भारत के प्राचीन क्षत्रिय वंश 36 कुल
भारत के प्राचीन क्षत्रिय वंश 36 कुल

भारत के प्राचीन क्षत्रिय वंश 36 कुल

भारत के प्राचीन क्षत्रिय वंश 36 कुल

सूर्यंवंश – आर्यो में वर्णव्यवस्था होने के बाद ऋषियों ने मिलकर सूर्यं नामक आर्य क्षत्रिय की स्त्री सरणयु से उत्पन्न मनु को पहला राजा बनाया । वायु नामक ऋषि ने मनु का राज्याभिषेक किया । मनु ने ही अयोध्या नगरी बसाई और उसे अपनी राजधानी बनाई । मनु के जितने पुत्र हुए, वे सब सूर्यवंशी कहलाए। उस युग में सूर्यंवंशियों के अयोध्या, विदेह और वैशाली आदि राज्य थे । मनु के लगभग 9 10 पुत्र हुए। अयोध्या का राज्य मनु के बाद उसके बड़े पुत्र इश्वाकु को मिला । उसके वंशज इक्ष्वाकु कहलाए, यह देश कौशल (अयोध्या) था । राजा मनु का एक पुत्र’ नाभानेदिस्त था, जिसे उत्तर बिहार का राज्य पिला, यह भ्रू-भाग आजकल तिरहुत का इलाका कहलाता है । इस वंश में एक राजा विशाल हुआ जिसने वैशाली नगरी बसाकर उसे अपनी राजधानी बनाई । यह नगरी आगे चलकर काफी प्रसिद्ध हुईं । मनु के एक पुत्र करुष के वंशज करुष कहलाए। ये बडे जबर्दस्त लडाकू थे, इनका राज्य आधुनिक बघेलखंड में था, इसलिए उस युग में वह प्रदेश कल्प कहलाने लगा । शर्याति नामक मनु के पुत्र का राज्य गुजरात में था, इसका पुत्र आनर्त था, जिससे वह प्रदेश ‘आनर्स कहलाया । आनर्त के रोचवान, रेव ओररैवत तीन पुत्र थे । रेवत के नाम पर बर्तमान गिरनार रैबत पर्वत कहलाया। आनर्त देश की राजधानी कुशस्थली वर्तमान द्वारिका थी । इस राज्य को पुण्यजन राक्षसों ने समाप्त कर दिया । मनु के एक पुत्र का राज्य यमुना के पस्विमी तट पर था तथा एक पुत्र धृष्ट का राज्य पंजाब में था, जिसके वंशज घाई क्षत्रिय कहलाए।

भारत के प्राचीन क्षत्रिय वंश 36 कुल
भारत के प्राचीन क्षत्रिय वंश 36 कुल

इस्वाकु के भी कई पुत्र थे, परन्तु मुख्य दो थे, राजा की ज्येष्ठ संतानं विकुक्षी था, जिसे शशाद भी कहा जाता था । वह पिता के बाद अयोध्या का राजा बना । शशाद के पुत्र का नाम काकुत्स्य था, जिसके वंशज काकुरुस्थी कहलाए। इस्वाकु का दूसरा पुत्र निर्मा था, उसका राज्य अयोध्या और विदेह के बीच स्थापित हुआ । इस वंश के एक राजा मिथि हुए, जिन्होंने मिथिला नगरी बसाई । इस वंश में राजा जनक हुए। इस राज्य और अयोध्या राज्य के बीच की रेखा सदानीरा (राप्ती) नदी थी ।
इस वंश की आगे चलकर अनेक आखर-उपशाखा हुई और वे सब सूर्यवंशी कहलाए। इस वंश के महत्त्वपूर्ण नरेशों के नाम पर अनेक वंशों के नाम हुएहूँ जैसे… इस्वाकु , काकुत्स्थ से काकुत्स्य वंश कहलाया। रघु के वंशज रघुवंशी कहलाए।
अयोध्या के महाराजा काकुरुस्थ का पौत्र पृथु हुआ । इसने शुरू में जमीन को नपवा कर हदबन्दी करवाई । उसके समय में कृषि की बडो उव्रति हुई थी । वह चक्रवर्ती सम्राट था । इसी के नाम पर भूमि का नाम पृथ्वी पडा । इसके बआद अयोध्या के चक्रवर्ती सम्राट मान्धाता, सगर, भगीरथ, दिलीप, रघु और राम हुए । सूर्यवंश की ही दूसरी शाखा में वैशाली के चक्रबर्ती सम्राट मरुत हुए थे ।
आजकल के कुछ विद्वानों का कहना है कि सूर्यवंश और चंद्रवंश मिथ्या कल्पना है । वे दलीले देते हैँ कि सूर्य और चन्द्र से संतान केसे उत्पन्न हो सकती है? यह तो उनका कहना ठीक है, परन्तु इसकी वास्तविकता पर वे गहराई से नहीं सोचते । हमारे शाखों में स्पष्ट लिखा है कि आर्यो के क्षत्रिय वर्ण में एक पुरुष सूर्य हुआ जिसके वंशज सूर्यवंशी कहलाए। आगे चलकर उन्होंने अपना चिह्न गगन-मंडल को प्रकाशित करने वाले सूर्य को बना लिया ।

