भारतीय चलन रुपये की Top 12 ऐतिहासिक हक़ीकत

भारतीय चलन रुपये की Top 12 ऐतिहासिक हक़ीकित

डॉलर , पाउंड और यूरो के सामने रुपया लगातार कमजोर होता गया है । आज भी हो रहा है । जिसकी खबर अखबारों में आती रहती हैं । राष्ट्रीय बाज़ार में भले ही उसका मूल्य कम होने के कई कारण हैं । जिसकी बेतुकी चर्चा करने का यहाँ कोई प्रयोजन नही । बल्कि यहाँ इस लेख में हम बात करेंगे भारतीय चलन रुपये के बारे में । जनरल नॉलेज में आपके ज्ञान का ग्राफ ऊपर जाएगा ये गांरटी !

01 भारत का सर्वप्रथम सत्तावर रूप से स्वीकृत रुपया !

सन 1542 में दिल्ही के बादशाह शेर शाह सूरी ने रुपे का यानी नगद चांदी का प्रथम सिक्का मुद्रित कराकर उसे रुपैया नाम दिया । इस नाम का सिक्का हमेंशा के लिए जम गया । लेकिन शेर शाह सूरी स्थानिक शासक होने के कारण उसका सिक्का देशव्यापी चलन में नही आ पाया । सुर वंश खुद 11 साल से ज़्यादा नही टिक पाया । मुगल बादशाहों ने उसके बाद मुहर , दाम , अधेला , दमडा , दमड़ी और टंकी जैसे कई नामो से सिक्के निकाले लेकिन चलन के रूप में मुगल सीमा के अंदर ही रहे । लगभग पूरे भारत मे सत्तावर स्वीकृत हुआ सवर्प्रथम सिक्का जिसने निकाला उसके बारे में जानकर आप चौक जाएंगे ।

शेर शाह सूरी और भारत का पहला रुपये का सिक्का

तो जवाब है ये सिक्का निकालने वाले थे अंग्रेज ! हा , ईस्ट इंडिया कंपनी ने धीरे धीरे भारत का आधे से ज़्यादा प्रदेश पर कब्जा किया । इतना ही नही बाकी रहे प्रदेश में से ज्यादातर राजा महाराजा उसके नीचे काम करने वाले सामन्त बन गए । तब ब्रिटिश ताज ने उस कंपनी के सार्वत्रिक इस्तेमाल के लिए सिक्कें जारी करने की मंजूरी दी । कंपनी ने Indian Coinage Act , 1835 नाम का कानून बनाकर उसी साल राजा विलियम की मुखाकृति वाला रुपये का सिक्का निकाला । जो भारतभर में पहला सत्तावार /official सिक्का था । कोई चलन आज 176 साल बाद भी अस्तित्व में हो ऐसा चलन एक मात्र रुपये का ! इसलिए 11.66 ग्राम वाले चांदी के सिक्के को उस दृष्टि से रिकॉर्ड सर्जक मानना चाहिए । जिसका मूल्य आज भी 1 ₹ के बदले 600 से 750 ₹ कम नही ।

02 शुद्ध चांदी का रुपया

असल रुपया इसलिए रुपया कहलाया की वह भारोभार चांदी का बना हुआ था । शेर शाह सूरी ने तय किया हुआ ऐसे सिक्के का वजन 11.65 ग्राम भी 400 सालो तक वैसा ही रहा । ब्रिटिश सरकार ने हमारे यहां 1 ₹ के जो सिक्कें बनाती थी उसके लिए भी चांदी का इस्तेमाल करती थी। हालांकि घन सेंटीमीटर पर 10.5 ग्राम की चांदी जरा नरम धातु होती है इसलिए उसमे मजबूती लाने के लिए दूसरी धातु की मिलावट करनी जरूरी थी । फिर भी 1000 वे हिस्से में 917वा हिस्सा चांदी का था । तो सही मायने में वह रुपया ही था । ब्रिटिश सरकार ने पूरे सौ साल तक ऐसे सिक्के चलाये । राजा ज्योर्ज 6 ठठे की मुखाकृति वाले आखरी 917 सिक्के उन्होंने सन 1938 में मुद्रित किये । लेकिन उसके बाद रुपया नगद चांदी का नही रहा ।

