अफ्रीका के क्युला पक्षी

अफ्रीका के क्युला पक्षी

अफ्रीका के क्युला पक्षी

जनसंख्या में नंबर पर आने वालापक्षी कौन सा है? ऐसा सवाल अगर पूछा जाए तो आप किस पक्षी का नाम लेते हैं ? सामान्य नाम कौआ, कौकटियल, कबूतर आदि हैं। यह तुरंत दिमाग में आता है, क्योंकि पक्षियों को हर जगह देखा जा सकता है। साथ ही वे न केवल भारत में, बल्कि दुनिया के सभी देशों में है । प्रत्येक संख्या का कुल योग कहाँ तक पहुँचता है? -और फिर भी आबादी फैलाने में नंबर वन।नहीं। उसी तरह, न तो मुर्गा और न ही बतख। सबसे ज्यादा प्रमाण का नंबर क्युला नाम के पक्षी हैं । उच्चतम अनुपात में ये पक्षी अफ्रीका के सिवा कही और बैठता नहीं । अफ्रीका में भी कुछ ही देशों में ये रहता हैं। रउत्तरी सहारा जैसे रेगिस्तान में और दक्षिण में घने जंगलों में इसकी कोई आबादी नहीं है। बाकी मैदानी इलाके में इनकी संख्या अनगिनत हैं । वह भी इतनी की जब उसका झुंड आकाश में उड़ता है तो थोड़ी देर के लिए सूरज को ढक दें । सभी एक साथ फड़फड़ाते है तो उनकी पंख का ध्वनि मेघगर्जना लगती है और कभी-कभी तो हजारों क्युला एक साथ कोई पेड़ पर बैठते है तो उनके वजन से 5 ” की डाली भी टूट जाती है। विचित्र लगती बात यह है कि अफ़्रीका में लोगो के लिए ये कोई असामान्य बात नही है। उल्टा दिन में क्युला का एक बड़ा सा झुंड न दिखे वह आस्चर्य बात होती है ।

क्युला की बस्ती बहुतायत में है। एक सरल हिसाब करे तब दुनिया मे 8900 तरह के पक्षी है । हमिंगबर्ड से लवकर कई तरह के पक्षियों का उसमे समावेश किया जाता हैं। जिनकी कुल बस्ती लगभग 100 अरब जितनी होगी । हरेक की बस्ती उस हिसाब से सवः करोड़ भी नही होती । लेकिन 100 अरब में क्युला ही 10 अरब है। और सभी आफ्रिका में ही बस्ते है । वह भी पहले कह चुके है कि ना ही रेगिस्तान में और न ही घने जंगल मे !मैदानी इलाके और खुले इलाके में !

ये पक्षी जो कि अफ्रीकन लोगो को बिल्कुल पसंद नही । टिड्डे की तरह क्युला भी बहुत ही उपद्रव मचाते हैं। लेकिन टिड्डे तो पाँच-दस साल में एक बार ही बार खेतो पर धावा बोलते है। जबकि क्युला हर साल कई हरे खेतों का सफाया कर देते हैं । मक्का, गेहूँ या शर्बत के बड़े खेतों में अगर एक लाख क्युला सुबह अगर पेट भरने बैठ जाये तब समज लीजिये की शाम तक 20,000 किलोग्राम अनाज साफ !

टिड्डे से ज़्यादा त्रास क्युला का

अफ्रीका के नीग्रो लोग। पिछले सौ वर्षों से क्युला पक्षी का त्रास सहन कर रहे हैं । इन पक्षियों ने सबसे बड़ी तबाही 1890 के समय में की थी । जब उनकी आतंकवादी सेना अफ्रीकी देश तांगानिका पर उमड़ पड़ी थी । उस देश का एक भी खेत को नहीं छोड़ा इन पक्षियों ने । फसलों को नष्ट कर दिया जिससे हजारों लोग भुखमरी से मर गए। ऐसा ही कन्या में सन 1952 में छह । उस साल सरकार कटे हुए अनाज को 1,00,000 बोरियो में संग्रहित किया गया था । उन बोरियों को खुले यार्ड में रखा गया था। एक सुबह क्युला की आसुरी सेना ने हमला किया और दोपहर तक खाली बोरियो के अलावा कुछ नहीं बचा । क्युला के भूखे झुंड में सेंकडो नही लाखो जितने क्युला होते हैं तब वह अनाज की रखवाली करने वाले भी करे तो करे क्या ? कितनो को बंदूक से मारे ?