नागवंश – आर्यों में एक क्षत्रिय राजा शेषनाग था । उसका जो वंश चला, वह नागवंश कहलाया। प्रारम्भ में इनका राज्य कश्मीर में था । वाल्मीकीय रामायण में शेषनाग और वासुकि नामक नाग राजाओं का वर्णन मिलता है । महाभारत काल में ये दिल्ली के पास खांडव वन में रहते इथे, जिन्हें वहॉ अर्जुन ने परास्त किया था । इनके इतिहास का वर्णन राजतरंगिणी में भी मिलता है ।

विदिशा से लेकर मथुरा के अंचल तक का मध्यप्रदेश नागवंशियों की शक्ति का क्रैन्द्र होने से उन्होंने विदेशियों से जमका लोहा लिया । ये लोग शिवोपासक थे, जो शिवलिंगों को कधों और पगडियों में धारण किया करते थे । कुषाण साम्राज्य के अंतिम शासक वासुदेव के काल में भारशिवों (नागों) ने काशी में गंगा तट पर दस’अश्वमेध यज्ञ किए जो दशाश्वमेध घाट के रूप में स्मृति स्वरूप आज भी विद्यमान हैं । पुराणों में भारशिवों का नबनागों के नाम से वर्णन है । धर्म विषयक आचारविचार को समाज में स्थापित करने का श्रेय गुप्तो को न जाकर भारशिवों को जाता है क्योंकि इसकी शुरूआत उनके शासन काल में ही हो चुकी थी । इतिहास के विद्वानों का मत है कि पंजाब पर राज्य करने वाले नाग ‘तक’ अथवा ‘तक्षक’ शाखा के नाग थे । डा. जायसवाल मानते हैं कि पद्मावती वाले नाग भी तक्षक अथवा टाक शाखा के थे । इन नागों की शाखा कच्छप मध्यप्रदेश में थी । ऐसा प्रतीत होता है कि उत्तर-पश्चिमी भारत के गणतांत्रिक राज्यों का इन नामों को सहयोग रहा होगा । इस प्रकार पारस्परिक सार्वभौमिकता को इन्होंने स्वीकारा । राजस्थान स्थित नागों के राज्यों को परमारों ने समाप्त कर दिया था ।

चन्द्रवंश – प्रारंभिक युग में चन्द्र क्षत्रिय का पुत्र बुद्ध था, जो सोम भी कहलाता था । बुद्ध का विवाह मनु की पुत्री इला से हुआ । उनसे उत्पत्र हुए पुत्र का नाम पुरुरवा था । इसकी राजधानी प्रयाग के पास प्रतिष्ठान (पोहन गाँव) थी । पुरुरवा के वंशज चंद्रवंशी क्षत्रिय कहलाए। पुरुरवा के दो पुत्र आयु और अमावसु थे । आयु ज्येष्ठ पुत्र होने के नाते राज्य का स्वामी बना तथा अमाबसु को कान्यकुज्ज का राज्य मिला । आयु के नहुष नामक पुत्र हुआ । नहुष के दो पुत्र हुए ययाति और क्षत्रबुद्ध । ययाति इस वंश में सर्वप्रथम चक्रबर्ती सम्राट बना और उसके भाई क्षत्रबुद्ध को काशी प्रदेश का राज्य मिला । उसकी छठी पीढी में काश नामक राजा हुआ, जिसने काशी नगरी बसाई थी । इसने काशी को अपनी राजधानी बनाई ।

सम्राट ययाति के यदु, दुह्य तुर्वसु, अनु और पुरु पाँच पुत्र हुए । सम्राट ययाति ने अपने सबसे छोटे पुत्र पुरु को प्रतिष्ठानपुर का राज्य दिया, जिसके वंशज पौरव कहलाए। यदु को पश्विमी क्षेत्र केन, बेतवा और चम्बल नदियों के काटों का राज्य मिला । तुर्वसु को प्रतिष्ठानपुर का दक्षिणी-पूर्वी प्रदेश मिला, जहाँ पर तुर्वसु ने बिजय हासिल कर अधिकार जमा लिया । वहॉ पहले सूर्यवंशियों का राज्य था । दुह्य को चम्बल के उत्तर और यमुना के पश्चिम का प्रदेश मिला और अनु को गंगायमुना के पूर्व का दोआब का उत्तरी भाग, यानी अयोध्या राज्य के पश्चिम का प्रदेश मिला । ये यादव आगे चलकर बड़े प्रसिद्ध हुए। इनसे निकली हैहयवंशी शाखा काफी बलशाली साबित हुई । हैहयवंशजों ने आगे बढकर दक्षिण में अपना राज्य कायम कर लिया था । यादव वंश में अन्धक और वृब्जि बड़े प्रसिद्ध राजा हुए हैँ ।

जिनसे यादवों की दो शाखाएँ निकलीं । प्रथम शाखा अन्धकवंश में आगे चलकर उग्रसेन और कस हुए जिनका मथुरा पर शासन था । दूसरी शाखा वृश्मिवंश में कृष्ण हुए जिसने कंस को मारकर उसके पिता उग्रसेन को मथुरा का राजा बनाया । आगे चलकर वृष्णिवंश सौराष्ट्र प्रदेश स्थित द्वारिका में चला गया ।

दुह्य वश में गाधार नामक राजा हुआ, उसने बर्तमान रावलपिएडी के उत्तरपश्विम में जो राज्य कायम किया, बही गांधार देश कहलाया। अनु के वंशज आनय कहलाते हैं ।

इस वंश में उशीनर नामक राजा बडा प्रसिद्ध हुआ है । उसके वंशज समूचे पंजाब में फैले हुए थे । उशीनर का पुत्र शिवि अपने पिता से अधिक प्रतापी शासक हुआ और चक्रवर्ती सम्राट कहलाया । दक्षिणीपश्चिमी पंजाब में शिवि के नाम पर एक शिविपुर नगर था, जिसे आजकल शेरक्रोट कहा जाता है । आनयवंशिर्यों में यौधेय नाम के बड़े प्रसिद्ध क्षत्रिय हुए थे ।

कन्नौज के चंद्रवंशी राजा गाधि का पुत्र विश्वरथ था, जिसने राजपाट छोडकर तपस्या की थी । वही प्रसिद्ध ऋषि विश्वामित्र हुआ । इसी ऋषि विश्वामित्र ने गायत्री मंत्र की रचना की थी । यादवों की हैहय शाखा में कार्तबीर्यं अर्जुन बडा शक्तिशाली शासक था, जो बाद में चक्रवर्ती सम्राट बन गया था, परन्तु अन्त में परशुराम और अयोध्या के ” शासक से युद्ध में परास्त होकर मारा गया ।

पौरव वंश का एक बार पतन दो गया था । इस वंश में पैदा हुए दुष्यन्त ने बडी भारी शक्ति अर्जित कर अपने वंश को गौरवान्वित किया । इसका पुत्र भरत चक्रवर्ती सम्राट बना । जिसके नाम पर यह देश भारत कहलाया। इसके वंशज हस्ती नै ही हस्तिनापुर बसाया और उसे अपनी राजधानी बनाया । इस्री वंश के शासकों ने पांचाल राज्य की स्थापना की, जो बाद में दो भागों में बंट गया । एक उत्तरी पांचाल और दूसरा दक्षिणी पांचाला उत्तरी पांचाल की राजधानी का नाम अहिच्छत्रपुर था, जो वर्तमान में बरेली जिले में रामनगर नामक स्थान है । दक्षिण पांचाल में कान्यकुज्ज का राज्य विलीन हो गया था जिसकी राजधानी काम्पिल्य थी । पौरववंश में ही आगे चलकर भीष्म पितामह, धृतराष्ट्र, पांडु, युधिष्ठिर परीक्षित और अन्य राजा हुए।

अग्निवंश – भारत के राजकुलाँ में चार कुल चौहान, सोलंकी, परमार तथा प्रतिहार थेहं जो अपने को अग्निवंशी मानते हैँ । आधुनिक भारतीय व विदेशी विद्वान इस घारणा को मिथ्या मानते हैँ । किन्तु इनमें से दो-तीन विद्वानों को छोडकर सभी अग्निकुल की धारणा को अप्रत्यक्ष रूप से स्वीकार’ भी करते हैं, इसलिए यहाँ अग्निकुल की उत्पति के पर विचार प्रकट करना आवश्यक है । इन कुलों की मान्यता है कि अनिंकुंड से ईन कुलों के आदि पुरुष मुनि वशिष्ठ द्वारा आबूपर्वत पर उत्पत्र किए गए थे । डा. दशरथ शर्मा लिखते है कि असुरों का संहार करने के लिए वशिष्ठ ने चालुक्य चौहान परमार और प्रतिहार चार क्षत्रिय कुल उत्पन्न किए !
सोलंकियों के बारे में पूर्व सोलंकी राजा, राजराज प्रथम के समय वि. 1079 (ई 1 02 2 ) के एक ताम्रपत्र के अनुसार भगवान पुरुषोत्तम की नाभि कमल से ब्रह्मा उत्पत्र हुए, जिनसे क्रमश सोम, बुद्ध व अन्य वंशजों में विचित्रवीर्य, पांडु , अर्जुन , अभिमन्यु ,परीक्षित जन्मेजय आदि हुए। इसी वंश के राजाओं ने अयोध्या पर राज किया था । विजयादित्य ने दृक्षिश में जाकर राज्य स्थापित किया । इसी वंश में राजराज हुआ था ।

सोलंकियों के शिलालेखों तथा कश्मीरी पंडित विल्हण द्वारा वि. 1142 में रचित ‘विक्रमाङ्क चरित्र’ में चालुक्यों की उत्पत्ति ब्रहम की चुल्लू से उतपन्न वीर क्षत्रिय से होंलना लिखा गया है जो चालुक्य कहलाया । पश्विमी सोलंकी राजा विक्रमादित्य छठे के समय के शिला लेख वि. 1133 (ई 1076 ) में लिखा गया है कि चालुक्य वंश भगवान ब्रह्मा के पुत्र अत्रि के नेत्र से उत्पन्न होने वाले चन्द्रवंश के अन्तर्गत आते हैं ।

अग्निकुल के दूसरे कुल चौहानों के विषय में वि 1225 ( ई 1168 ) के पृथ्वीराज द्वितीय के समय के शिलालेख में चौहानो को चंद्रवंशी लिखा हैं । ” पृथ्वीराज
विजय’ काव्य में चौहानों को सूर्यवंशी लिखा है तथा वीसलदेव चतुर्थ के समय के अजमेर के लेख में भी चौहानों को सूर्यवंशी लिखा है ।

