ध्रुवीय भालू : अस्तित्व की आखरी पुकार

ध्रुवीय भालू : अस्तित्व की आखरी पुकार

ध्रुवीय भालू : अस्तित्व की आखरी पुकार

ग्लोबल वार्मिंग के मामले में कभी अपवाद के रूप में कभी भी अच्छी खबर पिछले तीस साल में कभी नहीं आई । सभी खबरें खराब ही रहज है। आर्कटिक की बर्फ की चादर के बारे में बुरी खबर सबसे आगे रहा है। पिछले सालों में यह अधिक से अधिक सिकुड़ता जा रहा है। चलिए और एक बुरी खबर आई थी लेकिन उस समय किसी ने उस ओर ध्यान नही दिया । क्योंकि बर्फिस्तान के क्षेत्र का आंकड़ा अपने नए न्यूनतम स्तर को छू गया था । अब यह क्षेत्र 20,00,000 वर्ग किलोमीटर से अधिक नहीं है। 1980-90 के दशक के अंक के मुकाबले में ये केवल उसका 45 % की कमी का संकेत देता है।

बर्फ की चादर बरकरार नहीं है। कई जगहों पर टूटने से उसके टुकड़े बने है । और ध्रुव प्रदेश के सफेद भालुओ के लिए शिकार की खोजबीन में लगातार प्रवास करना अब शक्य नही रहा। अब सवाल उनके अस्तित्व का है उत्तर ध्रुव प्रदेश और दक्षिण ध्रुव प्रदेश जैसा खण्ड नही ।वह तो आर्कटिक महासागर का जमी हुई परत है । जी ग्लोबल वॉर्मिंग के कारण बिल्कुल पिघल जाए तो हजारो सफेद भालू अपना आवास हमेंशा के लिये गंवा देंगे । तब उनको भूचर के बदले जलचर बनना पड़ेगा। और वे इसके लिए नही बने। ग्लोबल वॉर्मिंग की बुरी असरों के कारण दूसरे जानवर पक्षीयो के मुकाबले उनको सबसे पहले सहन करना पड़ेगा।

ध्रुवीय भालू

उत्तरी ध्रुव पर भले ही चट्टानी जमीन नहीं है, लेकिन सालो पहले यह ठोस बर्फ के ठोस खण्ड जैसा था। लगभग 1,40,90,000 वर्ग किलोमीटर के आर्कटिक महासागर का लगभग एक किलोमीटर 70% सतह पऊर्जा साल बर्फ से जमी हुई रहती थी। मौजूदा समय की बर्फीली परत से वह बर्फ की परत लगभग ढाई गुना बड़ी थी। सतह बड़ी और महत्तम 50 मीटर (164 फीट) मोटी थी । गर्मियों की विविधता में तटीय बर्फ पिघलना सामान्य था । तब गर्मी में किनारे की बर्फ पिघलती जरूर थी लेकिन सर्दी की मौसम में वह फिर से बढ़ जाती थी । औद्योगिक क्रांति की शुरुआत के बाद जब वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा बढ़ने लगी तब वह संतुलन टूट गया । ये चला तो सालो तक लेकिन शरुआत के सालो में यह ध्यान से बाहर था । ध्रुवीय बर्फ का विस्तार नाप ने का कोई यंत्र नहीं थे। यह काम केवल उपग्रह से करना संभव था। सर्वेक्षण के लिए सन 1979 में पहला उपग्रह को कम पर लगाया गया। उत्तरी ध्रुव का प्रति वर्ष बर्फ की मात्रा उस साल 20,770 घन किलोमीटर कम होने के बाद हर साल सितंबर (ग्रीष्म) सीजन के अंत में) आंकड़े जब सामने आये तब लगातार हो रही स्थिर गिरावट सामने आई । 2009 में तो केवल 7958 घन किलोमीटर जितनी बर्फ रह गई थी। (सूची देखें)। अब सितंबर 2012 के सितम्बर में तो ये आंकड़ा 3000 घन किलोमीटर रह गया।

उत्तरी ध्रुव की सभी बर्फ कुछ ही वर्षों में इसमें समलूरन पिघल जाएगी इसमे कोई संदेह नहीं है । सबसे खराब वर्तमान ध्रुवीय भालू / सफेद भालूओ का होने वाला है। ग्लोबल वार्मिंग के कारण पर्यावरण को बदलने वाले कुछ जानवर अनुकूल वातावरण की ओर पलायन शुरू कर दिया है । लेकिन सफेद भालू तो बर्फ पर ही रहने के आदी है।भालू के लिए विशेष वैकल्पिक आवास नहीं – और कुछ बहुत बचे है वो तो आने वाले समय मे खत्म होने वाले है। उत्क्रांति के दौरान सफेद भालुओ ने बर्फस्तानी पर्यावरण के साथ अनुकूलन साधा है ।

