‘ मदारी ‘ आत्मा ( बची हो तो ) झंझोड़कर रख देने वाली फ़िल्म

वैसे तो फ़िल्मे पैसा कमाने के लिए बनाई जाती हैं , उसमें एक्टिंग की जाती हैं और थोड़ी देर मजा लेने के लिए देखी जाती हैं । ‘ सिनेमा ‘ में वह माध्यम हैं जिसका आज तक लोगों को बस उल्लू बनाने व उनको कुछ हद निकम्मे बनाने के लिये भी इसका इस्तेमाल होता रहा । लेकिन चाकू कौन किस मकसद से इस्तेमाल करता है उसी पर उसकी उपयोगिता रहती हैं । गले को काटने भी हो सकती है तो खीरा काटकर उसे खिलाने के लिए भी उसका इस्तेमाल किया जा सकता हैं । ‘ मदारी ‘ मूवी सोए हुए इनासन ( अगर आप है तो ? ) को जगा देने वाली फ़िल्म हैं। भारत की अधिकांश प्रजा सुबह रोटी कमाने के लिए निकल पड़ती हैं । उसके साथ क्या हो रहा हैं , कौन सी ताकत उसे आज आजादी के 74 साल बाद भी गरीब बनाये हुए हैं ? , क्यों उसे रोजाना पीने का पानी तक नहीं मिल सकता ? क्यों वह अपने साथ हो रहे अन्याय को बता भी नहीं पाता ? शायद अन्याय किसे कहते हैं यह भी उसे मालूम नहीं ! सामन्य आदमी और सामन्य विचार व बृद्धि बहुत असामान्य होते हैं ।

मदारी फ़िल्म एक ऐसे ही आदमी की कहानी हैं । शरुआत से लेकर आखरी पल तक बहुत सामान्य सी जिंदगी को असामान्य एक्टिंग ( ? अभिनय लगता तो नहीं ! ) से दिखाया गया हैं । एक राज्य के गृह मंत्री का बेटा किडनेप हो जाता हैं । फिर क्या होना ? उच्चस्तरीय सिक्युरिटी को जैसे कि हर बड़े बाप के बेटे को ढूंढ ने में तुरंत लगाया जाता हैं । अब बेटा किडनेप तो हो गया था , अब इंतजार था फिरौती के फोन का ! उससे भी बड़ा झटका तब लगता है जब फिरौती का फोन आता ही नहीं । सब जगह तलाश की जाती है । बेटे के होस्टल को , उस के दोस्तो को , आसपास के ठेले को ( जहाँ से हफ़्ता लेने से भी इनडायरेक्टली बड़े लोग नहीं चूकते ! ) सब तलाश लेने के बाद सिर्फ उसका स्केच बनता हैं ।

Madaari : a soulful movie
Madaari : a soulful movie

गृह मंत्री के घर तो फोन नही आता लेकिन गृह मंत्री के के बेटे के दोस्त के घर फोन आता है । जब फोन और बात होती है तो सब की जमीन हिल जाती हैं । क्योंकि फिरौती में पैसे नही बेटा मांगा जाता हैं । सब हक्का बक्का रह जाते हैं। सीधी सी बात है किसी ट्रेजिडी ने सामान्य बंदे को खूंखार बना दिया था।

अब बारी आती है जिसने किडनेप किया था । इरफ़ान खान ! कॉमन मेन कि बेमिसाल ताक़त बताई है । ठेले से बच्चे को चुराना , उसे बाहर खाना हजम न होने पर अस्पताल ले जाना , अपने बच्चे को याद करके रोना , ट्रेन में किडनेप किये बच्चे को अपने बेटे की कहानी सुनाना सब एक तरह से आँखों के सामने घूमता रहता है । अंदर के रास्तो में चलना , जैसा देश वैसा भेश बनाकर घूमना , टेक्नोलॉजी से सबको चकमा देना और आखिर में जब सरकार उसके बच्चे को नही ढूंढ पाती तब फेस टू फेस बात करने के लिए गृह मंत्री को कहना एक सामान्य आदमी की सहन शक्ति जब जवाब दे जाती है तब वह कितना खतरनाक बन जाता हैं इसी की झलक है । ख़ास कर तब जबु उसकी पूरी दुनिया ही लूट जाए ।

उस सामान्य इंसान का बेटा पुल के नीचे दब कर मर गया था । अभी तो वह पुल बना ही था । अस्पताल से उसका बेटा एक थैली में पैक करके दिया था । वह समझ ही नही पाया कि उसे आग दे या दफ्न करें । उसकी याद में आत्महत्या करने को चला गया था । लेकिन बाद में वह वापिस आता है और गृह मंत्री , पुल के ठेकेदार , इंजीनियर और पक्ष के नेता सब को अपने घर ले आता है ।

अब पूरी फ़िल्म में ये जो आख़िर में आने वाला क्लाइमेक्स इस फ़िल्म की जान हैं । वैसे तो हम भी फ़िल्मो का बहिष्कार ही करते है लेकिन जब बात हो सही चीज़ की उसकी तरफदारी करना , उसे लोगो तक पहुंचाना ही हमारा उदेशयस है । अब बात करते है इस फ़िल्म के हार्द की !