आबू पर्वत पर स्थित अचलेश्वर महादेव के मन्दिर में वि. 1377 (ईं. 1320 ) के देवड़ा लुभा के समय के लेख में चौहानों के बारे में लिखा है कि सूर्य और चंद्र वंश के अस्त हो जाने पर जब संसार में उत्पात शुरू हुआ तब वत्स ऋषि के ध्यान और चन्द्रमा के योग से एक पुरुष उत्पन्न हुआ ।

ग्वालियर के तंवर शासक वीरम के कृपापात्र नयनचन्द्र सूरी ने ‘ हम्मीर महाकाव्य’ की रचना वि. 1460 (ईं. 1403 ) के लगभग की जिसमें उसने लिखा है कि पुष्कर क्षेत्र में यज्ञ प्रारम्भ करते समय राक्षसों द्वारा होने वाले विध्नों की आशंका से ब्रह्मा ने सूर्य का ध्यान किया, इस पर यज्ञ के रक्षार्थ सूर्य मण्डल से उतरकर एक वीर आ पहुंचा । जब उपरोक्त यज्ञ निर्विघ्न समाप्त हो गया, तब ब्रह्मा की कृपा से वह वीर चाहमान कहलाया।

अमिकुल के तीसरे वंश प्रतिहारों के लेखों में मंडोर के शासक बउक प्रतिहार के वि. 894 (ईं. 837 )के लेख में ‘ लक्ष्मण को राय का प्रतिहार लिखा है जैसा प्रतिहार वंश का उससे सम्बन्ध दिखाया है’ इस्री प्रकार प्रतिहार ककूक के वि. 918 (ईं. 861 ) के घटियाला के लेख में भी लक्ष्मण से ही सम्बन्ध दिखाया है । कन्नौज़ के प्रतिहार सम्राट भोज की वालियर की प्रशस्ति में प्रतिहार वंश को लक्ष्मण के वंश में लिखा है । चौहान बिप्रहराज के हर्ष के बि. 1 0 3 0 (ईं. 973) के शिलालेख में भी कन्नौज़ के प्रतिहार सम्राट को रघुकुल का लिखा है । राजशेखर ने जो कन्नौज के सम्राट महेन्द्रपाल प्रथम के दरबार में था, उसने प्रतिहार सम्राट को रघुवंश मुक्रुटमणि लिखा है । इस प्रकार इन तमाम शिलालेखों तथा बालमारत से प्रतिहारों का सूर्यवंशी होना माना जाता है ।

परमारों की वशिष्ठ के द्वारा अग्विकुण्ड से उत्पन्न होने की कथा परमारों के प्राचीन से प्राचीन शिलालेखों और काव्यों में विद्यमान है । डा. दशरथ शर्मा लिखते हैँ कि हम किसी अन्य राजपूत जाति को अग्विबंशी मानें या न मानें, परमारों को अग्निवंशी मानने में हमें विशेष दुविधा नहीं हो सकती । इनका सबसे प्राचीन वर्णन मालवा के परमार शासक सिन्धुराज वि. 1052-1067 के दरबारी कविं पद्म गुप्त ने अग्निवंशी होने का तथा आबू पर वशिष्ठ के कुण्ड से उत्पत्र होने का लिखा है । इसी प्रकार परमारों के बसन्तगढ़, उदयपुर, नागपुर, अधुंणा, हाथल, देलवाड़ा, पाटनारायण, अचलेश्वर आदि के तमाम लेखों में इनकी उत्पत्ति के बारे में इसी प्रकार का वर्णन है । परमार अपने को चंद्रवंशी मानते हैँ ।

अब्दुल फजल ने भी ‘ आइनेअकबरी’ में आबू पर महाबाहु ऋषि द्वारा बौद्धों से तंग आकर इन्हें अग्नि से उत्पत्र करना लिखा है ।
परमारों के विदेशी होने के डा. भण्डारकर कोई प्रमाण नहीं दे सके, तब उन्होंने यह कहा कि हम नहीं जानते कि परमार किस वंश के हैं, परन्तु हमारी बुद्धि यही बिस्वास दिला रही है कि वे विदेश से आए हुए लोगों के ही वंशज हैं ।

ऊपर वर्णित चारों राजपूत वंश वर्तमान युग में अपने को ‘अग्विवंशी मानते हैं । ‘ इन सब वर्णनों को देखकर आधुनिक विद्वानों की यह धारणा हुई कि अग्नि वंश का किस्सा बिल्कुल कपोलकल्पित है । वाट्सन, फारबस, कैम्पबेल, देवदत्त, रामकृष्ण भण्डारकर आदि ने इस मान्यता को गलत मानते हुए यह सोच लिया कि ये तमाम वंश गूजर तथा विदेशी हैँ । इसीलिए उन्होंने अपने आपको अनि से शुद्ध होना मान लिया । जैक्सन तथा स्मिथ भी भण्डारकर की कल्पना का समर्थन करते हैँ कि राजपूतों की उत्पत्ति विदेशियों से हुईं है ।

