भारतीय नौकादल के इतिहास की 11 दिलचस्प हक़ीक़त

भारतीय नौकादल के इतिहास की 11 दिलचस्प हक़ीक़त

भारतीय नौकादल का इतिहास बहुत ही पुराना है , शायद दुनिया मे सबसे अधिक पुराना साथ ही विवादास्पद भी ! क्योंकि दुनिया के पहले पोर्ट लोथल से ही भारतीय नौकादल का इतिहास शरू हो जाता है। क्योंकि बिना नौकादल के पोर्ट का कारोबार मुमकीन ही नहीं ! तब से शरू करके भारतीय नौकादल में जब अरिहंत अणु सबमरीन सब शामिल हुई तब तक के भारतीय नौकादल का इतिहास बहुत ही उज्जवल रहा है । आज हम भारतीय नौकादल की कुछ पुरानी तो कुछ नई दिलचस्प हक़ीकित के बारे में जानेंगे !

01 भारतीय नौकादल ने जब सुदूर हिन्दू राज्य स्थापित किया !

चौला साम्रज्य

इतिहास में थोड़ी दूर नजर करे तो भारत मे बड़ा नौकादल का जिक्र हमे दक्षिण भारत के तांजावुर के चौला राज्य का था । सन 985 से लेकर सन 1054 तक चौला साम्रज्य की ऐसी बोलबाला रही कि उत्तर में बंगाल तक का क्षेत्र उसके कब्जे में रहा । दूसरी ओर चौला के नौकादल ने श्री लंका को भी जीत लिया । सन 1007 में चौला सम्राट राजराजा पहले के शासन काल मे नौकादल ने बहुत दूर का लक्ष्यआंक ताका जो प्रदेश दो देशों में बटा हुआ था । उसे पूरा जीतकर वहां हिन्दू राज्य स्थापित किया ।

आज उन प्रदेशो को इंडोनेशिया और मलाया कहा जाता हैं । जहां श्रीविजय कहा जाने वाला बौद्ध साम्रज्य था। सन 700 के अरसे में स्थापित हुआ मूल राज्य तो हिन्दू राज्य था लेकिन बाद में राजा शैलेन्द्र के वंशजो की बौध्द सत्ता आई । सत्ता का केंद्र जावा था । जिसकी रक्षा के लिए बौद्ध धर्मी शासकों ने बलवान नौका काफिला बनाया था । फिर भी राजराजा के नौकादल से वह हारा । लंबे समय के संघर्ष के बाद अग्नि एशिया का लगभग पूरा प्रदेश फिर से हिन्दू साम्रज्य के आधिपत्य के नीचे आया । आज भी इंडोनेशिया के बाली द्वीप की बहुमति प्रजा हिन्दू हैं , और रामायण उसका धर्मग्रंथ है ।

02 अजेय मराठा नौका सेनापति कानोजी आंग्रे

कानोजी आंग्रे

मराठा नौका सेनापति कानोजी ने आंग्रे के नौकादल ने लगातार 31 साल तक अंग्रेजो , डच और पोर्तुगालियो के सामने समुद्री युध्द खेलकर तहलका मचा दिया था । मुंबई को छोड़कर मलबार से कच्छ तक उसकी हकूमत चलती थी । दोनों ओर तोप वाले उसके जहाज उस जमाने के मुताबिक सढ़ वाले थे। जबकि पतवार चलाने वाले नाविक 40 से 50 थे। सन 1698 से लेकर 1729 तक कानोजी आंग्रे अनेक परदेशियों से लदा लेकिन एक बार भी हारा नही । मराठी में सारखेल कहै जाने वाले कानोजी आंग्रे की युद्धनीति दूसरे नौकदलो से अलग थी। इसलिए परदेशी तो ठीक कुछ अंग्रेजो से चकाचौंध हुए भारतीय ( अ ) ज्ञानी भी उसे समुद्री लुटेरा मानते है !