अफ्रीका के किसान भी क्युला के केस में असहाय है। वैज्ञानिक भी हार गए हैं। कई साल पहले अफ्रीका में
देशों ने तय किया कि सभी सम्मानित वैज्ञानिक को एक साथ काम पर लगाकर क्युला का फैसला कर दिया जाए । फिर जैसे युद्ध हो रहा हो वैसे सभी देशों काम पर लग गए। क्युला के घोंसले जहाँ दिखे वहाँ विषाक्त रसायनों का मारा चलाया गया । उड़ते हुए पक्षियों को मारने के लिए हवा में विस्फोट करने के लिए बम गिराए गए ।
जिस पर कई घोंसले हो उन हजारों पेड़ को भी काट दिए गए। इसके अलावा, नीग्रो ने अन्य चालें चली उनका वर्णन ना करे तो बहेतर है । संक्षेप में, पच्चीस करोड़ पक्षी मारे दिए गए । और सभी देशों ने राहत की सांस ली थी।

इससे केवल एक वर्ष के लिए छुटकारा पाएं – और फिर जैसे थे ! यह समझने का एक शानदार तरीका कि ऐसा क्यों हुआ का कारण समझते है। एक पक्षी चार अंडे देता है और फिर उसकी चूचियाँ और उनकी चुचियाँ एक ही तरह से अंडे देते हैं । अगर अनियंत्रित छोड़ दिया जाए, तो दस वर्षों में उन की कुल संख्या 2,44,14,060 होती है! फिर भी दुनिया में वही पक्षी क्यों नही देखते । इसका कारण शकर, बाज, गरुड़ और अन्य शिकारी पक्षी हैं । कई शिकारी उनको अपना भोजन बनाते हैं। इस तरह सभी की जनसंख्या वृद्धि को नियंत्रित करते हैं।

क्युला पक्षियों का झुण्ड

हां, अफ्रीका में अरबों साल पहले क्युला नहीं थे। स्वाभाविक रूप से उनकी जनसंख्या वृद्धि को रोकने के लिए अफ्रीका में बहुत सारे शिकार करने वाले जीव विकसित हु नहीं हुए थे ।लेकिन प्रकृति स्वयं ही अतिरिक्त को हर साल खत्म कर देती थी । इनका मुख्य भोजन घास और सूक्ष्म बीज – और वे खाद्य पदार्थ है जो कई महीनों तक उपलब्ध नहीं रहता है। सूखे मौसम में घास नहीं बढ़ती है, अर्थात्। भुखमरी के कारण लाखों पक्षी मर जाते थे। मानसून के बाद जब आबादी वापस बढ़ती है । भुखमरी से उनको नष्ट करना प्रकृति का नियम था !

ऐसा सालों तक चला। लेकिन ब्रिटेन के श्वेत उद्यमी जब हम अंततः अफ्रीका पहुंचे तब तथाकथित किनारेके अफ्रीका के सिदी लोग को उन्होंने खेती और सिदी लोग क्युला केंघोंसले के नीचे पड़ी खाद को ही खेती में उपयोग करने लगे। हर पेड़ पर लगभग 400 घोंसले लटकते रहते हैं। और ऐसे हजारों पेड़ होते हैं । फिर आपको खाद के लिए कितना मिलता है! सिदी लोगों को लगा कि खेती के बाद उनकी भूखमरी हमेशा के लिए खत्म हो जाएगी । यह उनकी अपेक्षा से बहुत अलग था! खेतों में खड़ी फसलें से सबसे पहले क्युला की भूखमरी ही समाप्त हो गई ! इससे पहले शुष्क मौसम में, कई बटेर पंख भोजन के बिना मर जाते थे। यहाँ तक कि बंजर और उजाड़ क्षेत्र में घास का तिनका नहीं मिलता था । अब उन्हें खुले खेतों में ही अनाज मिलता चला गया, इसलिए आबादी हर साल उसी दर से बढ़ती रही।
लाखों के बजाय, यह अंततः अरबों तक पहुंच गया।

