भारत के 12 उद्योगपति

भारत के Top 12 व्यापारी की ऐतिहासिक हक़ीक़त

आज हम भारत के उन महान और स्वप्न द्रष्टा उद्योगपतियों के बारे में बात करने वाले है जिन्होंने अपनी महेनत , सुजबुज , और साहसवृत्ति से उद्योग जगत में बहुत कम समय मे प्रगति कर आंतरराष्ट्रीय व्यापार में नाम कमाए हैं । बहुत छोटे पैमाने पर शरू किया हुआ व्यापार आगे जाकर कितना विराट स्वरूप ले सकता है उसका अच्छा उदाहरण धीरूभाई अंबानी है । चलिये आज भारत के और 12 उद्योगपतियों के बारे में जानते है ।

01 भारत की पहली शिपिंग कंपनी

Empress of india shoping company

भारत का वर्तमान शिपिंग बिजनेश देखे तो व्यापारी जहाजो से हर साल लाखो टन सामान का व्यापार किया जाता हैं । लेकिन बीसवीं सदी की शरुआत में भारतीय लोगों की एक भी अपनी शिपिंग कंपनी नही थी । इस कारोबार पर अंग्रेजो की मोनोपोली थी । भारतीय लोगों को उसमे घुसने भी नही देते थे । एक देशप्रेमी ( मूल रूप से गुजरात के वांकानेर के ) उद्योगपति ने अग्रेजो के सामने अपना शिपिंग बिजनेस शरू करने का निश्चय किया । ग्वालियर के महाराजा ने महाराजा ने जो बेचने के लिए निकाली Empresa of India नाम की 5,909 टन की स्टीमर खरीद ली ।

उस उद्योगपति का नाम था वालचंद हीराचंद जो वांकानेर के निवासी निहालचंद भीमजी दोशी के प्रपौत्र थे । नरोत्तम मोरारजी , क़िलाचंद देवचंद और लालुभाई शामलदास इन तीनो के सहयोग में वालचंद हीराचंद ने सन 1919 में सिंधिया स्टीम नेविगेशन लिमिटेड नाम की शिपिंग की पहला स्वदेशी कारोबार शरू किया । सिंधिया नाम इसलिये की खरीदी हुई पहली स्टीमर Empress of India के असल मालिक ग्वालियर के महाराजा यानी कोंग्रेसी सभ्य माधवराय सिंधिया के दादा थे । कंपनी ने वह स्टीमर S S Loyalty ऐसा नाम दिया । स्वदेशी भावना के साथ शरू की हुई सिंधिया नेविगेशन का आर्थिक पांसा हालांकि हमेंशा कमजोर ही रहा । सन 1980 के दशक में उन्होंने अपना पूरा कारोबार समेट लिया । अपने सब जहाजो को भी बेच दिया था ।

02 भारत की प्रथम एयरलाइंस

भारत की पहली एयरलाइंस की स्थापना जिस उद्योगपति ने की उनका जन्म सन 1904 में फ्रांस में हुआ था । इतना ही नही जनकी माता भी फ्रेंच थी । और तो और उन्होंने फ्रेंच सेना के तालिमार्थी सैनिक भी थे । तब तो अभी विमान युग की शरुआत थी । साहसिक पायलट खिलौने जैसे प्लेन में बैठकर नए नए कीर्तिमान बनाते थे । जिसके लिए वे सब खतरनाक प्रावस करते थे । एक फ्रेंच पायलट लुई बलेरिओ थे । जुलाई 25 , 1909 के दिन खुद के बनाये विमान में बैठकर इंग्लिश खाड़ी को पार करने का रिकॉर्ड बनाया । हमारे इस भावि उद्योगपति ने लुई ब्लेरियो के बेटे को अपना दोस्त बनाया ! उसके साथ फ्लाइंग भी किया । भारत मे भी विमान युग लाने के सपने देखने वाले इसी बंदे ने भारत की प्रथम एयरलाइंस की स्थापना की !

जे आर डी ताता

उनका नाम था जे आर डी ताता ! और उनकी एयरलाइंस का नाम ताता एयरलाइंस ! जिसकी स्थापना उन्होंने सन 1932 में की । दूसरे साल उनके विमानो ने सब मिलकर 2,56,000 किलोमीटर का सफर तय किया और 10,170 किलोग्राम पोस्ट के थैले उनके मंजिल तक पहुंचाए ! सन 1946 में ताता एयरलाइंस का नाम बदलकर एर इंडिया कर दिया गया । जे आर डी ताता के कुशल मैनेजमेंट के नीचे एर इंडिया का कारोबार ठीक चल रहा था । फिर भी प्रायवेट उद्योग के प्रति चीड़ वाले ‘ ‘ पंडित ‘ जवाहरलाल नेहरू ने सन 1953 में उसका राष्ट्रीयकरण कर दिया ।

