भारतीय सिनेमा की 10 ऐतिहासिक हक़ीक़त

भारतीय सिनेमा की 10 ऐतिहासिक हक़ीक़त

‘ राजा हरिश्चंद्र ‘ नाम की फ़िल्म से शरू हुआ भारतीय सिनेमा का इतिहास बहुत लंबा है । इस लंबे अरसे में बने कुछ यादगार प्रसंग , फ़िल्म कलाकार और फ़िल्मो से जुड़ी कुछ हक़ीक़त के बारे में आज जानते हैं ।

01 इतिहास की सर्वप्रथम फ़िल्म से भारत का सबंध

लुमायेर ब्रदर्स

वैसे चलचित्र कहे जाने वाले सिनेमा का जन्म उन्नीसवीं सदी के अंत में हुआ । लुमायेर ब्रदर्स ने सिनेमा के इतिहास में पहला शॉ फ्रांस की राजधानी पेरिस में दिसम्बर 8 , 1895 के दिन ग्रांद काफे नाम की रेस्टोरेंट के बेजमेंट में किया । फ़्रेक्टरी में से छूटने वाले कारीगरों को जीवंत दर्शय Cinematographe Lumiere कहि जाने वाली टेक्निक से दिखाए ! इतिहास की इस सर्वप्रथम फ़िल्म से भारत का संबंध था । वह इस तरह से की लुमायेर ब्रदर्स ने उनकी फिल्म बेजमेंट के जिस हॉल में प्रदर्शित की वह salon indian यानी भारतीय था। उसे भारतीय बैठक खंड कहा जाता था । उसकी सजावट भी भारतीय प्रणाली की थी । प्रेक्षकों के लिए टिकिट की क़ीमत 1 फ्रेंक का रखा था । रेस्टोरेंट के बाहर उनका असिस्टेन्ट राहदारियो को पोस्टर देता था । फिर भी उस दिन सिर्फ 33 प्रेक्षक ही आये । क्योंकि फोटोग्राफिक टेक्निक से दृश्यों को चलता फिरता दिखाया जा सकता है ऐसा लोग मानने को तैयार ही नहीं थे । हालांकि कुछ शॉ के बाद प्रेक्षको से ही हुई पब्लिसिटी से लुमायेर के शो में लोग बढ़ते गए और आखिर में हर दिन उसे 2000 फ्रैंक का मुनाफा होने लगा !

02 जिस दिन जमशेदजी ताता को फ़िल्म देखने के लिए मना किया गया !!! जमशेदजी ताताने दिया करारा जवाब !

सिनेमा की करामत ढूढने के छ महीने बाद लुमायेर ब्रदर्स उनकी लगभग 17 मीटर लंबी फ़िल्मो का प्रदर्शन करने के लिए ऑस्ट्रेलिया जाने के लिए निकले ! तब मार्ग में मुंबई में रुके ! जुलाई 7 , 1896 में हर दिन 6 फ़िल्मो के 4 शो का आयोजन किया। जिसका लाभ सिर्फ गोरे अंग्रेज उठा सकते थे। वॉटसन होटल में भारतीय पर ” indians and dogs are not allowed ” ऐसा बोर्ड लगाया जाता है ।

जमशेदजी ताता

लुमायेर की फ़िल्म देखने के लिए जमशेदजी ताता को भी वॉटसन होटल में एंट्री नही मिली थी । रंगभेद की नीति के सामने उन्होंने आवाज उठाई । दो साल बाद सन 1898 में उन्होंने वॉटसन को कही पीछे छोड़ देने वाली ताज होटल का बांधकाम शरू किया। मुंबई के गेट वे ऑफ इंडिया के नजदिक फाइव स्टार होटल सन 1903 में बनी ! जिसके दरवाजे ओर जमशेदजी ताता ने एक बोर्ड लगाया , ” British and cats not allowed ! “

03 बॉम्बे टॉकीज स्टूडियो

दिसम्बर 15 , 2007 के दिन W में बॉम्बे टॉकीज नाम का प्रसिद्ध स्टूडियो आग लगने से मिट गया । आज से लगभग 88 साल पहले 25 लाख की शेरमुडी के साथ बॉम्बे टॉकिं का कारोबार शरू करने वाले निर्माता हिमांशु रॉय ने ‘ अछूत कन्या ‘ जैसी 14 सफल फ़िल्म बनाई । जिसमे से एक भी फ़िल्म का डिरेक्टर भारतीय नही था । सिर्फ डिरेक्टर नही , बल्कि केमेरामेन और सेट डिजायनर समेत पूरा टेक्निकल यूनिट विदेशी था ।

बॉम्बे टॉकीज

अछूत कन्या और जीवन नैया जैसी 14 फ़िल्म बनाने वाले हिंमांशु रॉय के फ़िल्मो के दिग्दर्शक फ्रांज़ ओस्टेन नाम का जर्मन था । जिसने बर्लिन में ‘ अछूत कन्या ‘ का खास शो हिटलर के प्रचारमंत्री गोबेल्स के लिए मैनेज किया था । अशोक कुमार की सरनेम गांगुली थी जिसे दूर करने की सलाह देने वाला भी यही फ्रांज़ ऑस्टिन था । भारत मे प्रान्त वाद के चलते प्रेक्षकों को स्वीकार्य लगे ऐसा कुमार शब्द उन्होंने अशोक के साथ लगा दिया। जिसके चलते आगे जाकर फ़िल्म जगत में दिलीप कुमार , प्रदीप कुमार और राज कुमार जैसे नाम निकल पड़े !

04 भारत की सर्वप्रथम फीचर फिल्म

भारत की प्रथम फीचर फिल्म

भारत की सर्वप्रथम फीचर फिल्म राजा हरिश्चंद्र थी । मे 3 , 1913 के दिन मुंबई के कोरोनेशन थियेटर में लगी । निर्माता और दिग्दर्शक धूँडीराज गोविंद फाल्के ( जी हां इन्ही के सन्मान में आज भी फ़िल्म जगत में श्रेष्ठ काम करने वाले को फाल्के एवॉर्ड दिया जाता है ! ) साहब ने फ़िल्म उतार ने का सामान भारत मे नही मिलता था। तो फाल्के साहब सन 1912 में ब्रिटन गए और वहां से विलिम्सन ब्रांड के मूवी कैमेरा , फ़िल्म रील , प्रोजेक्टर जैसे साधन भारत लाये । राजा हरिश्चंद्र 57,000 फ्रेम वाली 3700 फिट लंबी फ़िल्म थी । जिसके साथ और आकर्षण के लिए दूसरी चार शार्ट इम्पोर्टेड मूवी बनाना शरू किया । मुंबई जैसे थियेटर गांवों में नही थे । इसलिए फाल्के साहब उनकी साधन सामग्री लेकर अपने परिवार व मददनिशो के साथ बैलगाड़ी में बैठकर महीनों तक गांव गांव घूमे और तंबू में शो दिखाकर गांव में भी सिनेमा का प्रचार व प्रसार किया !

05 बड़े नाम वाले कलाकारों ने असली नाम !

फिल्मी नाम :
( 01 ) प्राण
( 02 ) गुलज़ार
( 03 ) अशोक कुमार
( 04 ) राजेन्द्र कुमार
( 05 ) मनोज कुमार
( 06 ) मीना कुमारी
( 07 ) बंगाली अभिनेता उत्तम कुमार
( 08 ) जहोनी वोकर
( 09 ) जहोनी लिवर
( 10 ) मुकरी

असली नाम क्रम में :

कलाकार

( 01 ) पी के सिकंद
( 02 ) सम्पूर्णसिंह कालरा
( 03 ) कुमुदलाल कुंजीलाल
( 04 ) आर के तुली
( 05 ) हरिकृष्ण गोस्वामी
( 06 ) महजबीन
( 07 ) अरुणकुमार चैटर्जी
( 08 ) बदरुद्दीन जमालुद्दीन काज़ी
( 09 ) जहोन राव जानुमन
( 10 ) महम्मद उमेर

06 दो फ़िल्म जिसमे सबसे ज़्यादा एक्स्ट्रा कलाकरो ने हिस्सा लिया !

गांधी फ़िल्म

प्रसिद्ध रशियन साहित्यकार लियो टॉलस्टॉय की नावेल के आधार पर बनी War and Pease फ़िल्म में 1,65,000 एक्स्ट्रा कलाकार थे । सबसे महंगी फ़िल्म भी उस समय वही थी । क्योंकि बजट लगभग 10 करोड़ डॉलर तक पहुंच गया था । एक्स्ट्रा कलाकारों की संख्या का ये वर्ल्ड रेकोर्ड सालो बाद भारत मे शूट हुई रिचार्ड एटनबरो की गांधी फ़िल्म में गाँधीजी की अंतिम यात्रा के दर्शय के लिए 3,00,000 लोगों को इकठ्ठा किया। शूटिंग जनवरी 31 , 1980 के दिन किया गया । विविध जगह रखे गए 11 कैमेरा से शूट हुई 118 मिनट की फ़िल्म की रील 20,000 फिट लंबी थी । एडिटिंग के बाद स्मशान यात्रा के सीन्स सिर्फ 125 सेकन्ड जितने ही सीन्स फ़िल्म में लिए गए !

07 वह फ़िल्म जिसमे सब से ज्यादा कैमरे इस्तेमाल हुए !

नायकफ़िल्म का सीन

मूल तमिल फिल्म की हिंदी वर्जन ‘ नायक ‘ के लिए एरिफ्लेक्स ब्रांड के 35 कैमरे एक साथ इस्तेमाल किये गए थे। रात्रि के समय का द्श्य भंगार खाने का था । जिसके सेट के लिए 500 कार इकठ्ठा की गई थी । और सीन्स भी कीचड़ के माहौल में हीरो अनिल कपूर और खलनायकों के बीच की फाइट्स के थे । सब कैमरे अमरीकन थे । ये सीन्स फिल्माने के लिए निर्माता को 25 लाख ₹ का खर्च हुआ था ।

08 बलराज साहनी को पहचानते हो ?

जी हाँ अनजान लग रहा ये नाम वास्तव में सुनील दत्त का है ! जी हाँ , संजय दत्त के पिताजी !

बलराज साहनी उर्फ सुनील दत्त

वैसे उस समय मेट्रो थियेटर में अंग्रेजी फ़िल्म ही लगती थी । बिमल रॉय की दो बीघा जमीन पहली हिंदी फिल्म थी जो मेट्रो थियेटर में लगी थी । जिसके हीरो का नाम बलराज साहनी था । प्रेक्षकों के इंटरव्यू लेने वाले प्रवक्ता का नाम भी बलराज था । आगे जाकर यही बलराज साहनी सुनील दत्त के नाम से मशहूर हुए !

एक और खास बात सुनील दत्त की फ़िल्म मदर इंडिया का शूटिंग बिलीमोरा में हुआ था । सन 1950 के दशक में रेडियो सीलोन की बोलबाला थी । क्योंकि फिल्मी गीत भारत की नई पीढ़ी को गलत रास्ते पर ले जाते है ऐसा मानकर नेहरू के माहिती और प्रसारण के मंत्री डॉ बी वी केसकर ने ऑल इंडिया रेडियो पर फिल्मी गीतों का टेलीकास्ट रोक दिया था । इस समय श्री लंका के रेडियो सीलोन को फायदा हुआ और गोपाल शर्मा और सुनील दत्त जैसे भारतीय प्रवक्ताओं से कमर्शियल एडवरटाइजिंग से धन देने वाली कमर्शियल सर्विस शरू की ।

09 भारत की सिमचिन्ह फ़िल्म ‘ शोले ‘ !

शोले

आज सब मिलकर जिसकी 1100 प्रिंट्स फ़िल्म प्रोड्यूसर्स के पास है , मुंबई के 2500 सीट वाले मिनरवा थियेटर में जो लगातार 286 हफ्ते चली उस शोले फ़िल्म से जुड़े हर कलाकार फेमस हो गया ।

इस फ़िल्म को डाकू की सामान्य फ़िल्म न लगे इस लिए रमेश सिप्पी ने एक दो पहाड़ी वाली जगह ढूंढने के काम राम एडेकर को सौंपा था जो आर्ट डिरेक्टर भी थे । कई जगह घूमने के बाद राम एडेकर ने बेंगलोर से एक घण्टे के रास्ते के बाद कलकत्ता के रास्ते पर रामनगरम कहे जाने वाले गांव को पसंद किया । जिसके पास दो पहाड़िया थी । यही पहाड़ी शोले फ़िल्म के ट्रेडमार्क बन गए । रामगढ़ नाम का गांव भी वही बसाया गया । 450 शिफ्ट की शूटिंग वही हुआ । उस पहाड़ी पर से बोले गए सदाबहार बोले गए तीन डायलॉग : पूरे पचास हजार !

10 विशाल स्क्रीन वाला सबसे बड़ा थियेटर !

सबसे बड़ा आईमैक्स डॉम

मुंबई का एडलैब्स लिमिटेड का आईमैक्स डॉम थियेटर दुनिया का सबसे प्रथम नंबर पर आता है। थियेटर का स्क्रीन 12,700 वर्ग फिट का है और स्पीकर्स 12,000 वोट्स के है । यहां पर सबसे पहली आईमैक्स मूवी Blue Planet मार्च 31 , 2001 में रिलीज हुई थी । सामान्य फिलन 35 एम एम की या 70 एम एम की होती है जबकि आईमैक्स फ़िल्म 150 एम एम की होती है । आईमैक्स डॉम में कुल 1314 प्रेक्षकों के लिए चार मल्टीप्लेक्स स्क्रीन भी है !

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