भण्डारकर मानते हैँ कि गुर्जर हूणों के महत्त्वपूर्ण अंग थे और ये हूणों के साथ ही राजस्थान में आ बसे थे । गुर्जरों में भारतीय परम्परा के अनुसार कई विभाग हो गए थे, जैसे गुर्जर ब्राह्मण, गूजर कारीगर, गूजर वैश्य, गूजर किसान, गूजर क्षत्रिय और गूजर क्षुद्रा गूजर भारत के अन्य भागों में भी मिलते हैँ । कश्मीर में भेड़ चराने वाले गूजर अद्यावधि हैँ । जनरल कनिंघम गूजरों को यूची अर्थात् कुशानवंशी होना मानता है । बिश्वास है कि ईस्वी पाँचवी ब छठी सदी में उन्होंने भारत में प्रवेश किया ।

गौरीशंकर हीराचन्द ओझा और चिन्तामणि विनायक वैद्य इन वंशों को न विदेशी मानते हैं और न ही गूजर, परन्तु अग्नि वंश की मान्यता को कपोलकल्पित मानते हैँ । डा. धीरेन्द्रचन्द गाँगुली की धारणा है कि परमार न विदेशी हैँ और न गूजर, परन्तु ये दक्षिण भारतीय हैं । इनकी विचारधारा भी आबू पर अग्नि वंशीयों की उत्पत्ति के पक्ष में नहीं है ।

डा. दशरथ शर्मा भी अग्निकुल की मान्यता को मिथ्या मानते हैँ तथा अपनी पुस्तक “अर्ली चौहान डाइनैस्टीज़’ में लिखते हैँ कि इस धारणा की उत्पत्ति पृथ्वीराज रासो से हुईं है और इस प्रकार अग्निकुल की मान्यता 16वीं सदी से आरम्भ हुईं है ।

परन्तु इसके विपरीत ई. 1560 में उनके द्वारा सम्पादित ‘ पंवार वंश दर्पण’ में वे लिखते हैं कि परमारों के वशिष्ठ के अग्विकुण्ड से उत्पन्न होने की कथा परमारों के प्राचीन से प्राचीन शिलालेखों में और काव्यों में विद्यमान हैँ । इसलिए हम किसी अन्य राजपूत जाति को अग्नि वंशी मानें या न मानें, परमारों को अग्नि वंशी मानने में हमें विशेष दुविधा नहीं हो सकती । उन्होंने अपने लेख ‘ परमारों की उत्पत्ति’ में माना है कि अम्मिवंशिर्यो की उत्पत्ति की कथा दसवी शताब्दी से पूर्व नहीं पहुंचती है ।

इस आधार पर इनकी तथा अन्य विद्वानों की यह मान्यता कि अग्नि वंशीय की कल्पना ‘ पृथ्वीराज रासो’ की है तथा यह 16वीं सदी से शुरू होती है, बिल्कुल गलत सिद्ध हो जाती है तथा हमें यह मानने को बाध्य होना पड़ता है कि यह मान्यता दसवीं शताब्दी में तो थी ही, जिसके अनेक वर्णन ऊपर दिये जा चुके हैँ तथा उसी मान्यता को पृथ्वीराज रासो में उद्धृत किया गया है, उसमें कोई कपोलकल्पित-मनगढ़न्त बात नहीं बताईं गई है ।

यह सब देखने के बाद यह विचारणीय विषय है कि क्या अम्पिकुल की धारणा सिर्फ कपोलकल्पना है या इसके पीछे कोई ऐतिहासिक घटना है । विद्वानों के द्वारा इसे गलत मानने कीं विचारधारा ऊपर दी जा चुकीं है । आधुनिक विद्वानों ने इस मान्यता का जन्म 16र्वी सदी का माना है । परमारों के बारे में पद्मगुप्त ने ईं. 99 5 के करीब के वर्णन में इनकी उत्पत्ति आबू पर्वत पर वशिष्ठ के अग्निकुण्ड से मानी है, जिसका वर्णन पहले दिया जा चुका है । यही वर्णन विस्तार से या संक्षिप्त रूप में बाद के भी तमाम शिलालेखों में जो कि ग्यारहवीं, बारहवीं, तेरहवीं सदियों के हैं, उनमें भी आता रहा है । पद्मगुप्त की मान्यता यह नहीं हो सकती कि वह उसी समय रची गई हो, वह मान्यता कमसेकम तीन सौ-चार सो वर्ष पुरानी तो होगी ही । “

चालुक्यों के वर्णन में भी ई. 1 0 8 5 के करीब यह मान्यता प्रचलन में आ चुकी थी कि वे ब्रह्मा की चुलु से उत्पन्न हुए । यह वर्णन भी यही संकेत कर रहा है कि उस समय में चालुक्यों का देवशक्ति द्वारा उत्पन्न होना माना जाता था । इस प्रकार यह मान्यता भी छठी व सातवीं सदी ईस्वी तक पहुंच जाती है ।