03 T V S

टी वी सुंदरम नाम के तामील उद्योगपति ने धंधे की शरुआत बहुत छोटे पैमाने पर की थी । प्रथम विश्वयुद्ध पहले सन 1911 में मद्रास प्रेसिडेंसी के मदुरई शहर में वे प्रायवेट बस सर्विस चलाते थे । विश्वयुद्ध के बाद उन्होंने साइड बिजनेस में आयाती मोटरकार बेचनी शरू कर दी । इस नए धन्धे में मोटर की सर्विसिंग और रिपेरिंग आवश्यक था । इसलिए टी वी सुंदरम एन्ड सन्स के नाम से जानी जाती कंपनी ने ग्राहकों को संतुष्ट रखने के लिए सर्विस सेंटर खोले ! मोटाराइज़्ड वाहनों के मिकेनिकल विषय का जो अनुभव मिला उसके आधार पर खुद वे उत्पादन की ओर मुड़े !

ति वी एस

TVS नाम की आज की मशहूर कंपनी वही है । उनका मुख्य बिजनेस आज मोटर सायकिल बनाना है । भारत का 50 CC का पहला मोपेड सन 1980 में उन्होंने बाजार में उतारा था तो 100 cc की पहली इंडो जापान मोटर साइकिल भी उन्ही के कारखाने में बनी ! देश विदेश में आज हजारो से ज्यादा स्टाफ काम कर रहा है । आज उनकी कंपनी टेक्सटाइल, फाइनांस , ट्रांसपोर्ट , इलेक्ट्रॉनिक्स , ऑटोमोबाइल पार्ट्स जैसे धंधे में बिजनेस करने वाली 29 कंपनियों का बना है । ब्रिटन , सिंगापुर , मलेशिया , ईरान और इंडोनेशिया में TVS मोटर सायकिल आयात करने वाले मुख्य देश है ।

04 कैडिला

रमण भाई पटेल

गुजरात के साहसिक उद्योगपति रमणभाई पटेल ने सन 1952 में अहमदाबाद में कैडिला लेबोरेटरीज नाम की कंपनी की स्थापना की थी । वैसे तो रमणभाई अहमदाबाद की एल एम कॉलेज ऑफ फार्मसी में लेक्चरर थे । सेलेरी वाली नोकरी छोड़कर उन्होंने साहस करके ये कंपनी बनाई । इस साहस उन्होंने स्कूल जीवन के दौरान उनके सहाध्यायी रह चुके इन्द्रवदन मोदी के साथ मिलकर किया । मोदी ने कैडिला ऑफ केमिस्ट का चार्ज संभाला ! कंपनी की सर्वप्रथम प्रोडक्ट एनॉमिया के इलाज के लिए खास एंजाइम्स वाली विटामिन बी 12 की केप्स्यूल थी । कैडिला का नाम तक डॉक्टरों के पास नही पहुंचा था । इसलिए केप्स्यूल का प्रिस्क्रिप्शन लिखने के लिए कोई तैयार नही था । रमणभाई पटेल हर दिन 20 – 25 डॉक्टर्स को मिलकर उनको इस केप्स्यूल का बायोलॉजिकल कार्य समजाते ! और उन्होंने इसी कार्य से कंपनी को नुकशान से बचाइ ! सन 1955 में कैडिला का विभाजन हुआ और पटेल फेमिली के हिस्से में आया जो आया उससे उन्होंने विदेश में भी अपना कारोबार शरू किया और अपनी कंपनी को मल्टीनेशनल बना दिया ।

05 Jet Airways

जेट एयरवेज

स्वप्न द्रष्टा नरसिंह राव की उदार आर्थिक नीति ने नए नए उद्योगपतियो को जन्म दिया । जिसमें नरेश गोयल भी थी। साइकिल लेने के पैसे भी पिता के पास नही थे । इसलिए बचपन मे स्कूल चलके जाते थे। बाद में महीने के 300 ₹ की नौकरी तक की । उसके बाद उन्होंने उदार आर्थिक नीति का फायदा उठाकर लेबनान , फिलिपींज , जॉर्डन जैसे देशों की एयरलाइंस में भारत में स्थानिक मैनेजर की ड्यूटी करते थे । बाद में उन्होंने खुद की एयरलाइंस की स्थापना की ! जिसका नाम है जेट एयरवेज ! बाद में उन्होंने 2250 करोड़ ₹ में सहारा नाम की एयरलाइंस भी खरीद ली । विमानी प्रवास के धन्धे में भारतीय मार्किट में आज भी उनका बड़ा हिस्सा है ।