भालू की शारीरिक रचना और शिकार पद्धति को ऐसे वातावरण से कितना गहरा संबंध है उसे अब जानते हैं ।
नाम के मुताबिके कि यह पूरी तरह से सफेद है होते है अर्थात बर्फ की सफेद पृष्ठभूमि में इतने घुलमिल जाते हज की दस मीटर दूर बैठा सफेद भालू आपको नजर तक नही आता। सिर्फ़ उसकी काली नाक उसे पहचान पाएंगे । शिकार को वैसे ऐसा मौका ये सफेद भालू नही देता । यह आमतौर पर सफेद भालू सील नाम के स्तनपायी जानवर कक शिकार बनाता हैं। मछली को पकड़ने के लिए बर्फ के छेद के माध्यम से सील सागर में डुबकी लगती है । सांस को रोककर हर थोड़ी देर बाद सांस लेने के लिए वही छेद से बाहर आती है । तब वहां भालू उसका इंतजार कर रहा होता है । उस छेद ओर जैसे ही सील अपना मुंह दिखाती है उस समय सफेद भालू जो स्फूर्ति और ताकत का जो पर्चा दिखता है उसकी पूरी सजीव सृष्टि दूसरी मिसाल नही है। एक ही पंजे से सफेद भालू 225 किलोग्राम की सील को उछालकर बर्फ पर फेंक देता है और फिर उसकी खोपड़ी पर जोरदार फटका लगता है।

उत्तरी ध्रुव में सफेद भालू के लिए बहुत कम शिकार हैं । वह जहाँ तक नजर पहुंचे वहां तक वीरान लगते बर्फीले इलाके में शिकार की तलाश में हरदिन 20 से 25 किलोमीटर चलता रहता है । आपको 6 किलोमीटर की दूरी तय करनी होगी। कई दिनों तक उसे भूखे रहने हालत पैदा नहीं होती है। कुदरत ने उसे बहुत ही सूक्ष्मग्राही गंध की परख करने वाली इंद्रियां देकर उसके शिकार करने के काम को आसान बनाया है। भोजन से लगभग 15 किलोमीटर दूर से ही भालू की नाक उस की गंध का पता लगा लेता है। बर्फ में सील 1 मीटर के छेद करके उसमें द चूजों को सुरक्षित रखा हो तो उनकी गंध कई किलोमीटर दूर के भालू तक पहुँच जाती है। जैसे-जैसे भालू शिकार करने के लिए आगे बढ़ता है । अपने सिर को बाईं ओर और दाईं ओर मोड़ कर प्राप्त करना होने वाली गंधों की तुलना कर उस पर आधारित भोजन की दिशा का अनुमान लगाता है । एक बार एक राजसी व्हेल (शायद हमेशा की तरह कूदने वाली) सभी कोनों से दो सफेद भालू बर्फ पर गिर केर मर गई । भालू दावत के लिए पहुंचे। एक बैठक में 45 से 50 किलोग्राम भोजन करना सफेद भालू के लिए सामान्य है।

भालू के आकार को देखते हुए इतने भोजन की आवश्यकता होती है। वयस्क सफेद नर भालू 2.4 से 3 मीटर (5 फीट से 10 फीट) लंबे होते हैं और उनका वजन 450 किलोग्राम होता है । ये सामान्य है। आर्कटिक ध्रुव के बाकी हिस्सों में कहीं अधिक विशाल सफेद भालू होते हैं । जुलाई, 1821 में उत्तरी कनाडा में हडसन की खाड़ी में नौकायन जहाज के नाविको ने एक लंबे भालू का शिकार करके उसे तौला तो मैकेनिकल कांटे ने 7245 किलोग्राम का आंकड़ा दिखाया। शरीर की चर्बी का वजन ही 150 किलोग्राम हुआ और त्वचा का वजन 45 किलो हुआ ।

इससे भी भारी ध्रुवीय भालू 1966 में रिचर्ड पेरी नाम के कनाडाई साहसी और उनके कॉमरेड की बंदूकों का निशाना बने। उत्तरी ध्रुव में बाफिन द्वीप के पास उन का शिकार किया गया था। लंबाई 3.35 मीटर (11 फीट) और वजन यह 816 किलोग्राम था। स्थानीय एस्किमो लोगों ने रिचर्ड पेरी को बताया कि उन्होंने इटनक बड़ा सफेद भालू पहले कभी नहीं देखा नहीं था। वास्तव में वजन माप का कोई रिकॉर्ड नहीं था। अगर रिकॉर्ड की बात करे तो ये पहली बार 1960 में नॉट किया गया था ।