इस प्रकार इन तमाम सास्यों द्वारा किसी न किसी रूप में हन वंशों को बिशेष शक्तियों द्वारा उत्पन्न करने की मान्यता की पुष्टि 1 0वीं सदी तक तो लिखित प्रमाणों से ही पहुंच जाती है । जिसे डा. दशरथ शर्मा ने स्वीकारा है । इस पर पूर्व पृष्ठों में बिचार किया जा चुका है । अत: निष्कर्ष यह है कि इन विद्वानों की अम्पिचंशी होने की मान्यता 16वीं सदी से प्रारम्भ होती है तथा इसे प्रारम्भ करने वाला ग्रंथ ‘ पृथ्वीराज रासो’ है । इन प्रमाणों को देखने के बाद यह धारणा’ बिल्कुल निराधार तथा गलत सिद्ध हो जाती है ।

अब दूसरा प्रश्न यह सामने आता है कि भण्डारकर, वाट्सन, फारबस, केम्पबेल, जैक्सन स्मिथ आदि विद्वान अनिंबंशिर्यो को गुर्जर मानते हैं और इन्हें पाँचवी-छठी सदी में झुगों के साथ बाहर से आए हुए मानते हैँ । ये वास्तव में गुर्जर हैं या नहीं और क्या गुर्जर विदेशी हैं? यह अलग से विषय है । परन्तु यहॉ यह देखने का प्रश्न है कि इन विद्वानों ने यह माना है कि ये गुर्जर थे तथा विदेशों से आए थे इसलिए इनको हिन्दू समाज में शामिल करने के लिए इनकी अग्नि से शुद्धि की गई ।

अब यह प्रश्न सामने आता है कि ऐसी कोई घटना अवश्य घटी, जिसके द्वारा कुछ वंशों को शुद्ध किया गया । इसका तात्पर्य यह हुआ कि अग्नि वंश की मान्यता को मिथ्या बताने वाले विद्वान ही दूसरे शब्दों में इन वंशों को अग्नि द्वारा शुद्ध करने की मान्यता को स्वीकार करते हैँ । इस प्रकार अपनी ही एक दलील को खण्डित करते हुए अप्रत्यक्ष रूप में अनिंवंश कीं प्रचलित परम्परा को किसी रूप में स्वीकार भी करते हैं ।

डा. दशरथ शर्मा जो ‘अर्ली चौहान डाइनैस्टीज’ में इस विचारधारा को मिथ्या कहते हैँ, वहीँ उसका खंडन करके वे ‘पंवार वंश दर्पण’ में लिखते हैं कि अम्मिवंश की मान्यता निराधार नहीं । इस प्रकार सिवाय ओझा, वैद्य और मंगोली के, शेष विद्वान अग्विवंश की मान्यता को प्रत्यक्ष नहीं तो परोक्ष रूप में मान रहे हैं ।

अब विचारणीय प्रश्न यह है कि ऊपर से सारे वर्णनों को देखने के बाद यह दलील उठती है कि फिर यह अम्मिवंश है क्या? इस प्रश्न में जाने के लिए हमें भारत के और प्राचीन इतिहास की खोज करनी होगी । भारत में वैदिक धर्म ब्राह्मणों के नियन्त्रण में आ गया था और उसके विरुद्ध गौतम बुद्ध ने बगावत करके अपना नया घर्म प्रारम्भ किया था ।

शनै: शनै: सारा ही क्षत्रिय वर्ण वैदिक धर्म को छोडकर बोद्ध धर्म को अंगीकार करता चला गया । भारत के चारों कोनों में बोद्ध-धर्म का प्रचार हो गया था । क्षत्रिय राजा बोद्ध हो गए थे । उन्हीं के साथ वैश्य समाज ने भी बौद्ध-धर्म को अंगीकार कर लिया । क्षत्रिर्यो ने बौद्ध-धर्म में चले जाने के कारण उनकी वैदिक क्रियाएँ व परम्पराएँ समाप्त हो गई । इस प्रकार वैदिक क्षत्रिय जो सूर्यवंशी व चन्द्रबंशी कहलाते थे, अब उन परम्पराओं के समाप्त हो जाने से सूर्यवंशी व चन्द्रबंशी कहलाने से डर गए। क्योंकि ये मान्यताएँ तो वेदिक धर्म की थीं, जिसे वे अब छोड चुके थे तथा बोद्ध-धर्म स्वीकार कर चुके थे, जिसमें ऐसी कोई मान्यताएँ नहीं थीं । वैदिक परम्पराएँ नष्ट प्राय: हो गई थींओर इस से अप्रसत्र होकर ब्राह्मणों ने पुराणों तक में भी यह लिख दिया कि कलियुग में ब्राह्मण और शूट्ठ ही रह जाएंगे । कलियुग के राजा शूट्ठ होंगे । ब्राह्मणों के अत्याचारों से दुखी होकर बौद्ध-धर्म ग्रहण करने वाले क्षत्रिय शासकों को भी उन्होंने शूद्र की संज्ञा दे डाली । उन्होंने दुराग्रह से यहॉ तक लिख दिया कि कलियुग में क्षत्रिय और वैश्यों का लोप हो जाएगा । इस युग में एक ब्राह्मण वर्ग हीं ऐसा था जो बोद्धधर्मावलम्बी नहीं बना था ।