चांदी का सिक्का

क्योंकि सन 1939 में दूसरा विश्वयुद्ध शरू हो गया था । तब silver fulminate कहा जाने वाला बारूद बनाने के लिए चांदी की मांग अचानक से बढ़ गई थी । जो रातोरात हजारो टन में बदल गई थी । ब्रिटन के शस्त्र उद्योग के लिए दिल्ही अंग्रेज हकूमत ने पहले ही साल ₹ 1 के कीमत के 53 करोड़ सिक्के वापिस ले लिए थे । भारत मे चांदी का भाव आसमान छू रहा था । चांदी के सिक्के पाने के लिए लोग भठ्ठी में न पिघालने लगे इसलिए जुलाई 25 , 1940 के दिन व्यक्तिगत या धन्धाकीय जरूरत से ज़्यादा सिक्के रखने पर प्रतिबंध फरमाया गया । साथ ही दुसरे 55 करोड़ सिक्के चलन में से निकाल लिए । बदले में ₹ 1 के जो नए सिक्के मुद्रीत किये गए उसमे 1000 भाग में 917 के बदले अब सिर्फ 500 वे हिस्से जितनी चांदी थी । और व नाप भी आगे चलकर क्रमशः कम होते होते शून्य पर आने वाला था ।

03 भारत की प्रथम सरकारी अर्थात सत्तावार नॉट

एक समय भारत मे पैसों की लेनदेन सिक्के ही इस्तेमाल किये जाते थे । ईस्ट इंडिया कंपनी ने व्यापारी कारोबार बढ़ने के कारण वजनदार सिक्के थोड़े मुश्किल लग रहे थे । इसलिए उन्होंने कुछ प्रयावेट बैंको को अपनी अपनी चलनी नॉट छापने के लिए कहा । भारत मे सबसे पहली स्थापित की गई बैंक ऑफ हिंदुस्तान ने सन 1770 में पहली बार नोट्स का एक्सपेरिमेंट किया और वह फ्लॉप रहा। विविध मूल्य की नोट्स छापने का काम चालू रखा । नोट्स का मूल्य कितने सिक्के बराबर माना जायेगा इसकी स्पष्टता उस पर की गई थी। फिर भी भारत मे चलनी नोट्स का समय नही आया ।

भारत की पहली सत्तावार नॉट

क्योंकि पूरी बैलगाड़ी भरकर सूती कपड़ा , मरी मसाला , रेशम वैगेरह सामान अंग्रेजो को देने के बाद बदले में सिर्फ रंगीन कागज के टुकड़े मिले ये भारतीय व्यापरियों के लिये बेतुकी बात थी । इसलिए नोट्स हाथ मे आते ही वे सब नॉट के सिक्के लेते थे। हर रोज ऐसा ही होता था । इसलिए थोड़े घण्टे पहले ही चलन में गई नोट्स वापिस बैंक के पास आ जाती थी । नोट्स के बदले में सिक्के चुकाने की गारंटी बैंक देती थी , ईस्ट इंडिया कंपनी नही ।

सन 1858 में ब्रिटिश सरकार ने शासन संभालने के बाद Government of india के नाम पर ₹ 10 की पहली नॉट जब चलन में रखी गई तब ही लोग सरकार पर भरोसा रखकर पेपर करंसी की ओर मुड़े । भारत की प्रथम सरकारी अर्थात सत्तावार नॉट की तारीख थी जून 9 , 1862 !

04 सस्ते कांसे का सिक्का

अंग्रेजो ने भारत मे रुपया , आना , पाई का चलन दाखिल किया था । पाई की बारी सन 1939 में आई । ( 1 ₹ = 16 आना , 1 आना = 4 पैसा , 1 पैसा = 3 पाई । इस हिसाब से 1 रुपया = 192 पाई ! सबसे ज्यादा 1/2 पैसे के , 1 पैसे के और 2 पैसे के सिक्के चलन में घूमते थे । क्योंकि रोजमराह की चीजें खरीद ने के लिए ये पर्याप्त थे । ब्रिटिश हकूमत ने सन 1943 में ये तीनो सिक्को को वापिस खींच लिया । उनके बदले में बीच मे होल वाले 1 पैसे के सिक्के चलन में चालू किये । किसी दूसरे देश ने इस तरह सिक्के का अवमूल्यन करने की कदम नही उठाया था ।

भारत के पहले कांसे के सिक्के

लेकिन ब्रिटन ने ये किया । क्योंकि सन 1943 का साल दूसरे विश्वयुद्ध की पराकाष्ठा का था । रायफल और मशीनगन की बुलेट बनाने के लिए , तोप के गोले बनाने के लिए घर का तांबा खत्म हो गया था। हमारे यहां तीनो सिक्को को तांबे से बनाया जाता था । अब ब्रिटन तांबे की कमी भुगते और भारत के लोग तांबे के सिक्के से खरीदी करते रहे ये कैसे हो सकता था ?

तो उन सिक्को के तांबे को युद्ध मे काम मे लाने के लिए गोरे अंग्रेजो ने सब सिक्के वापिस खींच कर एक साथ भठ्ठी में झोंकने के लिए ब्रिटन भेज दिए। बदले में छिद्र वाले करोड़ो पैसे मुद्रित करवाये । जिसको बनाने में सस्ता कांसा इस्तेमाल किया गया था । सन 1947 तक ऐसे सिक्के इस्तेमाल होते रहे । आज़ादी के बाद भारत सरकार ने उसका प्रोडक्शन बंद करवा दिया ।

05 भारत की सिक्कों की टंकशाला

ब्रिटिश राज ने बनाये और आज भी बदकिस्मती से अमल में रहे coinage Act , 1906 के मुताबिक अलग अलग मूल्य के सिक्के मुद्रित करने का अधिकार सिर्फ भारत सरकार को है । सिक्के की डिजाइन भी वही तय करते हैं । रिजर्व बैंक का काम सिर्फ सरकार की ओर से उस काम को पूरा करना है । मुख्य टंकशाले अलीपुर ( कलकत्ता ) , मुंबई , सैफाबाद ( हैदराबाद ) , चेरलापल्ली ( हैदराबाद ) और नोएडा ( उत्तर प्रदेश ) में है ।

भारतीय टंकशाला का प्रतीकात्मक चित्र

लेकिन इन सब मे कुछ अजीब बात ये है कि कुछ टंक शाला को विदेशियों ने भी स्थापित की थी ।

सन 1600 में इंग्लिश , फ्रेंच , डेनिश और डच कुल चार ईस्ट इंडिया कंपनी थी । उनके आगमन से पहले भारत मे पोर्तुगीज आये थे । इन सब की टंकशाल को देखे तो :

01 पोर्तुगीन टंकशाल के स्थान : वसई , दमन , चौल , कालीकट और दिव
02 फ्रेंच टंकशाल के स्थान : कराईकल , मछलीपट्टनम , यानम , माहे पॉन्डिचेरी और मुर्शिदाबाद
03 डेनिश टंक शाला के स्थान : त्राम्बे कर
04 इंग्लिश टंकशाल के स्थान : मुंबई , कलकत्ता , सूरत , पटना , बनारस , फरुखाबाद और मुर्शिदाबाद । जिसमे से कलकत्ता की न्यू अलीपुर मिंट सबसे बड़ी टंकशाला है । ये 130 एकड़ में फैली हुई है । 8 घण्टे में ये टंकशाल 12 लाख सिक्के मुद्रित कर सकती हैं ।

06 भारत की सबसे विचित्र करन्सी नॉट

भारत की सबसे विचित्र करन्सी की नॉट ₹ 2.5 की थी । जिसके कुछ दुर्लभ नमूने नॉट संग्रह के शौकीनों के पास पड़े है । ये मूल्यवान भी है । तो यू मिलते भी नही । राजा पंचम ज्योर्ज कक मुखाकृति छपी हुई इस नॉट का अंक RUPEES 2/8 अर्थात 2₹ 8 आने ! दिल्ही की अंग्रेज सरकार ने जनवरी 2 , 1918 के दिन चलन में चलाई। लेकिन ऐसा बेढंग सा अंक क्यो पसंद किया गया ये आप के दिमाग मे आया होगा ।

भारत की सबसे विचित्र करंसी नॉट

तो जवाब ये है कि सन 1918 के अरसे में 1 डॉलर = ₹ 2.5 का विनिमय दर था । और वह गोल्ड स्टैंडर्ड के साथ कनेक्ट होने के कारण बढ़ता या कम नही होता था । अमरीका भारत के व्यापार में लेन देन में सरलता रहे और नोट्स की अदला बदली में दिक्कत ना हो इसलिए नोट्स को डॉलर के भाव के अनुसार बना दी ।

जनवरी 1 , 1926 तक ऐसी नोट्स छपती रही ।

07 PATANA POST वाले सिक्के !

पोस्टल स्टम्प का प्रतीकात्मक चित्र

ईस्ट इंडिया कंपनी ने बंगाल बिहार को अपने कब्जे में ले लिया । उसके बाद सन 1774 में 1 आने के और 2 आने के ऐसे सिक्के निकाले जिस पर PATANA POST लिखा गया । जिसका कारण ये था कि अंग्रेजो ने वहां छोटे पैमाने पर पॉट्स व्यवस्था दाखिल की थी । अभी पोस्टल स्टम्प का जमाना 78 साल बाद में आने वाला था । लेकिन काम तो चलना था तो टिकट के बदले में लोगो को PATANA POST लिखे हए सिक्के देने का निर्णय लिया गया । लोगों को यही सिक्के दिए जाते थे । जो सामान्य चलन न होकर पोस्ट डिपार्टमेंट की आमदनी थी ।

08 भारत का पहला समांतर चलन

कूपन्स का चित्र ( प्रतीकात्मक )

सन 1983-84 में भारत मे कम कीमत के सिक्कों की जबरदस्त कमी आ गई । सरकारी मुद्रण में सोने से ज्यादा उस पर गढ़ने पर खर्च हो रहा था । जैसे कि 25 पैसे के सिक्के का मुद्रण खर्च 26 पैसे , 20 के सिक्के का 20.2 पैसे और 5 के सिक्के पर 10.3 पैसे का खर्च हो रहा था । अब इस कमी को पूरा करने के लिए मुंबई बस सर्विस चलाने वाली BEST कंपनी ने सन 1984 जनवरी में ₹ 4, 26 , 00,000 कूपन छापे ! सन 1985 , मार्च तक 4 , 07 , 62 , 335 ₹ मूल्य की कूपन बाजार में घूमती रही । हर जगह बाकायदा ये कुपन चलन की तरह ही घूमती रहती !

09 सबसे क़ीमती भारतीय नॉट

₹ 5000 की नॉट

रिजर्व बैंक ने अप्रैल 1 , 1954 का दिन चलन में रखी ₹5000 मूल्य की नॉट सबसे ज़्यादा मूल्यवान साबित हुई हैं । धनवानो ने अपनी ब्लेक मनी इसी नोट्स के रूप में संग्रह की होगी ऐसा सोचकर मे , 1977 में इस नॉट को रद कर दिया गया । लेकिन भारत सरकार को मात्र 13.6 करोड़ मूल्य की ही नोट्स हाथ लगी । फिर भी कुछ नोट्स बदली नही गई । जो रेर बन गई ।

नीलामी में इसकी उन्ची कीमत मिलती हैं । सन 2008 में इस ₹5000 कि नॉट का सौदा 6,60,000 ₹ में हुआ था ।

10 सिक्को को जब भठ्ठी में फेंक दिया गया !

इंग्लैंड की रानी एलिज़ाबेथ प्रथम के अर्थशास्त्री सर थॉमस ग्रेशाम के सिध्दांत Gresham’s law : bad money tends to drive good money out of circulation . मतलब खराब पैसा अच्छे पैसे को बाहर फेंक देता है । हमारे यहां भी कुछ साल बाद 2 ₹ के और 5 ₹ के सिक्के खराब साबित हुए और मुख्य रूप से कलकत्ता समेत पश्चिम बंगाल में से रहस्य मय तरीको से गुम होने लगे । रिजर्व बैंक को कारण जानने को मिला और दो रुपये के अनामत सिक्को को भठ्ठी में फेंक दिया।

ग्रेहामशा

क्योंकि स्मगलर ₹ 2 और ₹5 के सिक्के बड़े बड़े थैले में पैक करके बांग्ला देश भेज देते थे । जहाँ उनको पिघला कर उसमे से कुप्रो निकल निकालकर उस धातु से इमिटेशन ज्वेलरी बनाई जाती थी । इनकी तस्करी करने का करण ये था कि सिक्के के छपे हुए मूल्य से उसकी धातु का मूल्य ज्यादा मिलता था । इसे रोकने के लिए 7% क्रोमियम और 83% लोहे से बने 27 मिलीमीटर के व्यास के सिक्के मुद्रित किये जाने लगे । चौड़ाई कम कर दी । ₹ 5 के सिक्के की मोटाई पर तो 50 % की कमी की गई ।

11 तीन पैसे का सिक्का

भारत सरकार ने सन 1957 में मेट्रिक सिस्टम अपना ली । उसके बाद चलनी सिक्के और नोट्स को भी वही सिस्टम लागू की । फिर भी 1964 में भारत सरकार ने 3 पैसे का सिक्का निकाला । जिसके तीन सिक्के साथ लाये तब भी 9 पैसे ही बनते थे । 10 के साथ उसका कोई लेनादेना नही था।

तीन पैसे का सिक्का

12 भारत की पेपर मिल इंडिया प्राइवेट लिमिटेड

चलनी नोट्स छपने के लिए हर साल लगभग 18000 टन जितना कागज चाहिए । उत्पादक कंपनी बैंक नोट् पेपर मिल इंडिया प्राइवेट लिमिटेड कंपनी रिजर्व बैंक की साथी कंपनी है । जिसका लोगो अहमदाबाद की नेशनल इन्स्युट्यूट ऑफ डिजाइन नाम की संस्था ने बनाया ।

बैंक नॉट पेपर मिल इंडिया प्राइवेट लिमिटेड के लोगो

उसका ग्राफ़िक रूप में कॉटन के फूल को दर्शाया है । सुचितार्थ ये की रुपये की करंसी नोट्स बनाने के लिए कॉटन का इस्तेमाल होता हैं लकड़ी का पल्प नही । लोगो मे वर्तुल आकार की रेखाओं से सिर्फ कागज के रोल को दर्शाया गया है । बैंक नॉट पेपर मिल लगातार चलती रहती हैं । क्योंकि रद की हुई नोट्स के सामने नई नोट्स बनाने का काम रुकता ही नहीं ।

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