क्युला का विशाल झुण्ड जो खेतो को चंद मिनटों में साफ़ कर देता है

पेटपूजा के लिए लंबे प्रवास

एक बात सुनिश्चित है, जब तक नीग्रो खेती करते है तब तक उनकी आबादी में गिरावट का कोई मौका नहीं है! क्युला की वजह से खेतों पर वर्षों से रेडीमेड ‘शाद-रात्रिभोज’ उपलब्ध है। उनके लिए अकाल का समय आता ही नहीं। परिणामस्वरूप, जनसंख्या वृद्धि के अनुपात में जनसंख्या में कमी की शक्यता निम्न ही रहती है । हर साल पहली बारिश के बाद क्युला की विशाल सेना घास के डंठल पर झूले की तरह लटकता हुआ एक घोंसला बांधता है। अकेले नाइजीरिया में, ऐसे 30 लाख घोंसले झूलते दिखते है , तो अफ्रीका में एक और दस-बारह देशों का क्या कहना ? हर घोंसले में 50 से 60 करोड़ बच्चे जन्म लेते है । बारिश के बाद बीज पाने में कोई दिक्कत नही होती । पांच सप्ताह के लिए नर पक्षी और मादा पक्षी अपने बच्चों को खिलाने की महेनत करते है। एक ओर पांचवें सप्ताह में बच्चा पहली बार पंख फड़फड़ाते हैं। दूसरी ओर इस क्षेत्र में घास के बीज भी गायब होते हैं। तो सभी बड़े और छोटे क्यूला नए भोजन खोजने के लिए अन्यत्र जाते रहते हैं।

इसके दौरान वह पांच सप्ताह तक जमीन पर रहे उनके खाद को अफ्रीकी किसान इसे मुफ्त खाद मानते हैं उनके थैलियों में भर लेते है। इस खाद से फसल अच्छी होती है, लेकिन क्युला अंत में इसे खा लेते है! बारिश के कुछ देर बाद मैदानी इलाके हरे-भरे होते हैं । घास के बीज ढूँढता है। साथ ही घास-फूस का कीटक को भी खाते है । पेट पूजा के लिए अफ्रीका में कयुला की भीड़ लगी रहती है । सब पक्षी फिर से बाहर निकलते लेकिन शुष्क मौसम में पूरा क्षेत्र उजाड़ हो जाता है । फिर हरे खेतों की बारी आती है! तब बारी आती है हरे खेत की । खेत पर झुंड के सभी सदस्य हमला करके एक-दो घंटे में ही पूरे खेत को क्युला का साफ़ कर देता है । फिर झुंड दूसरे खेत में चला जाता है। औसतन एक क्युला पक्षी का वजन 20 ग्राम होता है, जो रोजाना 10 ग्राम अनाज खाता है । साथ ही उतना ही खराब भी करता है । हर दिन एक लाख की सेना के लिए 1,000 किलोग्राम अनाज का सीधा सफाया हो जाता है! –और अफ्रीका में तो अरबो क्युला है । तो उसके अनुसार तो कुल हिसाब कितना करें ?

हम.हर पक्षी को अधिकतर भोला , दया का पात्र मानते है लेकिन अफ्रीका का क्युला भोले तो है नही और दया दिखाने जैसे तो बिल्कुल नहीं!

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