रशिया का अम्बर रूम : दुनिया का आठवां अजूबा

रशिया का अम्बर रूम : दुनिया का आठवां अजूबा

तो अम्बर रूम का शायद आपने नाम सुना होगा । अगर 30 साल के हैं तो सुना ही होगा क्योंकि ये जो हम अम्बर रूम की बात कर रहे है है वह कोई सामान्य रूम या कमरा नही था बल्कि उसे दुनिया का आठवां अजूबा कहा जाता था । चलिए चलते हैं उस खोये हुए इतिहास के पन्ने की दुनिया में ! तो एक बार ऐसा हुआ कि रसिया का चक्रवर्ती सम्राट झार फिटर द ग्रेट प्रशिया की मुलाकात पर गया था । वहां के राजा फेड्रिक के रॉयल पैलेस में उसने सुनहरे रंग का एक कमरा था । राजा फ़्रेडरिक सब मेहमानों को प्रभावित करने के लिए सबको वह मनमोहक कमरा दिखा रहा था उसी तरह उसने पीटर द ग्रेट को भी वह कमरा दिखाया । रशियन झार सच में उस पर मोहित हो गया । कई दीपक का प्रकाश उस कमरे को सुनहरा बना रहा था । उस कमरें की अलौकिक सुंदरता और उसकी कलाकारी की भी बहुत ही मनमोहक कर देने वाली थी । सुनहरा रंग वास्तव में सोने का नहीं था , अगर होता तो भी वह कमरा इतना देदीप्यमान नहीं लगता ।

राजा फ्रेडरिक जनवरी 18 , 1701 के दिन अपने राज्याभिषेक के मौके पर एक यादगार कला के नमूना बनाने के लिए जिन कारीगरों को रोका था उनको राजा फेड्रिक ने सोना , हीरे , गोमेद , मरकत , पुखराज मोती , नीलम , याकूत मानिक जैसे कई सारे कीमती रत्न के साथ अंबर भी इस्तेमाल करने के लिए दिया था । अब ये अम्बर कोई सामान्य चीज नहीं हैं । बहुत ही क़ीमती होता है । यूरोप के बाल्टिक समुद्र के किनारे मिलने वाले लाखों करोड़ों साल पहले के पेड़ों का सूखा हुआ रस जिसे हम तृण मणि भी कहते हैं । उसका इस्तेमाल उसने उस नायाब कमरे को बनवाने में किया था । हाइड्रोजन के 16 , कार्बन के 10 और और ऑक्सीजन के एक अणु से बने हुए इस अम्बर गड्ढे का रंग उस पर गिरने वाले प्रकाश के मुताबिक पीला हरा नारंगी या फिर लाल दिखता है और उसकी सख्तता अंक 3 होने के कारण बाल्टिक के जैसा वह सख्त भी होता हैं ।

पीटर ध ग्रेट और फ़्रेडरिक
पीटर ध ग्रेट और फ़्रेडरिक

प्रशिया के और भवि जर्मन राष्ट्र के फ्रेंडरिक में बलवान रशियन झार को अंबर रूम जैसे ही दिखाया मानो बिल्ली को जैसे दूध दिखा दिया हो ऐसा हुआ । सौ चौरस मीटर की फर्श वाला वह नयनरम्य कमरा उसे नन्हीं सी सपनो की दुनिया जैसा जैसा लगा । झार सम्राट ने वहां पर रुकने के दौरान बार-बार उस कमरे की तारीफ की तो फ़्रेडरिक उसके मन की बात भाप गया । उस समय रशिया की तुलना में प्रशिया बहुत छोटा सा राज्य था । अगर झार सम्राट के मन में आए तो कभी भी उसे जीतकर उसने कमरे को हासिल कर सकता था । यह नौबत न आए इसलिए फ़्रेडरिक सामने से चलकर सन 1716 में पीटर को भेंट में दे दिया ।

दीवार और छत की हर एक पैनल को निकालकर , शहद की जमी हुई धार जैसे झूमर को उतारकर दरवाजे समेत अम्बर दरवाजे को भी निकालकर उसके डजन जितने संदूक भरे गए । समय जाते विश्व की आठवीं अजयबी के रूप में प्रसिद्ध होने वाली यह बेनमून जंगी कलाकृति लगभग ढाई सौ साल के लिए स्थानांतरित हुई । ढाई सैंकड़े बाद उसका फिर स्थान बदला होने वाला था – और जब उसका नया एड्रेस कौन सा होगा यह तो कौन जाने ?