उस युग में समाज की रक्षा तथा शासनसंचालन का कार्य क्षत्रियों का था, किन्तु वे बौद्ध हो चुके थे । इसलिए वैदिक धर्म की रक्षा करने का प्रश्न ब्राह्मणों के सामने बड़ा जटिल हो गया था । तब उन्होंने किसी रूप में क्षत्रियों को वापस वैदिक धर्म में लाने के प्रयास शुरू किए। उस युग के ब्राह्मणों को मुखिया कहिए या त्रदृषि कहिए उनके अथक प्रयर्लो से उन्होंने प्रारम्भ में चार क्षत्रिय कुलों को बौद्ध-धर्म से वापस वैदिक धर्म में दीक्षित किया और आबू पर्वत पर यज्ञ करके बोद्ध-धर्म से वैदिक धर्म में उनका समावेश किया गया । यहीँ अनिंकुल का स्वरूप है । वे प्राचीन सूर्यवंशी या चंद्रवंशी क्षत्रिय ही थे । इसलिए बाद के तीन वंशों के शिलालेखों में वे अपने प्राचीन वंशों का ही हवाला देते रहे, परन्तु परमार वंश ने प्राचीन वंश न लिखकर ‘अग्नि वंश लिखता शुरू कर दिया ।

छत्रपुर की प्राचीन वंशावली में भी पंवारों के आदि पुरुष को बौद्धों के उत्पात से तंग आकर ऋषियों द्वारा उत्पत्र करना माना है । वंशभास्कर में भी बौद्धों के उत्पात से अग्विकुल वालों को उत्पन्न करना माना है ।
अबुलफजल के समय तक किन्हीं प्राचीन ग्रन्थो से या प्राचीन मान्यताओं से यह विदित ही था कि ये चारों वंश बौद्धमत से वापस वैदिक धर्म में आए थे । इसी मान्यता का उल्लेख ‘अबुलफजल ने ‘आइने-अकबरी’ में किया है । अबुलफ़ज़ल ने इनको यज्ञ द्वारा उत्पत्र करने का समय वी. 818 दिया है, हो सकता है कि उसने यह भी उस समय की कोई मान्यता के आधार पर ही दिया हो । कुमारिल भट्ट ने दिं. 756 ई. 7 0 0 में बडी संख़या में बौद्धों को वापस वैदिक धर्म में लाने का कार्य प्रारम्भ किया था, जिसे आदि शंकराचार्य ने आगे चलकर फूर्ग किया । इसलिए इन चार क्षत्रिय वंशों को वेदिक दीक्षा वापस देने का कार्य कुमारिल भट्ट सें कुछ पूर्व होना चाहिए।

आबू पर्वत पर यज्ञ करके चार क्षत्रिय कुलों को वापस वैदिक धर्म में दीक्षा देने का यह एक ऐतिहासिक कार्यक्रम था, जो करीब छठी या सातवीं सदी में हुआ । यह कोई कपोलकल्पना नहीँ थी, न कोईं मिथ्या बात थी, अपितु वैदिक धर्म को पुन: सशक्त करने का प्रथम कदम था, जिसकी याद के रूप में बाद में ये वंश अपने को अग्निवंशी कहने लगे ।

क्षत्रिय व वैश्यों के बौद्ध-धर्म ग्रहण करने के बाद वैदिक संस्कार तो लुप्त हो गए थे । यहाँ तक कि वे शनै: शनै: अपने गोत्र तक भी भूल चुके थे । जब वे वापस वैदिक धर्म में आए, तब क्षत्रियों तथा वैश्यों द्वारा नए सिरे से पुरोहित बनाए गए, उन्हीं के गोत्र, उनके यजमानों के भी गोत्र मान लिए गए । इसलिए समयसमय पर नए स्थान पर जाने पर जब पुरोहित बदले तो उनके साथ अनेक बार गोत्र भी बदलते चले गए। वैद्य और ओझा की भी यही मान्यता है ।

जब ये चार वंश बौद्धधर्म से. वैदिक-धर्म में परिवर्तित हुए, तब भी बहुमत क्षत्रिय वंशों को बोद्धधर्म में ही था । इसलिए इन्हें बौद्ध धर्मावलम्बी क्षत्रियों से पृथक सिद्ध करने के लिए क्षत्रियों की बजाय उन्हें राजपुत्र कहकर सम्बोधित करना शुरू किया गया तथा इन्हें उनसे श्रेष्ठ सिद्ध करने कीं कोशिश भी की गई । वैसे यह राजन्य शब्द काफी पहले से ही क्षत्रियों के लिए प्रयोग में आता रहा है, जैसे ऋग्वेद में दिया है ‘ब्राह्मणोस्य मुखमाप्तीद बाहू राजन्य कृत: ‘ यहाँ ब्राह्मण के बाद क्षत्रिय शब्द का प्रयोग नहीं करके उसके पर्यायवाची शब्द ‘राजन्य’ का प्रयोग किया गया है । इसी प्रकार अन्य अनेक ग्रन्धों में भी राजन्य शब्द का प्रयोग हुआ है ।

अब इनके वैदिक धर्म में वापस आ जाने पर ब्राह्मणों ने इन वंशों के लिए क्षत्रिय के स्थान पर राजन्य शब्द का ही प्रयोग करना प्रारम्भ किया, ताकि वे इन्हें उन क्षत्रियों से जो अब भी बोद्ध-धर्मी थे, उनसे भिन्न दिखा सकें । जब संस्कृत से देश में प्राकृत भाषा का प्रचार प्रारम्भ हुआ, तब इस राज़न्य शब्द के ही एक अन्य पर्याय ‘राजपुत्र’ का अपभंश रूप ‘राजपूत’ बन गया ।

वैदिककाल में वेद के अध्ययन का अधिकार ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य इन तीनों वर्णो का ही था, परन्तु अशोक के बाद ईं. पू. 250 (वि.पू. 193) से लगाकर पतज्जलि काल ईं. पू. 150 ( वि. पू. 93) के बीच क्षत्रिय तथा वैश्य बौद्धधर्म को अंगीकार कर चुके थे, इसलिए पतजलि ने इन्हें वैदिक मर्यादा के बाहर मानते हुए लिखा है ‘ब्राह्यणेन वेदाध्येय’ और इस प्रकार उसने क्षत्रियों तथा वैश्यों को वैद पढ़ने का अधिकारी नहीं माना, अत: पत्तज्जलि ने वेर्दो के अध्ययन के अधिकारी उस युग में सिर्फ ब्राह्मणों को ही माना । ईं. 600 के लगभग यह हुआ । इस समय तक क्षत्रियों के केवल’ चार कुल ही वापस हिन्दू धर्म में दीक्षित हुए थे । शेष बोद्धधर्मानुयायी बने रहे । क्षत्रियों के साथ ही वैश्य भी शुद्ध होकर वापस वैदिक धर्म में आए थे, इसलिए वैश्यों में भी कुछ अमिवंशी हैँ । उस समय तक भी स्थिति वैसी ही बनी हुईं थी । इस समय तथा कुमारिल ( ई. 7 0 0 ) के समय में क्षत्रिय कुल वापस वैदिक धर्म में दीक्षित हुए तथा नागोजी भट्ट (ई. 1000) के समय में यह माना जाने लगा कि ‘वैदाध्ययन’ क्षत्रियों का काम्य कर्म है । इससे यह सिद्ध होता है कि क्षत्रियों का प्रथम दल, जिसमें अमिंवंशी कहलाने वाले चार वंश थे, वे ईस्वी 6 00 तथा 7 00 के मध्य किसी समय वापस वैदिक धर्म में दीक्षित हुए हैँ ।

36 कुल-प्रारम्भ में चार क्षत्रिय कुलों को बोद्धधर्म से वैदिक धर्म में लाना एक महान सफलता थी, परन्तु देश की दृष्टि से यह काफी नहीँ था । अभी तक अधिकांश क्षत्रिय वर्ग बोद्धधर्म में ही थे, इसलिए इस सफलता के बाद ऋषि इस कार्य में जुट गए कि शेष क्षत्रियों और वैश्यों को वापस बोद्ध-धर्म से वैदिक धर्म में लाया जाए। इस दिशा में सबसे महान कार्य आदि शंकराचार्य का था, जिसने हिन्दुस्तान से करीबकरीब बौद्धधर्म को समाप्त ही कर दिया । अब क्षत्रिय बर्ग के वैदिक धर्म में वापस आने पर ऋषियों ने चार अम्बिवंश तथा बत्तीस और प्रमुख वंशों को मिलाकर क्षत्रिय समाज में छत्तीस कुलों की एक नईं परम्परा स्थापित की जो काफी बाद तक चलती रही थी ।

प्रारम्भिक 36 कुलों की सूचियों में मौर्यवंश तथा नागवंश का स्थान नहीं होना यही सिद्ध करता हे कि प्रारम्भ में ये वैदिक धर्म में नहीं आए तथा बोद्ध बने रहे । इसलिए उन 36 कुलों में इनको स्थान नहीं दिया गया । वि. 870 ( ई. 813) के शेरगढ़ (कोषबर्धन) कोटा के शिलालेख में उस समय वहॉ के नागवंशी शासक को बोद्धधर्मावलम्बी लिखा है । अत: सिद्ध होता है कि ईस्वी सदी तक नागवंशी बौद्ध-धर्म में ही थे ।

समयसमय पर इस सूची के वंशों का हेरफेर होता रहा । जिस स्थान पर और जिसके द्वारा यह सूची लिखी गई, उसने अपनी मान्यता के अनुसार 36 वंश लिख दिए, परन्तु संख़या 3 6 की ही चलती रही । जेसे मेवाड में देश की रक्षा में जिनजिन घरानों ने महान बलिदान दिए थे । शान्सि स्थापित होने पर महाराणा अमरसिंह प्रथम ने उन प्रमुख घरानों की सेवा को देखते हुए प्रथम सेवा में 16 के उमराव स्थापित किए। बाद में वे समयसमय पर घटतेबढते रहे, परन्तु वे 16 के उमराव ही कहलाते थे । इसी तरह यह 36 कुलों की मान्यता भी घटतीडेबढ़ती रही है, परन्तु हमेशा ये 36 कुल ही कहलाए हैं। पैंतीस या सैंतीस नहीं हुए ।

36 कुलों की कईं सूचियाँ प्राप्त होती हैँ, जो अवलोकनार्थ यहां देते हैँ, परन्तु उसका तात्पर्य यह नहीं मानना चाहिए कि प्रारम्भ के ये ही 36 कुल थे, इनमें कमी-बेशी होती रही है, परन्तु गणना 36 ही सर्वदा रही है ।

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