विदेशियों भारतीय सौदागरों का भोग लेकर समुद्री व्यापार चलाये और उस व्यापार से मिलने वाले पैसे से भाड़े के सैनिको से यहाँ के प्रदेश जीत ले वह बात कानोजी आंग्रे को पसंद नही थी । इसलिए उसका मुख्य आशय परदेशी घूसखोर को आर्थिक नुकशान पहुंचाना और उनके व्यापार को तोड़ना था । फिरंगी मालवाहक जहाजो को तोपों से उड़ा देना या उनका पूरा माल जपत कर लेना उसकी युद्धनीति थी । जिसे अंग्रेजो ने लूट कही । बस इसी को सच मानने वाले कुछ भारतीय अज्ञानी भी उसे समुद्री लूटेरा कहते हैं। विदेशियों के आंग्रे का नौकादल इस कदर त्रास जनक साबित हुआ कि आख़िर में नवम्बर 29 , 1721 के दिन अंग्रेज और पुर्तगालियों ने कुल मिलाकर 6000 नाविकों वाला संयुक्त नौका काफ़िला आंग्रे के खिलाफ उतारा ! आंग्रे के नौकादल ने उनको भी हरा दिया। यह मराठा नौका सेनापति सन 1729 में मरा तब तक अजय ही रहा ! अफसोस कि आज भी भारतीय इतिहास की पाठ्य पुस्तक में इसका नाम तक नही आता !

03 भारत विभाजन में नौका दल

भारत पाकिस्तान ( प्रतीकात्मक तस्वीर )

आजादी के बाद भारतीय नौकाफल रॉयल इंडियन नेवी के नाम से जाना जाता था । विदेशी हकूमत का सूचक रॉयल शब्द भारत ने सन 1950 तक अपनाए रखा ! देश का विभाजन हुआ तब नौकादल का भी विभाजन किया गया। भारत को 33 जहाज मिले , पाकिस्तान को 16 जहाज़ मिले ! विभाजन संख्या के अनुसार नही बल्कि लड़ाकू शक्ति के अनुसार किया गया । स्वतंत्रता के बाद तुरंत हमारे नौकादल को अभियान चलाना पड़ा ! जो मोर्चा महबतखान रसुलखान के तटवर्ती राज्य जूनागढ़ का था । पाकिस्तान के साथ राजकीय संधि करने के बाद बाबरियावाड और मांगरोल के राज्य को जीतने के लिए अपनी सेना भेजी तब तक भारत सरकार पैरों पर पैर रखकर सोती रही । जब पाकिस्तान से शस्त्रों से भरा जहाज वेरावल आने के लिए निकला है ऐसे समाचार मिले तब जाकर सरकार ने कमांडर रामदास कटारी के नेतृत्व में ‘, कृष्ना , जमुना और कावेरी नाम की तीन मनवार , सुरंग दूर करने वाले माइनस्विपर्स और तीन सैनिक वाहक लेंडिंग क्राफ्ट सब मिलाकर 9 जहाज का काफ़िला रवाना किया । बख्तरिया वाहन , बंदूक और बजुके के साथ सेना को पोरबंदर , जाफराबाद और मांगरोल के किनारे उतरे ! पाकिस्तानी फ्रिगेट उसी समय आ गई लेकिन भारतीय नौकादल का काफिला देखते ही उसने दिशा बदल ली । नवाब के लिए शायद उसमे शस्त्र थे। भारतीय सैनिक जूनागढ़ पहुंचे उससे पहले तो नवाब खानगी प्लेन में बैठकर करांची भाग गया ।

04 नौकादल का असंतोष

भारतीय नौकादल ( प्रतीकात्मक तस्वीर )

दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान अंग्रेजो ने भारतीय नौकादल में बडे पैमाने पर सैनिको की भर्ती की थी । अफसरों की संख्या में भी 20 गुना बढ़ोतरी हुई थी । नाविकों की संख्या 27,650 थी जबकि अफसर 2600 थे । विश्वयुद्ध के बाद जरूरत पूरी हो गई तो संख्या को घटाकर 11,000 कर दिया गया । जिसका विरोध हुआ , और फ़रवरी , 1946 में उसने विप्लव का रूप ले लिया। सब मिलकर 21 नौका मथक , 78 जहाज और 20,000 नाविकों ने और उनका साथ देने के लिए 3,00,000 मिल मजदूरों ने जो आंदोलन चलाया उसमे पुलिस गोलीबारी में 217 लोगों की मौत हो गई । 2000 लोग घायल हुए । लेकिन इस विप्लव ने अंग्रेजो को सबक सिखाया की सेना का भरोसा गवाने के बाद भारत पर शासन नही किया जा सकता !