रशिया की सीमा लगातार फैलाये जाते पीटर ध ग्रेट उस दौरान सन 1703 में देश की राजधानी बाल्टिक समुद्र के किनारे पर बनाई और उसका नाम दिया सेंट पीटर्सबर्ग ! कुछ साल बाद रसिया के जाने-माने स्थापितविद बार्तोलोम्यो रास्रेली ने यही पर राजा के लिए सर्दियों का महल बनवाया था , जिसमें वअंबर कमरे को भी समाहित कर लिया गया था ।

पीटर ध ग्रेट का विंटर महल जिसमें अम्बर रूम बनाया गया था ।
पीटर ध ग्रेट का विंटर महल जिसमें अम्बर रूम बनाया गया था ।

सालो बित गए । रसिया में उस दौरान पीटर थे ग्रेट समेंत 13 सम्राट और साम्राज्ञी बारी-बारी से राजगद्दी पर आए । सन 1917 में साम्यवादी क्रांति के पगले राजाशाही खत्म होने के बाद चार वडाप्रधान भी एशिया के शासक बने । चौथे बड़ा प्रधान जोसेफ स्टालिन को सन 1941 में सत्ता मिली । उसी साल नाजी जर्मनी के एडल्ट हिटलर ने रशिया पर हमला किया । सन 1941 , 22 जून के दिन तीन फील्ड मार्शल सेनापति , 3350गाड़ी , 3400 बॉम्बर विमान और 10000 तोपों के साथ 30,00, 000 जर्मन सैनिकों के साथ रशियन सीमा की ओर चल पड़े । महीने में ही उन्होंने 20,00, 000 रशियन सैनिकों को युद्धकैदी बनाएं । इतना ही नहीं लाखों चौरस किलोमीटर प्रदेश भी जीत लिया । अक्टूबर 17 , 1941 के दिन फील्ड मार्शल वोन लिब की अगुवाई में जर्मन दल सेंट पीटर्सबर्ग की 29 किलोमीटर पश्चिम में विंटर पैलेस के पीछे वाले प्रांगण में दाखिल हो गया। लाखो गैलेन लीटर पानी की बूंदे उड़ाने वाले कई फ़वारो से सुसज्जित 300 एकड़ के बग़ीचे में 152 मीटर लंबे और 117 मीटर चौड़ा आलीशान महल था । कद इतना विशाल था कि 6500 मेहमानों को उसमें बड़े ठाठ से समाया जा सकता था । विश्व के 350 अति मूल्यवान माने जाने वाले तैलचित्र से पीटर द ग्रेट ने उसे सजाया था । फील्ड मार्शल वॉन लीग ने ज्यादा दिलचस्पी विंटर पैलेस के अंदर बने अम्बर रूम में थी । यह अनमोल कमरा दुनिया की आठवे अजूबे के रूप में बहुत ही प्रसिद्ध हो चुका था । यह तो सही बात है लेकिन हिटलर की नाजी हुकूमत के मन में महत्व की बात यह थी कि वह कमरा – वह रूम असल में रसिया का ही था । एक समय यह प्रसिद्ध कमरा प्रशिया की अमानत थी । उस काल का प्रशिया यानी आज का जर्मनी ! इसलिए जर्मन ही उसके असल मालिक थे । फ़्रेडरिक की मजबूरी का फायदा उठाकर उससे वह कमरा छीन लिया था । जो अब जर्मनी ने अपने बाहुबल से स्वदेश वापस लाना चाहिए ।

फील्ड मार्शल वॉन लिब ने स्थापत्य और कला के जर्मन उस्तादों को कब के वहां पर बुला लिए थे । जर्मनी के अंबर विद्वान प्रोफेसर ए. रोहड़ की अगवाई में उन्होंने 15 जितने नाजी सैनिकों ने अमूल्य रूम का पैनलिंग बहुत ही संभाल कर उखाड़ लिया । अंबर के छोटे-मोटे कुल 5,00, 000 नंग से जड़ी हुई सब पैनल्स को उनके असल नाप से अलग करके लड़की के 27 संदूक में बहुत संभाल कर पैकिंग कर दी गई । रक्षक सैनिकों के साथ उन्हें लश्करी ट्रक से कोनिसबर्ग भेज दिए गए । दूसरे विश्वयुद्ध के समय कोनिसबर्ग शहर पूर्व प्रशिया में था । प्रिंस बिस्मार्क जर्मनी का एकीकरण करने के लिए प्रयास किये तब अनेक राज्यों को संगठित किये थे। उस दौरान पूर्वी हिस्सा छूट गया था – बाकी रह गया था । क्योंकि बीच में पोलैंड की भौगोलिक फाचर थी । लेकिन दूसरे विश्व युद्ध शुरू करने वाले हिटलर ने सबसे पहला काम पोलेंड को जीतने का किया था और पूर्व प्रिया को जर्मनी में मिला दिया था । पूर्व प्रशिया की राजधानी कोनिसबर्ग पर अब एडोल्फ हिटलर की सत्ता थी ।

अंबर रूम स्वदेश वापस लाने वाले जर्मन ट्रक कोनिसबर्ग में शाही किले में आये। जहां से Eighth Wonder of the world के लिए युद्ध का कोई खतरा नही था । लेकिन कितने समय तक ? भीषण संग्राम में दूसरे साल के अंत में रसिया की ओर उतने पलटा लेना शुरू किया । नाजी सेना जब हल्ला मचाया तब उसकी हर एक इन फैक्ट्री में लगभग 180 सैनिक थे । 18 महीने के बाद अब वह संख्या 80 पर आ गई थी । यह तीनों सेनापतिओं ने सब मिलाकर आठ लाख सैनिकों की मांग की । उस दौरान पारंगत कारीगर और स्थापितविद उस अम्बर रूम को कोनिसबर्ग के शाही महल में फिटिंग कर रहे थे ।

और एक साल बाद रसिया मोर्चे पर जर्मनी को पीछेहट करने की नौबत आई । योद्धा और शस्त्र सरंजाम की बहुत ज्यादा नुकसानी सहन करने के बाद उनको अब रण मैदान छोड़ना अनिवार्य बन गया था । विजयकुच करता हुआ रशियन लश्कर पूर्वी प्रशिया की सीमा तक आ पहुंचा । रशियन उपरांत ब्रिटिश और अमेरिकी विमान भी कोनिसबर्ग पर हमले करने लगे तब प्रोफेसर को डर लगा कि अगर दुश्मन शाही किला को निशाना बनाते हैं तो सूखे के साथ गिला भी जल जाए उस तरह बेशकीमती अम्बर रूम भी उस सहारे में मिट जाएगा । इसलिए 1944 में फिर से उस कलाकृति के पार्ट्स को अलग करके लकड़ी के बॉक्स में भर दिए गए । लश्कर के ट्रक में रखे गए और शहर के दूसरे स्थल पर शायद वहां पर भी बमबारी का खतरा लगा इसलिए वहां से कोई तीसरे स्थान पर ट्रांसफर किए गए ।

रशिया का साम्यवादी सरमुख्यत्यार जोसेफ स्टालिन
रशिया का साम्यवादी सरमुख्यत्यार जोसेफ स्टालिन

बस इतिहास के ज पन्नों पर अंबर रूम की आधारभूत कथा का यही पर खत्म । कोनिसबर्ग का शाही किल्ला छोड़कर रात्रि के समय में चले गए । लश्कर के ट्रकों ने उस अम्बर रूम को कहां पर रखा यह रहस्य था और हमेशा के लिए रहस्य ही रहा । जनवरी 30 , 1945 के दिन रसिया के विजेता सैनिको ने कोनिसबर्ग के किल्ले को घेर लिया । जर्मनी के बर्लिन के साथ उसका संपर्क तोड़ दिया गया । सवा महीने बाद रशियन सैन्य कोनिसबर्ग में प्रवेश कर गया और उस पर रसिया का आधिपत्य स्थापित हो गया ।

कौन जाने क्यों लेकिन रशियनो ने यह भूल की कि उन्होंने पीटर द ग्रेट की अमानत को ढूंढने के लिए तत्काल प्रयास नहीं किए । नाजी के बैनर्स को निकाल फेंकने के लिए कुछ वक्त बर्बाद कर दिया । सरमुख्तियार जोसेफ स्टालिन के आदेश अनुसार कोनिसबर्ग का नाम भी बदलकर कोलिनीनग्राद कर दिया गया । उस के बाद कई दिनों तक शहर में कई जगह पर जगह जगह पुराने नाम मिटाने और नए नाम लिखने में बिता दिए गए । अम्बर रूम को उस समय दौरन मौका देखकर कोनिसबर्ग से बाहर भेज दिया गया । जहां से संदूक यूरोप से भी बहुत दूर चले गए ।