शायद हमेंशा के लिए वह रेकॉर्ड होने के लिए बना है। आर्थर डब नाम के अमेरिकी शिकारी ने एक शानदार बड़े सफेद भालू का शिकार गोली मारकर किया ।जिसका वजन 1,005 किलोग्राम था । एक मीट्रिक टन से थोड़ा अधिक था। लंबाई 3.39 मीटर (11 फीट 1.5 इंच), जो औसत से लगभग दोगुनी होती है । शिकारी वैसे तो सफेद भालु की रुएदार खाल के लिए इसका शिकार करते है। लेकिन आर्थर डब ने शिकार किये भालू के जायंट कद को देखते हुए उसे मसाले से भर के उसे सीधे पोज में सिएटल विश्व मेले में सन 1962 में प्रदर्शित किया गया था ।

सबसे बड़ा ध्रुवीय भालू

कनाडाई, अमेरिकी, यूरोपीय और रूसी शिकारी आर्कटिक में वर्षों से भालू को निशाना बना रहे है । लेकिन सौभाग्य से सफेद भालू का अस्तित्व खतरे में आ पड़े उस हद तक बंदूक नही चलाई । अन्य शिकारी ध्रुवीय स्थानीय एस्किमो लोग हैं। भालू को आकर्षित करने के लिए वे अपने आवास के बाहर खुले में सील की चर्बी को पकाते है । भालु का मांस उनके लिए भोजन है लेकिन भालू के लिवर को वे नही खाते। उसे वे पालतू कुत्ते को भी नही खिलाते । विटामिन ए की अधिक मात्रा से उल्टी होती है । जिससे सिरदर्द होता है और इसे डर्मेटाइटिस भी कहा जाता है । त्वचा रोग होता है। एस्किमो लोगों को वसा पकाने की गंध आती है । एक भालू को आमंत्रण देना वास्तव में एक बड़ा जोखिम है है। मांसाहारी स्थलीय जीवों में एकमात्र सफेद भालू ऐसा जानवर है जिसे इंसानों का कोई प्राकृतिक डर नहीं है। आदमी को वह अपने मेनू कार्ड की आइटम मानता है। और उस पर हमला करने के लिए 4.7 मीटर लंबी और स्पीडी तमाचा मार सकता हैं।

यह मांसाहारी जानवर स्वभाव से हिंसक होता है, लेकिन उसे भी विशिष्ट प्रजाति के रूप में अपने अस्तित्व को बनाए रखने का हक है। दुर्भाग्य से ग्लोबल वार्मिंग के कारण उस के बचने की कोई उम्मीद नहीं है। वैसे तो उत्तर ध्रुवों में गर्मियों के दौरान आर्कटिक तटीय बर्फ पिघलता ही है और वहां पपड़ी ढीले टुकड़ों में टूट जाती है लेकिन अक्टूबर में जब गर्मी सितंबर में समाप्त होती है तब टुकड़े फिर से ठंडे पानी से जुड़ जाते है। आखिरी कुछ वर्ष सालो से यह घटना समान रुप से नही हो रही । स्थान का क्षेत्र कम हो रहा और पानी का बढ़ रहा है । शिकार की तलाश में यात्रा करने वाला भालू पहले बर्फ केके टुकड़ों को छोड़केर दूसरे टुकड़े तक पहुंचने के लिए उसे पानी मे कूदना पड़ता है। ये तैरन में कुशल है, फिर भी इस तरह के इलाके में रहने के लिए और अंत में, पानी के बजाय, प्रजनन के लिए उसे जगह की आवश्यकता तो होती ही है।

ग्लोबल वार्मिंग आर्कटिक महासागर की जमी हुई सतहआने वाले वर्षों में पानी कर देगी तब भालू के लिए एकमात्र विकल्प दक्षिणी अक्षांश के भूमि विस्तार की ओर स्थान्तर होना है । । यह देखने की बात है की अभागे सफ़ेद भालू के लिए स्थानों का बदलाव भी जचने वाला नहीं । निम्न अक्षांशों पर ठंड की मात्रा कम होती है। खाल की की मोटी परत होने के कारण यदि तापमान 10 सेल्सियस से भी ज्यादा हो तो सफेद भालू तो पहले हीटस्ट्रोक / लू के कारण मूर्छित हो जाता है और बाद में मर जाता है ।इसे यह दक्षिणी ध्रुव के महाद्वीपीय बैरक पर बसना भी संभव नहीं है । क्योंकि वहां के पेंग्विन को जड़ समेत खत्म कर देगा। उस वातावरण में उसके लिए कोई जगह ही नही है। इसलिए जिसकी जहां जगह होती है उसे वहां ही रहना चाहिए । दूसरी जगह वह उपद्रवी बन जाता है ।

उत्तरी ध्रुव प्रदेश के 20,000 से 25,000 सफेद भालू ग्लोबल वार्मिंग के पहले संकेत के रूप में सामूहिक विलुप्त होने के खतरे में हैं। हालत बिगड़े हुए तो है ही इसके अलावा आर्कटिक की बर्फ पिघलने के कारण संकटभरी इसलिए है कि पूरे बर्फ की पिघलने की जो रफ्तार है उसे देखते हुए उसे सम्पूर्ण पिघलने में अब ज्यादा देर नही ।

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