05 विमान वाहक जहाज ‘ विराट ‘ !

विराट जहाज ( प्रतीकात्मक तस्वीर )

विमान वाहक जहाज विराट भारतीय नौकादल का एक उज्ववल पन्ना है । नाम के मुताबिक वह विराट था । जिसे सन 2015 सेवा निवृत्त कर दिया गया है। लंबाई में 226 मीटर का था , वजन 28,700 टन ! 76,000 हॉर्सपावर के दो इंजिन हरदिन 180 टन ईंधन जलाते थे । 25 दिन के सफर के लिये उसे 3200 बैरल डीजल का स्टॉक साथ ले जाने की जरूरत थी । विराट की खासियत उसकी 12° एंगल पर बनी लसरपट्टी थी । जो एक तरह चढ़ान के लिए थी। विराट के सी हैरियर प्रकार के लड़ाकू विमान वैसे तो 90 ° पर टेकऑफ कर सकते है लेकिन उसके लिए उनका वजन 2500 किलोग्राम कम रखना पड़ता है । लड़ाई के समय शस्त्रों पर कोई कटौती नही की जा सकती । साथ ही तुतक पर लगाने वाली दौड़ भी कम होनी चाहिए । उसके लिए स्की जम्प सहायक होता है तो केटेपोल्ट् से धक्का खाने वाल विमान उस पर आरोहण करके आसानी से आकाश में चढ़ जाता है । इसलिए 900 किलोग्राम जितना और बोजा उस पर लादा जा सकता हैं ।

06 ऑपरेशन विजय

ऑपरेशन विजय ( प्रतीकात्मक तस्वीर )

ऑपरेशन विजय जिसमे विमान वाहक जहाज विक्रांत और भारी भरखम क्रूज़र मैसूर समेत 7 युध्ध जहाजो ने हिस्सा लिया था । आमने सामने हुई गोलंदजी में पोर्तुगल के तीन जहाज दुबे ! सबसे बड़ी पुर्तगाली मनवार आल्फांज़ों द आल्बुकर्क नाम की फ्रिगेट थी । मार्म गोवा बंदर में रहकर उसने गोवा के देबोलिम एयरपोर्ट पर हमला करने वाले चार भारतीय कैनबेरा विमानों के सामने विमानविरोधी तोपों से हमला किया तब कैप्टन रूसी गांधी की बेटवा फ्रिगेट ने उसकी खबर लेना शरू किया । कुछ गोले दागने के बाद उस पुर्तगाली फ्रिगेट के सफेद ध्वक फहराया ! ऐतिहासिक कटाक्ष ये की पुर्तगाली फ्रिगेट का नाम जिस पुर्तगाली सेनापति के नाम पर रखा गया उसी के नाम वाली फ्रिगेट की शरणागति से उसका अंत भी हुआ । उसे युद्ध मे इतना नुकशान हुआ था कि उसके भंगार के सिर्फ़ 7 लाख ₹ ही मिल पाए !

07 नौका दल का धनुष मिसाइल

मिसाइल की प्रतीकात्मक तस्वीर

धनुष भारतीय नौकादल का 6 मीटर लंबा और सॉलिड फ्यूल वाला शिप टू सरफेस मिसाइल है । जिसका दूसरा नाम पृथ्वी – 3 है । तीसरा सागरिका है । असल मे धनुष उसके लॉन्चिंग पेड़ का नाम है। जो युद्ध जहाज के पिछले हिस्से पर होता है जो भूमिगत लॉन्चिंग पेड़ से अलग होता है । बीच सन्दर पर युद्ध जहाज लगातार हिलता रहता है। अब उस समय लॉन्चिंग पेड़ पर रहा धनुष मिसाइल भी हिलता रहे तो 150 से 300 किलोमीटर दूर रहे लक्ष्य को कैसे टारगेट कर पायेगा ! इसलिए प्लेटफॉर्म में जायरोस्कोपिक स्टेबिलाइजर का बंदोबस्त किया गया है । समुद्र के लहरों पर युद्ध जहाज कितना भी हिले लेकिन प्लेटफॉर्म स्थिर ही रहता है । जिस पर धनुष पर भी स्थिर ही रहता है ।

08 भारत का सबसे बड़ा लड़ाकू प्लेन ! ( नौकादल का है ! )

लड़ाकू विमान ( प्रतिकात्मक तस्वीर )

भारत का सबसे बड़ा लड़ाकू प्लेन भारतीय वायु सेना का नही बल्कि नौकादल का है । रशियन बनावट का तुपलोव – 142 के नाम से जाना जाता यह विमान लड़ाकू जेसा न दिखकर मालवाहक या सैनिक वाहक दिखता है । क्योंकि वह बहुत बड़ा है । लंबाई 49.5 मीटर , पांख का व्याप 51 मीटर हैं, प्रोपेलर का व्यास 5.5 मीटर और वजन 188 टन है । घण्टे की 925 किलोमीटर की स्पीड से उड़ सकता है। लगातरा 17 घण्टे 45 मिनट उड़ सकता है। साथ ही ये विमान एंटी सबमरीन वोरफेर के लिए जाना जाता हैं । पानी मे छुपी हुई दुशमन सबमरीन की हाजरी मैग्नेटोमीटर जैसे साधनों से उसकी प्रेजन्स पकड़ने के बाद उसका स्थान तय करने के लिए तुपलोव 142 के ऑपरेटर सोनार यंत्र के बोये पेरेशूट से यहां वहां छोड़ते है । हरेक बोया अपने आसपास के जल विस्तार में अल्ट्रासोनिक साउंड के जरिये सबमरीन का पता लगाते है । और उसे डेटॉ को ट्रांसमीटर से विमान को भेज देते हैं । फिर क्या विमान में रखा गया 11,250 किलोग्राम जितने विनाशक शस्त्रों से उसका खात्मा कर दिया जाता है ।

09 नौकादल का यूनिफॉर्म

नौकादल का यूनिफॉर्म

नौकादल के अफसरों का यूनिफॉर्म से आप बहुत कुछ जान सकते हैं । चल रहे दो नौकादल के अफसरों में सीनियर अफसर बाई ओर रहता है जब कि जनियर दाई ओर रहता है। तीन एकसाथ हो तो उनमें से सीनियर अफसर बीच मे चलता है । उसके बाद का सीनियर उसकी बाई ओर चलता है । एयर फोर्स और मिलिट्री में एकसमान रिवाज होता है।

10 सेल्यूट करने की पद्धति

सेल्यूट

मिलिट्री में अफसरों की हथेली बिल्कुल आगे की ओर रहै उस तरह से सलामी दी जाती है । जबकि ऐर फोर्स में हथेली माथे के संदर्भ में 45° के कोण पर रखनी होती है । इसलिए सामने वाली व्यक्ति को वह आंशिक रूप से दिखती है । नौकादल के अफसर सेल्यूट करतेंय हथेली को बिल्कुल नीचे की ओर रखते हैं ।

11 नौकादल में राष्ट्रपति का दरज्जा !

नौका सेनापति ( प्रतीकात्मक तस्वीर )

मिलिट्री , नौकादल और वायु सेना के सर्वोच्च सेनापति के रूप में राष्ट्रपति जिस युद्ध जहाज पर हो उस समय के लिए नौकादल के ध्वज जहाज से ऊंचा दरज्जा मिल जाता है । राष्ट्रपति की हाजरी का एलान करने के लिए वह जहाज सेनापति पद के प्रतीक जैसा ध्वज फहराता है जो एक प्रणालिका है । इतना ही नही सूर्योदय या सूर्यास्त के बाद उनके मान में तोपे फोड़ी जाती हैं । नजदिक में चल रहै युद्ध जहाज पर लश्करी बेंड सुबह और सूर्यास्त की तोपो की फ़ायरिंग के पहले मिलिट्री तर्ज बजाते हैं ।

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