विजेता रशियनो ने उस समय की बर्बादी के उपरांत दूसरी भी भूल की । पूर्व पर्शिया सहित जर्मनी का कुछ प्रदेश उन्होंने जीत लिया था जबकि बाकी का प्रदेश अमेरिका ब्रिटेन और फ्रांस के कब्जे में चले गए थे । रसिया के सरमुख्त्यार जोसेफ स्टालिन ने तय किया था कि हस्तगत किया गया प्रदेश कभी छोड़ेंगे नहीं । इसलिए वहां पर बसने वाले जर्मनों को उन्होंने पसंद की की छूट दी । रसिया के साम्यवादी शासन में जिनको ना रहना हो वह सब अमेरिकन ब्रिटिश या फ्रेंच के जर्मनी में चले जाए । अगर जर्मन वहां जाते है तो जोसेफ स्टालिन को कोई दिक्कत नहीं थी । क्योंकि वह मानता था कि जर्मनों का संख्या बल जितना कम होगा उनको राज चलाना उतना ही सरल होगा । कोनिसबर्ग और कालिनिग्राद के हजारों परिवार तीन लोकशाही देशों देशो की आश्रित बनने के लिए चले गए । रसिया ने लश्कर के पकड़े गए युद्ध कैदियों को भी छोड़ दिए । जेल की सजा काटने वाले राजकीय नेता और उनके गुप्तचरो को भी मुक्त कर दिए गए । परिणाम शायद यह आया कि अम्बर रूम के ठिकाने की थोड़ी बहुत जानकारी रखने वाले भी कोनिसबर्ग में नही रहे । यह भूल कितनी बड़ी परेशानी खड़ी कर सकती थी इस बात का अंदाजा रशियन को क्यों नहीं आया वह ताजुब्ब की बात है । किन्नाखोर और घमंडी स्टालिन ने भी रसिया की छिनी हुई मालमत्ता की फौरन तलाश करने का फरमान क्यों नहीं दिया ? इतिहासकारों के मत के मुताबिक स्टालिन तब जर्मनी पर अपनी राजकीय पकड़ मजबूत करने में व्यस्त था । तंत्र को भी उसने इसी काम में लगा दिया था ।

लेकिन सवा दो सौ साल पुराना अम्बर रूम भुलाने के लिए नहीं बना था । एक बाद एक ऐसी रहस्यमय घटनाये बनने लगी जिसने पूरी दुनिया का ध्यान उस आठवीं अजयबी की ओर खींच लिया । मे , सन 1945 में कोनिसबर्ग किल्ले का संत्रीबिन बुलाए मेहमान की तरह मिलिट्री हेडक्वॉर्टर गया । रशियन अफसरों को ऐतिहासिक अम्बर रूम की गोपीनिय जगह दिखाने की अपील की । संत्री के कहने के मुताबिक 2 दर्जन से भी ज्यादा बॉक्स में अनेक नक्शे दार पैनल बंद रखी गई थी ।

अम्बर रूम का नया अड्रेस : कोनिसबर्ग शहर का किला
अम्बर रूम का नया अड्रेस : कोनिसबर्ग शहर का किला

यह बात सुनकर रोबोट जैसे रशियन अफसरों ने क्या प्रतिभाओं दिया ? मिलिट्री हेड क्वार्टर में उसी समय हर्षोल्लास का वातावरण बन जाना चाहिए था लेकिन नहीं बना । स्टालिन की हथौड़ा छाप सरकार से पहले तो ये पूछना था कि बिन साम्यवादी झार पीटर के अम्बर रूम की जांच करनी चाहिए ? उसे कब्जे में लेना चाहिए । अफसरो ने संत्री को दूसरे दिन आने के लिए कहा ।

दूसरे दिन हकार का संदेशा आ गया लेकिन संत्रि नहीं आया । अगली रात उसका खून कर दिया गया था । अम्बर रूम का पता लगाने के लिए मॉस्को से रह-रहकर सन 1949 में एक जांच कमिश्म की रचना की गई । जिसमे मुख्य रूप से रिटार्यड सेना अधिकारी या गुप्तचर विभाग के लोग थे । उन्होंने विमान से की गई बमबारी में धराशाई हुए मकानों के मलबे की जांच की । स्थानीय लोगों की पूछताछ की और नाजी लश्कर ने युद्ध के दौरान जिन मकानों के बेसमेंट में अपने कंट्रोल में स्थापित किए थे उन सब की मुलाकात ली । लंबी चली जांच का छोटा सा निर्णय यह आया कि अप्रैल 3-4 1945 की रात अम्बर रूम के वाहक ट्रक कोनिसबर्ग के शाही किले के प्रांगण में मौजूद थे । लेकिन अगली सुबह हुए तब प्रांगण बिल्कुल खाली था । एक बात धयान खींचने योग्य थी कि रशियन सेना के आगमन हो उससे पहले ही सब ट्रक क़िलाछोड़ कर चले गए थे । लेकिन अम्बर निष्णात प्रोफेसर ए . रोहड़ उनके साथ जाने के बदले वही पर रहे थे । उन्होंने तो भागने का प्रयास भी नहीं किया था । वे तो रशिया से आये पुरातत्व विद सरकारी विद्वान वी. ब्रयुशोव को मिलने गए । अंबर के गुणधर्मों के ऊपर अपने अनुभव बताएं और युद्ध के बाद तो दोनों अभ्यास मित्र बने । बार बार मिलते रहे । अम्बर रूम का क्या हुआ उस पर खुद कुछ जानता है ऐसा रोहड़ ने दावा भी किया । मित्रता गहरी बनने के बाद एक बार टेलिफोनिक बातचीत के दौरन उसने रूसी प्रोफेसर को अम्बर रूम की महत्वपूर्ण कड़ी देने का वचन दिया । रूसी प्रोफेसर के साथ अगली मुलाकात का समय तय किया ।

निश्चित समय और दिन पर रोहड़ नहीं आया । प्रोफेसर वी. ब्रयुसोव ने वापिस चला गया। किसी डॉ एर्डमान ने रात को फोन करके उसे बुरी खबर दी कि प्रोफेसर रोहड़ अचानक पेट की बीमारी के भोग बने थे । और इलाज करने के बावजूद आखिर में उनकी मृत्यु हो गई थी और पोस्टमार्टम करने के बाद उनके मृतशरीर को दफन कर दिया गया था । बीमारी मौत और मरने की बाद की क्रिया यह सब एक साथ अचानक क्यों हो गया ? रशियन प्रोफेसर ने खुद जांच की लेकिन आखिरी में नाकाम रही । कोनिसबर्ग में डॉक्टर एर्डमान नाम का एक भी डॉक्टर था ही नही । शहर के कब्रिस्तान में पिछले 48 घंटे के दौरान एक भी दफन विधि होने की कोई रेकॉर्ड नहीं था ।

इस घटना के बाद अंबर रिंकी का कोई समाचार नहीं मिला । सन 1960 में कोनिसबर्ग के एक बहुत ही बुजुर्ग व्यक्ति ने अम्बर रूम की हेराफेरी में हिसा लिया था । अंतिम सांस लेते समय उसने यह बात बताई थी । उसने कहा कि बेशक़ीमती तैलचित्र और खजाने को एक बहुत ही बड़े मकान के मजबूत बेजमेंट का इस्तेमाल किया गया था । लेकिन उसका एड्रेस उसे नही मालूम था । इसलिए जांच करने का कोई मतलब ही नही रहा था ।

पश्चिम जर्मनी के सैनिको ने सन 1970 के दायरे में समाचार फैलाये की विष्वयुद्ध के आखरी समय मे रशियनो ने कोनिसबर्ग पर घेरा डाला उससे दो महीने पहले ही नाजी सैनिको ने अम्बर रूम को रातोरात विल्हेम गस्टलोफ नाम के जहाज में भेज दिया था। जो शायद दक्षिण अमेरिका के पराग्वे या अर्जेंटीना जाने के निकला पड़ा था । लेकिन रशियन सबमरीन S-13 सबमरीन ने टारपीडो मारकर उसे समंदर में समा दिया था । सब मुसाफिर मारे गए । 1945 से अम्बर रूम के बारे ऐसी ऐसी और इतनी सारी बाती सुनाइए दे रही थी थी कि उसमें से सच्चाई कौन सी है और कौन सा जुठ ये पकड़ पाना नामुमकिन था । इसी द्विधा मेंं लगभग दो दशके निकल गए ।

पैसेंजर जहाज : विल्हेम गस्टलोफ
पैसेंजर जहाज : विल्हेम गस्टलोफ

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