06 Reymond

रेमंड

इराक पर तुर्की के ओटोमन साम्रज्य ने हकूमत स्थापित कर दी । बाद में 19 वी सदी के आरम्भ में तुर्क मुस्लिमो ने बगदाद के यहूदियो पर अत्याचार करने लगे । इसलिये सन 1833 में कुछ यहूदी भारत आ गए । एक वसाहति यहूदी डेविड सासुन था ! जो हमेंशा बगदादी सौदागर जैसे लीबाश में रहता था । मुंबई में सासुन फेमिली ने कपड़े की मिल स्थापित की । मुंबई से 40 किलोमीटर दूर थाने में एक पारसी की ऊनी कंबल , टोपी व बनियान के लिए इस्तेमाल किया जाता ऊन का उत्पादन करने वाली मिल को खरीद लिया। उसमे ये फेमिलि ऊन का खुदहरा कपड़ा बनाती थी । लेकिन डेविड सासुन अपने सीमित शेर होल्डिंग के कारण ये काम लंबे समय तक नही कर पाया !

सन 1944 में कानपुर के कैलाशपत सिंघानिया उस मिल के नए मालिक बने ! तीसरी पीढ़ी पर विजयपत सिंधनिया ने उस मिल का नाम बदलकर रेमंड कर दिया । आज ये कंपनी रेमंड ब्रांड का सुपर क्वॉलिटी का शूटिंग कपड़ा बनाती है ।

07 भारती ग्रुप (AIRTEL )

भारती ग्रुप के सुनील मित्तल और एयरटेल

उदार आर्थिक नीति में जिन्होंने अपनी महेनत से कंपनी खड़ी की वह सुनील मित्तल आज भारती ग्रुप के कर्ताहर्ता
है !

वैसे सुनील मित्तल सन 1970 के दशक में पंजाब के लुधियाना में साइकिल के पार्ट्स की दुकान चलाते थे । दुकान में ज्यादा कमाई नही थी । इसलिए सन 1981 में बे दिल्ही गए और जापान के भारी कीमत वाले जनरेटर्स नही खरीद पाते थे । मोबाइल टेलीफोन का नया क्षेत्र खुला तब उसमे साहस किया और फोन कॉल के चार्ज लगातार बढ़ा रही विदेशी कंपनियो को हरा दी । 20,000 ₹ की मुड़ी से साइकिल की दुकान शरू करने वाले सुनील मित्तल आज हजारों करोड़ो की संपत्ति के मालिक है ।

08 Bajaj

बजाज

उन्नीसवीं सदी के अंत मे जयपुर के व्यापारी शेठ बछराज ने उनके जैसे दूसरे अनेक मारवाड़ीयो की तरह राजस्थान छोड़ा क्योंकि धंधे के लिए कोई मौका वहां नही था । बाद में शेठ बछराज महारष्ट्र के वर्धा में बस गए । कमीशन के लिए खरीद बिक्री का धंधा शरू किया । सन 1894 में बछराज और उनकी पत्नी सदीबाई ने कनीराम नाम के दूसरे मारवाड़ी के पांच साल के बेटे को गोद लिया । उसका नाम जमनालाल बजाज को दत्तक लिए थे । फरवरी 11 , 1942 के दिन जमनालाल के अवसान के बाद तीसरे साल उनके वारिसों ने बछराज ट्रेंडिंग कॉर्पोरेशन के नाम से टू व्हीलर और थ्री व्हीलर वाहन मंगाने शरू किये और सन 1960 में 22 साल के राहुल बजाज ने वेस्पा स्कूटर के उत्पादन के लिए इटली की पियाजियो कंपनी के साथ टेक्नोलॉजी ट्रांसफर का सौदा करके बछराज ट्रेडिंग कंपनी को बजाज ऑटो में बदल दी ।

09 Infosys

इंफोसिस

इंफोसिस के स्थापक नारायण मूर्ति ने सन 1969 में कानपुर से IIT होने के बाद उनको एर इंडिया समेत चार बड़ी बड़ी कंपनी से बड़े सेलेरी के पैकेज ऑफर हुए थे। लेकिन उनके लिए सेलेरी से ज्यादा सेलेरी देने वाली संस्था ज्यादा महत्वपूर्ण थी । इसलिए उन्होंने ये सब बड़ी बड़ी ऑफ़रो को स्वीकार न करके ऐसी संस्था से जुड़े जहां उनको महीने के सिर्फ़ 8000 ₹ दिए जाते थे । ये संस्था थी अहमदाबाद की इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट IIM ! इस संस्था के वे चीफ सिस्टम प्रोग्राम बने ! ये पद पर वे कभी कभी दिन के 20 घण्टे काम करते थे । कुछ साल तक सेवा देने के बाद वे पुणे की पटनी कम्प्यूटर्स सिस्टम में जुड़े और आखिर में उन्होंने सन 1981 में अपनी पत्नी के गहने गिरवी रखकर इंफोसिस नाम की अपनी खुद की कम्पनी बनाई। जो आज भारत की बड़ी आईटी कंपनी है ।

