एक ऐसे मुरलीधर जिन्होंने 17 साल अतुल्य वाद्य ढूंढने के लिए वनवास में गुजार दिए !

एक ऐसे मुरलीधर जिन्होंने 17 साल अतुल्य वाद्य ढूंढने के लिए  वनवास में गुजार दिए !

   भारतीय संगीत के खेर खान कहो या फिर सिर्फ क से लेकर सिर्फ़ ख तक का ज्ञान हो लेकिन यहां पर जो बात बताई जा रही है उसकी सुरावली आपके मन मस्तिष्क को स्पर्श करने वाली  हैं । संगीत से जुड़ा कोई भी बैकग्राउंड आपका न हो तब भी आपको गए बात जरूर छू लेगी । क्योंकि बात बिना  पांडित्य की बिल्कुल सरल है । जिस मुरलीधर की बात है , उसका नाम है पन्नालाल घोष ।
   अब बात करते हैं उनकी कला की तो संगीत में 7 सुर , 3ग्राम , 22 श्रुतियाँ , और 1173 राग – रागिनी और उसके बाद सब के पारस्परिक मिश्रण संयोजन की बात करें तो बहुत बड़ा जुमला होता है । सन 1940 से लेकर 1980 तक के दशक में जितने भी हिंदी फिल्म में गीत बनाए गए वे सब एक दूसरे से बिल्कुल अलग थे ।एक तरह के नहीं । लगभग हर गीत दूसरे गीतों से अलग होता था । अलग राग , अलग  ताल का होता है । और तो औए तबला , सितार , मृदंग , शरणाई , पखावज , वीणा , सुरबहार जैसे सब मिलाकर 450 जितने भारतीय वाद्य है । अंक बहुत विचार करने योग्य फिर भी वास्तविक है ।
   सबसे पुराने वाद्य बंसी की बात करें को जिसके बारे में ऋगवेद से लेकर तीसरी सदी के  संगीत रत्नाकर में भी उसके बारे में विशेष रूप से उल्लेख आया है । यह वाद्य की मदद से कई तरह के सूर छेड़े जा सकते हैं । उसकी खूबी है की उसे सीधी या फिर तिरछी पकड़कर सूर छेड़ा जा सकता है । उसे दोंनो तरह से उसे बजाया जा सकता है । दोनों ही परम्परागत है इसलिए सब उससे परिचित है । अलग अलग सूरो का ख्याल देने के लिए उसे तिरछी पकड़ कर बजाने वाली बंसी की एक तस्वीर यहां पर हम आपके लिए रख रहे हैं ।

Pannalal ghosh
one-such-murlidhar-who-spent-17-years-in-exile-to-find-an-incredible-instrument


  अब शरू होती है रोचक बात ! सात शुद्ध स्वरो के लिए सप्तक नाम है । उसमें मन्द्र  सप्तक , मध्य सप्तक और तार सप्तक इस तरह के तीन प्रकार होते हैं । ध्वनि की ऊंचाई के मुताबिक उनका वर्गीकरण कुछ इस तरह से हुआ है ।

◆ मन्द्र सप्तक :  शास्त्रोंक्त के मुताबिक जिस सप्तक के स्वरों का आवाज सबसे नीचा होता हैं यानी की मंद होता है उसे मंद्र सप्तक कहा जाता है । विख्यात संगीत गुरु भातखंडे के अनुसार उस स्वरो के नीचे बिंदी लगाई जाती हैं : .सा , ऱे , ग़ , .म , .प , .ध , .नि

◆ मध्य सप्तक : ध्वनि जब मन्द्र सप्तक से दोगुनी मात्रा में होती है  उसका नाम मध्य सप्तक होता है । ना ही बहुत नीचा आवाज और ना ही बहुत ऊंचा आवाज , दोनों के बीच के मध्य का होता है । इन स्वरों के साथ बिंदी का चिन्ह नही लगाया जाता है ।

सा रे ग म प ध नि

◆ तार सप्तक : ध्वनि मध्य सप्तक से दो गुना  उच्च मात्रा में  होती है तब उसे तार सप्तक कहा जाता है । उच्च सप्तक उसका वैकल्पिक नाम है जो कि सामान्य रूप से इस्तेमाल नहीं किया जाता । तार सप्तक को पहचानने के लिए हर एक अक्षर के ऊपर बिंदी रखी जाती है ।

सां रें गं मं पं धं निं

    सीधी पकड़कर बजाने वाले बंसी उसके वादक को सुविधाजनक लगती है । लेकिन उसके द्वारा आवाज में बहुत ज्यादा वैविध्य नहीं लाया जा सकता । ध्वनि कोई भी हो वह तीव्र ही रहता है । श्रोता को यह तीव्रता घरेडमय सी लगती है ।  इस तरह से बजाय जाती बंसी 30 सेंटीमीटर लंबी और 6 छिद्र वाली होती है ।ये बंसी  तार सप्तक के उपरांत मध्यम सप्तक को न्याय दे सकती है लेकिन मध्य सप्तक को नहीं ।मन्द्र सप्तक यानी बहुत नीची मात्रा का सूर जो श्रोताओं के कान में मधुरस घोल देता है ।
  बंसी की यह खोट सालों से नहीं लेकिन सदियों से है और यह शुन्यवकाश काश बन चुका था । इसे पूरा किया पूर्व बंगाल के बाद साले में जुलाई 31 1911 के दिन जन्मे पन्नालाल घोष ने । जिनको ये खोट रास नही आई । अलग अलग तरह के वादन से सघन अभ्यास करते हुए उनको लगा कि 30 सेंटीमीटर की रुढिगत बांसुरी में फर्क करना शक्य ही नहीं है । बिल्कुल नए सिरे से अविष्कार करना चाहिए ।


   संगीतशास्त्र से वफादार रहने वाली एक सामान्य बंसी बनाना भी आसान काम नहीं है। एक छोर से दूसरे छोर तक बंसी का घन एक समान व्यास का होना चाहिए । वास का छोर वनस्पति शास्त्र के मुताबिक तो वह बहुत पुराना यहां पर बहुत नया हो यहभीनहीं चलता। अंदर या बाहर गांठ भी नहीं होनी चाहिए या फिर कहीं कोई दरार भी नहीं होनी चाहिए । बांस को पसंद करने के बाद उसे छांव वाली जगह में एक साल तक सुखाना पड़ता है ।
   यह हर तकादे ने पन्नालाल का काम को बहुत ही मुश्किल बना दिया । मन्द्र सप्तक  पैदा हो इसलिए बंसी की लंबाई चौड़ाई बढ़ाने की जरूरत उन्हें लगी ।  मुख्य समस्या बहुत बड़े कद की अनिवार्यता को ध्यान में लेते हुए एक समान घाट के बांस पाने की थी । पन्नालाल घोष को असम और त्रिपुरा के बांस के वनों में खूब भटकना पड़ा । प्रयोग करने पड़े । उपरांत दिल दिमाग में रखे ऐसे मन्द्र सप्तक स्वरों को  एक बांसुरी में से ना निकले तो उसे छोड़कर दूसरी फिर तीसरी , चौथी और बाद में पांचवी को जांचना पड़ा ।
    भारतीय संगीत में मेग्नेफिशन्स ग्लास जैसी अणिशुद्धता के हठाग्रही कितनी हद तक जा सकता है उसका बेमिसाल उदाहरण पन्नालाल  घोष हैं । आख़िर में 45 सेंटीमीटर लंबी बंसी का उन्होंने सर्जन किया।  उस काम के लिए उन्होंने अपने जीवन के 17 साल दे दिए थे।  और तो और छः के बदले आठ छिद्र वाली बांसुरी का ऐसा जादू चला कि ‘ बसंत बहार ‘ फ़िल्म के ‘ मैं पिया तेरी , तू माने या ना माने ‘ गीत में बाँसुरीवादन के लिए संगीतकार जोड़ी शंकर जयकिशन ने कलकत्ता से पन्नालाल घोष को खास विमान भेजकर बलाया था । ‘ नैन मिले चैन कहां ? ‘ , ‘ मुगले आजम ‘ का ‘ मोहें पनघट पे नंदलाल ‘ जैसे कई सदाबहार गीतों को उनकी जम्बो कद की बांसुरी ने मीठी चासनी जैसे बना दिये है । एक बंसी तो उन्होंने 45 सेंटीमीटर की इस्तेमाल की थी , जिसके मन्द्र सप्तक की कोई मिसाल नहीं ।


    आज पन्नालाल घोष भारतीय संगीत के अतुल्य रत्न के रूप में भुला दिए गए हैं । क्योंकि आजकल फिल्मी म्यूजिक का सर्जन नहीं सिंथेसाइजर से उत्पादन किया जाता है । फिर भी हम नसीबदार हम हैं कि पन्नालाल घोष की विरासत उन्ही के द्वारा ही आविष्कृत बंसी बजाने वाले हरिप्रसाद चौरसिया जैसे भक्तों ने अभी तक संभाल कर रखी हुई है ।

Hariprasad Chaursiya
Hariprasad Chaursiya

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