आखरी क्लाइमेक्स में एक छोटे से घर में राज्य के गृह मंत्री , पक्ष के नेता , ठेकेदार , इंजीनियर और वह किडनैपर और गैस सिलेंडर पर बैठे गृह मंत्री का बेटा होते हैं । अब शरू होता हैं । खेल । इंजीनियर से सवाल पूछा जाता हैं कि

पुल क्यों गिर गया ? डिजाइन में कोई खामी थी ?

जवाब : नहीं । सब बराबर था । पिल्लर , डिजाइन , मटीरियल सब ठीक ही था !

तो फिर पुल क्यों गिर गया ?

ठेकेदार : उपर से नीचे तक खिला ना पड़ा इसलिये पुल ठीक तरह से नहीं बन पाया था । सीमेंट , लोहा और दूसरे मटिरियल्स में भी मिलावट करनी पड़ी !

तो तूने पैसे खाये ? हा ! ऑफ़िसर ने खाये , पक्ष के नेता ने खाएं ! यानी कि गृह मंत्री ने खाये ! हा !

हम तुम जो चाहोगे वो देंगे ! गृह मंत्री किसी बच्चे की तरह गिड़गिड़ाता है जब उसके बेटे के कान से तीन इंच दूर से गोली चली । लेकिन जब वह किडनैपर पूछता है कि निकल गई सब हेकड़ी ! बस इतने में ही । मेरे बेटे को तुमने हजारों टन लोहे के नीचे दफन कर दिया उसका क्या ?

तो तुम्हे क्या चाहिए ?

सच !

आखिर वह सच बाहर आता है जो है तो सबके सामने लेकिन कोई माइ का लाल देखता तक नही ।

गृह मंत्री कहता हैं सच सुन पायोगे ? सच दिल दहला देने वाला हैं । और जब वह सच कहता हैं तो मुजे एक बात याद आ गई कि ‘ कलाकार झूठ बोलते हैं , सच कहने के लिए । ‘

सच डरावना हैं , रूह कांप जाएगी । सरकार भ्रष्ट है यह सच नही है । दरअसल भ्रष्टाचार के लिए ही सरकार हैं ये सच हैं । बीस हजार करोड़ , चालीस हजार करोड़ , एक लाख करोड़ जैसी इम्पॉसिबल लगने वाली रकम हक़ीक़त में नेताओ के पास हैं । सरकार किसी भी हो धंधा ( हा इसे फ़िल्म में धंधा ही कहा गया हैं । ) चलता रहता हैं । सरकार मास्टर है तो ऑपोजिट वाले ठेकेदार । इतनी बड़ी हेराफेरी अकेले तो हो नही सकती । जब बात करते है कि 130 करोड़ लोगों की तो गृह मंत्री कहता हैं : तुम्हारी गिनती बड़ी कमजोर है । कहा है 130 करोड़ ? सब के सब बटे हुए हैं । जाती , कॉम , धर्म , कास्ट और न जाने कौन कौन से भाग में ! सब अलग अलग है । उन एक एक लकड़ी को हम डर , लालच , पैसे या फिर दमन करके तोड़ देते है और हमारा राज चलता रहता है । सब खामोशी के साथ सुनते रहते है । कानून की बात पर गृह मंत्री कहता है कि ये तो लोगो को डराने के लिए है । हम पे लागू नही होता । हम तो तुम्हे 130 करोड़ को अपने पैरों तले रौंदते ही है ।

छोटी सी बात है लेकिन बात पते की है । सब जानकर किडनैपर कहता है , ‘ मेरा तो सब लूट चुका है । ये बातें मेरी तो कोई काम की नही पर शायद पांच , दस या पंद्रह साल बाद शायद किसी के काम आ जाये ? किनता बड़ा विश्वास ! इस फ़िल्म को बनाने वाले को शायद विश्वास था कि ये सब जानकर भी कोई फर्क तो पड़ेगा ही नहीं , लेकिन शायद पंद्रह साल बाद ! कोई आशा की किरण जगेगी !!

आखिर में गृह मंत्री का बेटा जाते जाते उस किडनैपर से लिपट कर जाता है । कहता भी है ‘ पंद्रह साल नही लगेंगे बदलने में !

शायद बच्चे ही इसका हल है । उन्हे सच कहें ! वो ही सच का झण्डा लहरा देगे एक दिन ! हम बस उस दिन की राह देख सकते हैं ।

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