10 सुजलॉन

सुजलॉन

तुलसी तंत राजकोट से बी कॉम की पढ़ाई पूरी करके की मिकेनिकल इंजीनियरिंग का डिप्लोमा किया था। उन्होंने सुजलॉन कंपनी बनाकर आज ये भारत के धनिक व्यक्ति गिने जाते है । उनकी ये सुजलॉन कंपनी पवनचक्की बनाने का काम करते है । इस उद्योग में उनका बड़ा नाम है । पवनचक्की बनाने के काम को वे अपना 17 वा काम कहते है । क्योंकि इससे पहले उन्होंने 16 बिजनेस में हाथ आजमाया था लेकिन सफल नही हो पाए थे । महाराष्ट्र के सतारा जिले में तुलसी तंत ने 250 मेगावॉट का विंड फार्म बनाया ! और उसके बाद सुजलॉन के नाम से पवनचक्की बनाने की शरुआत की । आज तो कई पवनचक्की बनाने वाली विदेशी कंपनियो को खरीद चुके तुलसी तंत साल के 200 दिन एयरलाइंस में ही उड़ते रहते है। तुलसी भाई विमान को अपना मुख्य रहने का स्थान कहते है ।

11 Air Deccan

अगर खर्च कम कर दे तो कमाई अच्छी होगी ! ये ख्याल के साथ कैप्टन जी आर गोपीनाथ ने सन 2003 में ऐर डेक्कन नाम की एयरलाइंस की स्थापना की । खर्च कम करने के अनेक नुस्खे उन्होंने अपनाए थे । वे भारतीय सेना में से रिटायर्ड अफसर है । और बहुत कम समय मे यानी कि लगभग चार साल में उन्होंने अपनी एयरलाइंस में 42 जितने विमान को खड़ा कर दिया है।

कैप्टन गोपीनाथ और डेक्कन एयरवेज

कुछ मिनट या घण्टे के लिए विमान में बैठते लोगो को नास्ता बंद कर दे खाने पीने का सामान न ले जाने पर विमान का ईंधन खर्च कम होता है , हर शहर में टिकिट बुक करने की ऑफिस का खर्च ना करे तो उतना खर्च कम होता है , विमान को लंबे समय तक एयरपोर्ट पर न रखकर मुसाफिरों के साथ उसे तुरंत आकाश में चढ़ा दी तो विमान पार्किंग का बिल कम आएगा , कलरफुल प्रिंट के बदले टिकट कम्प्यूटर प्रिंट से काम चला ले तो उतना खर्च भी कम होता हैं….इस तरह के अनेक आइडिया लगाकर हवाई सफर सस्ता बनाकर सामान्य लोगों को भी हवाई सफर करने के लिए रास्ता बनाने वाले जे आर गोपीचंद ने साबित कर दिया कि अब जो महेनत करेगा वही आगे बढ़ेगा !

12 पेंटालून

राजस्थान के नागौर जिले के निसबी गांव में रहते बंसीलाल बियानी को मालूम हुआ कि जो मारवाड़ी राजस्थान छोड़कर बाहर गए है वे अच्छा कमा रहे है तो खुद भी कमा सकते है ऐसी आस में वे भी मुंबई की ओर निकल पड़े ।

सन 1935 में राजस्थान से लेकर उन्होंने विठ्ठलवाडी एरिया में धोती और साड़ी की दुकान खोली ! दुकान थोड़ी चल पड़ी तो परिवार को भी बुला लिया और बोरीवली में घर किराए पर लिया।

पेंटालून्स

सालो बाद बंसीलाल बियानी के पौत्र किशोर बियानी को नया धंधा सुजा ! जो रेडीमेड कपड़े का था । उसमे भी पेंट का था । किशोर बियानी हर बुधवार को सौराष्ट्र मेल पकड़कर अहमदाबाद पहुंचते । वहां अरविंद कंपनी का डेनिम कपड़ा खरीदते । उसके बाद मुंबई के जदिक तारापुर के उनके वर्कशॉप में पेंट बनते । रेडीमेड पेंट बेचने में जब दिक्कत आने लगी तब फ्रेंचाईजी के जरिये अपना धंधा खोलने का निश्चय किया ।
उसके लिए उन्होंने ब्रांड नाम रखा पेंटालून ! मुख्य रूप से डेनिम पेंट को ध्यान में रखकर ये नाम उन्होंने रखा था। सन 1991 में गोवा के पणजी शहर में उन्होंने शरुआत की । रेडीमेड गारमेंट का धंधा जमने के बाद हैदराबाद और बेंगलोर में भी बिग बाजार के नाम से शॉपिंग मोल खोले । फूड बाजार भी उन्ही का है ।

Default image
admin
Articles: 13

Leave a Reply

error: Content is protected !!
%d bloggers like this: