैनिकों का नेतृत्व करे तभी निश्चित रूप से रूस के भाग्य में जीत लिखी है। वरना हार निश्चित है । देश पर अगर युद्ध का संकट घेर लेता है तब वैसे भी पराक्रमी सम्राट का स्थान वैसे भी शाही महल में न होकर बल्कि अपनी सेना के बीच होना चाहिए।

ये बेकार सलाह अस्वीकार करने लायक थी फिर भी ज़ार को अमल करने लायक लगी । इतिहास को शकव्रती मोड़ और अपनी ज़ारशाही को घातक मोड देने वाला कदम उसने उस पाखंडी के कहे अनुसार उठाया जो खुद दूसरे अनेक मुद्दों की तरह लश्करी व्यूरचना और रणनीति के संदर्भ में भी गंवार था। जनरल निकोलायेविच को उसने निकाल दिया और खुद युद्ध के मैदान पर उतरने के लिए जाने की तैयारी की।

दिनांक 5 सितंबर, 1916 के जिस दिन यह फैसला हुआ ज़ार का भाग्य लगभग तय हो गया था । जर्मनों के खिलाफ अपर्याप्त हथियार वाली रूसी सेना को हार मिले और युद्ध की भारी लागत रूसी लोगों की आर्थिक बेहाली हो उसका सब अपयश अब जनरल निकोलेयेविच की जगह ज़ार के सिर व्यक्तिगत रूप से आने वाला था । पूरे देश में ज़ार कैसे अप्रिय हो जाये , और ज़ारशाही को खारिज कर और कम्युनिस्ट लेनिन का बालिविक क्रांति लाना चाहता था । इस तरह से उस पार्टी का काम उतना आसान होने वाला था।

मोर्चे पर जाने से पहले ज़ार एक और गलती की। राजधानी में उनकी अपनी अनुपस्थिति के बीच राज्य के प्रशासन की जिम्मेदारी उसने जरीना एलेक्जेंड्रा को दी क्योंकि मित्रों या रिश्तेदारों या मंत्रियों पर उसे भरोसा नहीं था। लगभग 2,24 ,00,000 वर्ग किलोमीटर में फैले हुए देश को उसने अपनी पत्नी के भरोसे छोड़ दिया। जिस पर उन्हें भरोसा था लेकिन उसका भरोसा केवल रासपुतिन पर था। क्रांति की खूनी आपदा के बारे में लाने के लिए कोई कम जिम्मेदार नहीं थी । रासापतिन के कहने से ज़रीना ने बहुत से मंत्रीओ को इस्तीफा देने के लिए मजबूर किया गया तो कई वरिष्ठ होदेदारो को सेवा निवृति से दी । ज़ार की सत्ता में हिरसादारी रखने वाले ज़ार के मामा, भतीजे, चचेरे भाई, चाचा, भतीजे आदि की सत्ता को भी वापिस खींच लिया । इन सभी रईसों और रईसों के अवमूल्यन से लोग खुश हुए। सामाजिक और राजकीय परिवर्तन की कामना करने वाले किसानों में ‘किसान के बेटे’ के लिए सम्मान मिला। दूसरी ओर रासपुतिन के कई दुश्मन पैदा हो गए, जिन्होंने उसे हटाने की भी साजिश रची।

षड्यंत्रों में ज़ार का भतीजा दिमित्री पावलोविच सबसे आगे था। रास्पैटिन से छुटकारा पाने के लिए वह सबसे ज्यादा उत्सुक था। अन्य नेताओ में सांसद ग्लैडिमिर पुरिशेविच था जो रशिया के हम साम्राज्य पर एक कहर
पूरे देश में ओलिया फकीर की बोलबाला पूरे देश के लिए कलंक मानता था । साजिशकर्ता का तीसरा नाम लेफ्टिनेंट सुचोटिन था। वह बंदूक चलाने में सक्षम था, जब डॉ लासोव नाम का एक चौथा सदस्य एक चिकित्सक था। पांचवें और मुख्य सदस्य प्रिंस फेलिक्स युसुपोव थे। ज़ार निकोलस की उनकी शादी भतीजी इरिना से हुई थी। सेंट पीटर्सबर्ग रेलवे यार्ड में सभी पांच एक गिरी हुई ट्रेन के एकांत डिब्बे में बैठकर योजना की रूपरेखा तैयार की। रास्पैटिन को पोटेशियम साइनाइड विषाक्तता और जहर केक खिलाकर उसे मार देने का तय हुआ ।

पंडयन्त्र के बाद राजकुमार युसुफोप रास्पतीन को अपने महल में आने के लिए आमंत्रित किया। मुलाकात की तारीख 16 दिसंबर, 1916 और समय थी रात्रि का समय था। बर्फबारी के एक दिन बाद मौसम ठंडा था। सड़कें सुनहरी थीं। येसुपोफे ने अपने नौकरों को एक काम या कोई अन्य काम सौंपकर बाहर भेजे थे। जब रासापतिन आया तो उसने उसे महल के तहखाने के भोजन कक्ष में ले गया। ऊपरी मंजिल से चार या पांच व्यक्ति हँसी और संगीत की आवाजें आ रही थी । यहां तक ​​कि एक महिला भी उनमें शामिल थी । जैसा कि पहले तय किया गया था, यूसुफ़ोश ने कहा कि उनकी पत्नी इरीना कुछ मेहमानों की मेजबानी कर रही थी और थोड़ी देर में वे आगंतुक निकलने वाले थे। वास्तव में शेष चार साजिशकर्ता लेफ्टिनेंट सुचितिन, दिमित्री, डॉ। लसॉवार्ट और पारिशचेव ऊपर की ओर सादा बात कर रहे थे और एक बोर्ड की तरह रखा गया था। इरिना की आवाज रिकॉर्ड की थी। राजकुमार येसुपोव उत्साह के साथ-साथ अज्ञात भय से कांप रहे थे ।

रास्पुटिन ले विरुद्ध षड्यंत्र रचने वाले मुख्य सूत्रधार

पोटेशियम साइनाइड भरा हुआ केक रास्पैटिन को पेश किया गया । उसने अपने सामने शराब की एक बोतल भी रख दी। शिकार करने के लिए उत्साहित युसुपोव जब रस्पति ने पहला केक निगल लिया तब जहर के भयानक प्रभाव देखने के लिए फ़टी आंख देखता रहा। घबराहट की कोई सीमा नहीं थी, दूसरी केक की बारी आई। तीसरे केक की भी बारी आ गई । पोटेशियम साइनाइड का हल्का ज़हर रस्पैटिन का पेट मंथन कर रहा था और युसुपोव की हिम्मत ढीली हो रही थी। डॉ लासोवार्टा के अनुसार, वह प्रत्येक केक में दस पुरुषों को पूरा कर सकता था । उसमे जहर मिला हुआ था, जबकि रास्पैटिन पर कोई असर नहीं दिख रहा था। विषैली शराब की दो कप वाइन भी खत्म कर दी। ओवरडोज पेट में चला गया फिर उसने अपने हाथों को अपनी छाती पर रखा और फर्श पर गिर गया। जहर का मामूली असर भी क्यों नहीं दिखा? सच में अघोरी क्या देवताई शक्ति वाला था ? यसुपोफ की रासापतिन के साथ वर्षों बाद यह आखिरी मुलाकात का बयानदेते समय लिखने के मुताबिक जहर की असफलता को देखने के बाद जहर के असहनीय डर से उसके शरीर में दर्द होने लगा। अब उसकी नसें अधिक दबाव झेल नहीं सकती थी । वह ऊपर आया और ऊपर की मंजिल पर पहुँच गया । दिमित्री पावलोविच एक भरी हुई पिस्तौल के साथ लौटा।

लेकिन तभी रास्पैटिन खड़ा हुआ युसुपोव ने अपनी पिस्तौल अपनी जेब में छिपा ली और उसने दीवार पर लटके हुए एक क्रॉस की ओर रासपुटिन का ध्यान करवाया । उसके बाद तुरंत उसने अपनी बन्दूक निकालकर रासपुटिन की पीठ में गोली मारी। वह कष्टदायी पीड़ा में चिल्लाया नीचे फर्श पर वह अघोरी गिर पड़ा । गोली की आवाज सुनकर जब बाकी साजिशकर्ता नीचे आए तो युसुपोफ उत्तेजना से कांप रहा था। अंतिम छटपटाहट के बाद रास्पैटिन का शरीर लगभग शान्त हो गया। मांसपेशिया ढीली पड़ गई पलकें झपक गईं। थोड़ी देर तक अपनी हथेली नाक पर रखने के बाद, डॉ लासॉवर्ट ने उसे मृत घोषित कर दिया

सभी ने राहत की सांस ली, लेकिन राहत अल्पकालिक थी । अचानक रासपुटिन अपनी आँखें फिर से खोल दीं और एक झटके के साथ उठ खड़ा हुआ और तहखाने की सीढ़ियों पर चढ़ कर महल के आंगन में जाने के लिए दौड़ ने लगा । वह वहाँ तक पहुँच पाता उससे पहले लाडिमेर पुरीस्केविच उसकी पीठ में दूसरी गोली मारो और तीसरी गोली से उसके सिर को छेद दिया। यह आखिरी घातक झटका था । आख़िर कार रासपुटिन मरा । अनेक इंसानों को मार सके उतना जहर खाने के बाद और पीठ में पॉइंट ब्लेंक गोली खाने के बाद भी जिंदा हुए रासपुटिन को अब साजिशकर्ता उसेअवसर देने के लिए तैयार नहीं थे । शव को रस्सी से कैनवास में बांधा गया युसुपोफ ने मोटर में डालकर वे राजधानी की नेवा नदी के पुल की ओर उसे ले गए और उसने नदी की जमी बर्फीली सतह में बने छेद में उसे फेंक दिया। तीसरा दिन जब पुलिस को उसका शव मिला । उसके शव का पोस्टमार्टम करने पर पता चलेगा कि फेफड़ो में पानी मिलना था। जिसका अर्थ है कि उसने जलसमाधि पहले उसकी सांस धीमी चल रही थी ।

.जाहिर तौर पर तीन गोलिया उसे घातक तरीके से नहीं लगी थी । फिर भी अफवाह तो यही फैली कक उसकी जिजीविषा में अलौकिक शक्ति थी। रासपुटिन सायनाइड भी पच गया था ये बात भी अंधविश्वास बढ़ाने वाली पुष्टि थी। विज्ञान के संदर्भ में इसकी संभावित खुलासा ये हो सकता है कि वह हर दिन हद से ज़्यादा शराब पीता था । जिसके कारण उसे अक्लोरहाइड्रिया गैस्ट्रिक नामक बीमारी का असर था। जिसमे पाचन तंत्र में हाइड्रोक्लोरिक एसिड उत्पन्न नहीं होता था। पोटैशियम सायनाइड जब तक हाइड्रोजन साइनाइड में नही बदलता तब तक घातक नही बनता । लेकिन उस परिवर्तन के लिए पेट में हाइड्रोक्लोरिक एसिड होना चाहिए।

उमरावों के हाथों से हुई साइबेरिया के किसानपुत्र और सरकार में सबसे गरीब श्रमिकों के मात्र प्रतिनिधि की हत्या से देश के 80% को नाराज कर दिया । हकीकत उनको लता नही थी । हत्यारे उमरावों को सजा देने की मांग के साथ उन्होंने प्रदर्शन किया। ज़ार अभी भी मोर्चे पर ही था । जहाँ से ज़ार निकोलस ने अपना हुक्मनामु प्रसिध्द करके भतीजी के पति प्रिंस यूसीपोफ और भतीजे पावलोविच दिमित्री को रातोरात देशनिकाल किये । बाकी की गिरफ्तारी करवाई। लेकिन कम्युनिस्ट क्रांतिकारियों की दिशा में झुक रहे जनमत को अपनी ओर खींचने के लिए अब बहुत देर हो चुकी थी।

द्वितीय विश्व युद्ध में रूसी सेना का नेतृत्व रासपुटिन की सलाह के मुताबिक ज़ार महीनों से यूरोप के रेगिस्तान में बैठा था। तब उसके पीछे रूस की अर्थव्यवस्था ढह रही थी। डॉलर के संदर्भ में लगभग 20 अरबों खर्च हुआ था और युद्ध विराम हुआ तो रूस के लिए द्वितीय विश्व युद्ध बिल 24.5 बिलियन डॉलर का हो चुका था। लगभग
12,00,000 सैनिक और 15,00,000 नागरिकों का भोग लिया गया था । पीड़िता को ले जाया गया। सभी प्रशिक्षित सैनिकों मोर्चे पर खत्म हो जाने के बाद नौसिखिया सैनिकों और तलवारबाजी के साथ लड़ाई
जीतने की कोई उम्मीद नहीं थी। सेना में जुनून सबसे नीचे था और विद्रोह की संभावना बढ़ रही थी । सैकड़ों कारखाने युद्ध सामग्री बनाने में लगे हुए थे तो ढाई साल लोगों का जीवन आवश्यकताओं की सख्त कमी के साथ
बीत रहा था । संक्षेप में, वातावरण में क्रांति हुई ज्वाला प्रज्वलित करने के लिए सभी तरह से अनूकूल था।

किसी भी प्रकार की योजना , मार्गदर्शन या कॉल की एक चिंगारी के बिना मार्च, 1917 में ज्वाला सुलग उठी । देशव्यापी हमले, दंगे भड़क उठे और स्थिति को नियंत्रित करने के लिए भेजे गए सैनिक खुद क्रांतिकारी बन गए थे । ज़ार निकोलस तब अपनी पत्नी के हाथ मे रही सत्ता की लगाम संभाल ने के लिए मोर्चे से ट्रेन में सेंट पीटर्सबर्ग के लिए ट्रेन से निकल चुका था। आपखुदी , , तानाशाही, भ्रष्टाचार, शोषण, कुप्रबंधन और अंत में अंधविश्वास ने खोखले हो चुकी रूसी साम्राज्य की इमारत के गिरने अब घण्टे बचे थे। सेंट पीटर्सबर्ग से जब वह 280 किलोमीटर दूर था तब प्सकेव के नाम के स्टेशन के पास उसकी ट्रेन को रोककर उसे खबर दी गई कि सभी मंत्रियों ने इस्तीफा दे दिया है और निजी अंगरक्षक के प्रति वफादार रेजिमेंट ने विद्रोह किया है। संसद ने प्रस्ताव पारित कर उसके आधिपत्य को उखाड़ फेंका था । 15 मार्च, 1917 के उस दिन ने इतिहास ने अपने बदल हुये मिजाज को सबसे ऊपर मानकर निकोलस रॉयल ट्रेन में बैठकर ही गद्दी त्याग के कागज पर हस्ताक्षर किए। रशिया की ज़ारशाही के 370 साल लंबा युग उसे के साथ डूब गया। रासपुटिन की मृत्यु को केवल तीन महीने हुए थे और निकोलस के परिवार के लिए उसने जो भविष्यवाणी की थी वह सच हुई ।

16 दिसंबर 1916 के दिन को रासपुटिन की हत्या की गई । उसके एक दिन पहले उसने एक पत्र लिखा था जिसमें उसने अपनी जान को खतरा है ऐसा कहा था। उसमे लिखा था :

मैं सेंट पीटर्सबर्ग में रहते हुए यह पत्र लिख रहा हूं। मुझे लगता है कि मुझे पहली जनवरी से पहले मार दिया जाएगा। मेरे हत्यारों अगर मेरे चचेरे भाई यदि किसान या मजदूर हैं, तो रूस के ज़ार का भविष्य सुरक्षित होगा और इसकी वंशज सैकड़ों वर्षों के लिए रूस पर शासन करेंगे। लेकिन अगर रईस मारते हैं तो उनके हाथ हमेशा के लिए मेरे खून से सने होंगे । मेरी मौत के बाद रूस के ज़ार, उनकी पत्नी और उनके सभी बच्चे एक साल से ज्यादा नहीं जी पाएगे। ‘

क्या रासपति ने जो कुछ लिखा है, उसमें एक पूर्वाभास है या वह अंधेरे में चला तीर ! लेकिन यह सच हो गया। बाशविक की कम्युनिस्ट क्रांति का जुनून ज़ार के शासन से कम दमनकारी नहीं थी। देश के हर कोने में अमीर, सामंती प्रभु, रईस और जमींदार मारे गए। ज़ार ने सत्ता छोड़कर देशनिकाल होने की तैयारी दिखाई थी, फिर भी ज़ार-जरीना के अलावा क्रांतिकारीयो ने सेंट पीटर्सबर्ग से उनकी चार बेटियों और बेटे अलेक्सीई को पकड़कर उरल पर्वत के एक अज्ञात गांव में भेजा दिया । महीने बाद जुलाई 17 मई, 1918 के दिन उन्हें बंदूक से सिर में गोली मारी गई । दर्जनों गोलियों के साथ अमानवीय रूप से उनको भून दिया गया। रासपुटिन की भविष्यवाणी की उसके अभी दो साल से अधिक नहीं हुआ था।

ग्रेगरी हेफिमोविच ने रास्पैटिन के चमत्कार की भविष्यवाणी की है या नहीं , मानो या न मानो लेकिन यह सच है कि इतिहास के सही मोड़ पर पैदा हुए रासपुटिन ने 370 लंबी ज़ारशाही का अंत लाया और 70 साल के लंबे साम्यवादी शासन की शुरुआत की । इतिहास को पलटने में वह बहुत ज़्यादा कारण रूप बना था -और इसीलिए उसकी मृत्यु हुई । फिर एक किंवदंती बनकर आज तक जिंदा है ।

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